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Anil Siwach

Anil Siwach Lives in Hisar, Haryana, India

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 8

।।श्री हरिः।।
16 – भाग्य-भोग

'भगवन! इस जीव का भाग्य-विधान?' कभी-कभी जीवों के कर्मसंस्कार ऐसे जटिल होते हैं कि उनके भाग्य का निर्णय करना चित्रगुप्त के लिये भी कठिन हो जाता है। अब यही एक जीव मर्त्यलोक से आया है। इतने उलझन भरे इसके कर्म है - नरक में, स्वर्ग में अथवा किसी योनि-विशेष में कहाँ इसे भेजा जाय, समझ में नहीं आता। देहत्याग के समय की इसकी अन्तिम वासना भी (जो कि आगामी प्रारब्ध की मूल निर्णायिका होती है) कोई सहायता नहीं देती। वह वासना भी केवल देह की स्मृति - देह रखने की इच्छा है। ऐसी अवस्था आने पर चित्रगुप्त के पास एक ही उपाय है, वे अपने स्वामी के सम्मुख उपस्थित हों।

धर्मराज ने चित्रगुप्त से उस जीव का क्रम लेख लिया और उसे लगभग बिना पढे ही उसके आगामी प्रारब्ध के तीनों कोष्ठक भर दिये। चित्रगुप्त ने देखा जाति के कोष्ठक में लिखा है - मनुष्य-श्वपच, आयु के कोष्ठक में उदारतापूर्वक 102 की संख्या है; किंतु भोग - भोग का विवरण देखकर चित्रगुप्त को लगा कि आज संयमनीपति विशेष क्रुद्ध हैं।

चित्रगुप्त कभी नहीं समझ सके कि जीव का जो कर्म-विधान उनको इतना जटिल लगता है, धर्मराज कैसे उसका निर्णय बिना एक क्षण सोचे कर देते हैं। यम एक मुख्य भागवताचार्य हैं और भक्ति का - भक्ति के अधिष्ठता का रहस्य जाने बिना, उसकी कृपाकोर की प्राप्ति के बिना कर्म का - धर्माधर्म का ठीक-ठीक रहस्य ज्ञान नहीं होता, यह बात चित्रगुप्तजी नहीं समझेंगे। वे तो कर्म के तत्त्वज्ञ हैं और कर्माकर्म की कसौटी पर ही सब कुछ परखना जानते हैं; किंतु जब उनकी कसौटी उन्हें उलझन में डाल देती है - यमराज कर्म के परम निर्णायक हैं। उनके निर्णय की कहीं अपील नहीं, अत: वे बिना हिचके निर्णय कर देते हैं। यह चित्रगुप्तजी के चित्त का समाधान है; किंतु धर्म के निर्णायक को आवेश में तो निर्णय नहीं करना चाहिये।

'यह अभागा जीव!' यमपुरी के विधायक, यमराज के मुख्य सचिव चित्रगुप्त - उन्हें किसी जीव को नरक का आदेश सुनाते किसी ने हिचकते नहीं देखा और आज वे क्षुब्ध हो रहे थे - 'कैसे सहन कर सकेगा यह दारुण दुख? इतना दुखदायी विधान एक असहाय प्राणी के लिये।'

'संयमनी के मुख्य सचिव प्राणी के सुख-दुख के दाता कब से हो गये?' चित्रगुप्त चौंक उठे। उन्होंने अपनी चिन्ता में देखा ही नहीं था कि देवर्षि नारद उनके सामने आ खड़े हुए हैं। उन्होंने प्रणिपात किया देवर्षि को।

‘धर्मराज को स्रष्टा ने केवल जाति, आयु और भोग के निर्णय का अधिकार दिया है।' देवर्षि ने अपना प्रश्न दुहराया - 'स्थुल शरीर तक ही कर्म अपना प्रभाव प्रकट कर सकते हैं, किंतु देखता हूँ; धर्मराज के महामन्त्री अब जीव के सुख-दु:ख की सीमा के स्पर्श की स्पर्धा भी करने लगे हैं।'

ऐसी धृष्टता चित्त में न आवे, आप ऐसा अनुग्रह करें।' चित्रगुप्त ने दोनों हाथ जोड़े - ‘किंतु इतना दारुण भोग प्राप्त करके भी जीव दुखी न हो, क्या सम्भव है?'

'असम्भव तो नहीं है। शरीर की व्यथा प्राणी को दुखी ही करे - आवश्यक नहीं है।' देवर्षि ने चित्रगुप्तजी के सम्मुख पड़ा कर्म-विधान सहज उठा लिया।

'स्वयं धर्मराज ने यह विधान किया है।' चित्रगुप्त डरे। परम दयालु देवर्षि का क्या ठिकाना, कहीं इतना कठोर विधान देखकर वे रुष्ट हो जायँ - उनके शाप को स्वयं स्त्रष्टा भी व्यर्थ करने में समर्थ नहीं होंगे।

'कुब्ज, कुरुप, बधिर, मूक, शैशव से अनाथ, अनाश्रय, उपेक्षित, उत्पीड़ित, मान-भोग वर्जित, नित्य देहपीड़ा-ग्रस्त मरुस्थल-निर्वासित......।' देवर्षि के साथ डरते-डरते चित्रगुप्त भी उस जीव के भोग के कोष्ठक में भरे गये विधान को पुन: पढते जा रहे थे मन-ही-मन। कहीं तो उसमें कुछ सुख-सुविधा मिलनेे का कोई संयोग सूचित किया गया होता।

'अतिशय दयालु हैं धर्मराज।' चित्रगुप्त की आशा के सर्वथा विपरीत देवर्षि के मुख से उल्लास व्यक्त हुआ - 'इस प्राणी को एक साथ स्वच्छ कर देने की व्यवस्था कर द उन्होंने। विपत्ति तो वरदान है श्रीनारायणका।'

अब भला इन ब्रह्मपुत्र से कोई क्या कहे और इन्हें ही इतना अवसर कहां कि किसी की बात सुनने को रुके रहें। चित्रगुप्त के कर्म-विधान का पोथा पटका उन्होंने और उनकी वीणा की झंकार दुर होती चली गयी।
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महाराजा की सवारी निकली थी नगर-दर्शन करने। यह भी कोई बात है कि उनके सामने राजपथ पर कोई कुबड़ा, गूंगा, काला, कुरूप चाण्डाल बालक आ जाय। राजसेवकों ने उसे पीट-पीट कर अधमरा कर दिया और घसीट कर मरे कुत्ते के समान दुर फेंक दिया।

'कौन था यह?' महाराजा ने पूछा।

'एक श्वपच का पुत्र!' मन्त्री ने उत्तर दे दिया।

'इसके अभिभावक इसे पथ से दुर क्यों नहीं रखते?' महाराज का क्रोंध शान्त नहीं हुआ था।

'इसका कौई अभिभावक नहीं।' कुछ देर लगी पता लगाने में और तब मन्त्री ने प्रार्थना की - 'माता-पिता इसके तब मर गये, जब यह बहुत छोटा था, अब तो यह इसी प्रकार भटकता रहता है।'

'नगर का अभिशाप है यह।' महाराज को कौन कहे कि गर्व के शिखर से नीचे आकर आप देखें तो वह भी आपके समान ही सृष्टिकर्ता की कृति है; किंतु धन, अधिकार का मद मनुष्य की विवेक-दृष्टि नष्ट कर देता है। महाराज ने आदेश दे दिया - 'इसे दूर मरुस्थल में निर्वासित कर दिया जाय। राजधानी में इतनी कुरुपता नहीं रहनी चाहिये।'

छोटा-सा अबोध बालक। वैसे ही वह दर-दर की ठोकरें खाता फिरता था। कूड़े के ढेर पर से छिलके उठा कर उदर की ज्वाला-शान्त करता था। लोग दुत्कारते थे। बच्चे पत्थर मारते थे। वृक्ष के नीचे भी रात्रि व्यतीत करने का स्थान कठिनता से पाता था और अब उसे नगर से भी निर्वासित कर दिया गया। हाथ-पैर बाँधकर ऊंट पर लादकर एक राजसेवक श्वपच उसे मरुभूमि में ले गया और वहां उसके हाथ-पैर उसने खोल दिये।

अंग में लगे घाव पीड़ा करते थे। मरुस्थल की रेत तपती थी और ऊपर से सूर्य अग्नि की वर्षा करते थे। आँधियाँ मरुभूमि में न आयेंगी तो आयेंगी कहाँ; लेकिन मृत्यु उस बालक के समीप नहीं आ सकती थी। उसके भाग्य ने उसे जो दीर्घायु दी थी - कितनी बड़ी विडम्बना थी उसकी वह दीर्घायु।

जब प्यास से वह मुर्छित होने के समीप होता, कहीं-न-कहीं से रेत में दबा मतीरा उसे मिल जाता। खेजड़ी की छाया उसे मध्याह्न में झुलस जाने से बचा देती थी। मतीरा ही उसकी क्षुधा भी शान्त करता था। वैसे उसे मरुस्थल के मध्य में एक छोटा जलाशय मिल गया बहुत शीघ्र और वहाँ कुछ खजूर के वृक्ष भी मिल गये, किन्तु खजूर बारहमासी फल तो नहीं है।

इस भाग्यहीन बालक का स्वभाव विपत्तियों को भोगते-भोगते विचित्र हो गया था। बचपन में तो वह रोता भी था; किंतु अब तो जब कष्ट बढता था तो वह उलटे हँसता था - प्रसन्न होता था। अनेक बार उसे मरुस्थल के डाकू मिले ओर उन्होंने जी भरकर पीटा। वह उस पीड़ा में खूब हँसा - मानो उसे पीड़ा में सुख लेने का स्वभाव मिल गया हो।

वह क्या सोचता होगा? वह जन्म से मूक और बधिर था। शब्दज्ञान उसे था नहीं। अत: वह कैसे सोचता होगा, यह मैं नहीं समझ पाता हुँ। लेकिन वह कुछ काम करता था। दिन निकलता देखता तो सूर्य के सम्मुख पृथ्वी पर बार-बार सिर पटकता। आंधी आती तो उसे भी इसी प्रकार प्रणाम करता और कभी आकाश में कोई मेघखण्ड आ जाय तो उसे भी। खेजड़ी के वृक्ष को, जलाशय को और यदि कभी कोई दस्युदल आ जाय तो उन लोगों को तथा उनके ऊँटों को भी वह इसी प्रकार प्रणिपात किया करता था।

दूसरा काम वह प्राय प्रतिदिन यह करता कि खेजड़ी की एक डाल तोड़ लेता और विभिन्न दिशाओं में दूर-दूर तक एक निश्चित दूरी पर उसके पत्ते, टहनियाँ तब तक डालता जाता - जबतक मध्याह्न की धूप उसे छाया में बैठ जाने को विवश न कर देती। अनेक बार उसके डाले इन पत्तों के सहारे मरुस्थल में भटके यात्री एवं दस्यु उसके जलाशय तक पहुँते थे। अनेक बार उन दस्युओं ने उसे पीटा था। बहुत कम बार किसी यात्री ने उसे रोटी का टूकड़ा खाने को दिया। लेकिन उसने खेजड़ी के पत्ते डालने का काम केवल तब बंद रखा, जब वह ज्वर से तपता पड़ा रहता था।

मरुस्थल में एकाकी, दिगम्बर, असहायप्राय भूख-प्यास से संतप्त रहते वर्ष-पर-वर्ष बीतते गये उसके। बहुत बीमार पड़ा और बार-बार पड़ा; किंतु मरना नहीं था, इसलिये जीवित रहा। बालक से युवा हुआ और इसी प्रकार वृद्ध हो गया। उसकी देह में हड्डियों और चमड़े के अतिरिक्त और था भी क्या। अनेक बार यात्री उसे प्रेत समझकर डरे थे।

दुर्भाग्य ही तो मिला था उसे। एक अकाल का वर्ष आया और वह नन्हा जलाशय सूख गया जो वर्षों से उसका आश्रय रहा था। खेजड़ी में पतों के स्थान पर काँटे रह गये। उसे वह स्थान छोड़कर मरुस्थल में भटकना
पड़ा।

अंधड़ से रेत नेत्रों में भर गयी। प्यास के मारे कण्ठ सूख गया। गले में कांटे पड़ गये और अन्तत: वह मूर्छित होकर गिर पड़ा।

सहसा आकाश में उत्तंक मेघ प्रकट हुए जो केवल राजस्थान की मरुभूमि में कभी-कभी - कुछ शताब्दियों के अन्तर से प्रकट होते हैं। बड़ी-बड़ी बूंदों की बौछार ने उसके संतप्त शरीर को शीतल किया। उसने नेत्र खोलने की चेष्टा की; किंतु उनमें रेत भर गयी थी। देह में भयंकर ताप था। वह जीवन में पहली बार वेदना से चीखा - मूक की अस्पष्ट चीत्कार उसके कण्ठ से निकली।

उत्तंक मेघ उसके लिये तो नहीं आये थे। मरु की राशि में शतियों से समाधिस्थ महर्षि उत्तंक उठे थे समाधि से। उनकी तृषा शान्त करने के लिये मेघ आते हैं। महर्षि ने अपने समीप से आयी वह चीत्कार-ध्वनि सुनी और आगे बढ आये।

कृष्णवर्ण, कुटज, श्वेत केश, कंकालमात्र एक मानवाकार प्राणी रेत में पड़ा था। अब भी वह अपने नेत्रों से रेत ही निकालने के प्रयत्न में था। महर्षि की दृष्टि पड़ी। वे सर्वज्ञ - उन्हें कहां सूचित करना था कि उनके सम्मुख पड़ा प्राणी बोलने और सुनने में असमर्थ है। लेकिन महर्षि का संकल्प तो वाणी की अपेक्षा नहीं करता। उनकी अमृत दृष्टि पड़ी उस सम्मुख के प्राणी पर और फिर वे अपनी साधना-भूमि की ओर मुड़ गये।
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कुछ मास (क्योंकि देवताओं का दिन मनुष्यों के छः महीने के बराबर होता है और उतनी ही बड़ी होती है उनकी रात्रि) व्यतीत हुए होंगे, चित्रगुप्तजी के और एक दिन पुनः देवर्षि नारद संयमनी पधारे।

'आपके उस अतिशय भाग्यहीन जीव की अब क्या स्थिति है?' धर्मराज का सत्कार स्वीकार करके जाते समय देवर्षि ने सहसा चित्रगुप्त से पूछ लिया - 'जीवन में भाग्य का भोग उनको कितना दूखी कर सका, यह विवरण तो आपके समीप होगा नहीं।'

'आपका अनुग्रह जिसे अभय दे दे, कर्म के फल उसे कैसे उत्पीड़ित कर सकते हैं?' चित्रगुप्त ने नम्रतापूर्वक बताया - 'वे महाभाग देह की पीड़ा, अभाव, असम्मान से प्राय: अलिप्त रहे।'

'अनुग्रह तो उनपर किया था धर्मराज ने।‘ देवर्षि ने सहजभाव से बतलाया - 'भोग-विवर्जित करके संयमनी के स्वामी ने उन्हें अनेक दोषों से सुरक्षित कर दिया था। आपत्तियों ने उन्हें निष्काम बनाया। विपत्ति का वरदान पाये बिना प्राणी का परित्राण कदाचित् ही हो पाता है।'

'महर्षि उत्तंक के अनुग्रह ने उनके निष्कलुष वासनारहित चित्त को आलोकित कर दिया।' चित्रगुप्तजी ने बताया - 'अब हमारे विवरण में केवल इतना ही है कि उनका परम पवित्र देह धरा देवी ने अपनी मरुराशि में सुरक्षित कर लिया है।'

जिसके सम्बन्ध में श्रुति कहती है -

'न तस्य प्राणाश्चोत्क्रामन्ति तत्रैव प्रविलीयन्ते।'

उस मुक्तात्मा के सम्बन्ध में इससे अधिक विवरण चित्रगुप्तजी के समीप हो भी कैसे सकता है?

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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