रंग और रूप पिया के रंग में ढ़ल गई मैं यही रूप अख | हिंदी कविता

"रंग और रूप पिया के रंग में ढ़ल गई मैं यही रूप अखियों को भाए है जिस रूप को तुम्हारा रंग चढ़ा कोई और रंग फिर ना भाए है ऐसे रूप सजाया खुद का जैसे पसंद तुमको आए है प्रीत का रंग चढ़ा अब ऐसे कोशिश करके भी रंग ये ना जाए है।"

रंग और रूप 
पिया के रंग में ढ़ल गई मैं 
यही रूप अखियों को भाए है 
जिस रूप को तुम्हारा रंग चढ़ा 
कोई और रंग फिर ना भाए है
ऐसे रूप सजाया खुद का 
जैसे पसंद तुमको आए है  
प्रीत का रंग चढ़ा अब ऐसे 
कोशिश करके भी रंग ये ना जाए है।

रंग और रूप पिया के रंग में ढ़ल गई मैं यही रूप अखियों को भाए है जिस रूप को तुम्हारा रंग चढ़ा कोई और रंग फिर ना भाए है ऐसे रूप सजाया खुद का जैसे पसंद तुमको आए है प्रीत का रंग चढ़ा अब ऐसे कोशिश करके भी रंग ये ना जाए है।

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