मुसाफिरो की दुनिया मे मे भी भटक रहा एक मुसाफिर बन | हिंदी Poem

"मुसाफिरो की दुनिया मे मे भी भटक रहा एक मुसाफिर बनकर शायद ये सोचता था की हमे भी मिल जयेगा कोई पेहचननेवाला |||"

मुसाफिरो की दुनिया मे 
मे भी भटक रहा एक मुसाफिर बनकर 
 शायद ये सोचता था 
                          की हमे भी मिल जयेगा 
                           कोई पेहचननेवाला |||

मुसाफिरो की दुनिया मे मे भी भटक रहा एक मुसाफिर बनकर शायद ये सोचता था की हमे भी मिल जयेगा कोई पेहचननेवाला |||

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