ज़िस्म की बिसात ही क्या थी, जब रूह के कत़रे कतरे ह | हिंदी Shayari

"ज़िस्म की बिसात ही क्या थी, जब रूह के कत़रे कतरे हुए.. दिल की शय में चुभते बहुत हैं, दिल के टुकड़े बिखरे हुए... ©drVats"

ज़िस्म की बिसात ही क्या थी,
जब रूह के कत़रे कतरे हुए..
दिल की शय में चुभते बहुत हैं, 
दिल के टुकड़े बिखरे हुए...
                                ©drVats

ज़िस्म की बिसात ही क्या थी, जब रूह के कत़रे कतरे हुए.. दिल की शय में चुभते बहुत हैं, दिल के टुकड़े बिखरे हुए... ©drVats

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