कल रात कागज के पन्नों पर एक रंग तुम्हारा लिखा था, कल ख्वाबों के मै...

कल रात कागज के पन्नों पर
एक रंग तुम्हारा लिखा था,
कल ख्वाबों के मैदानो पर
एक संग तुम्हारा लिखा था,
कल रात सुबह की अंगीठी सा
ख्वाबों को सुलगाया था,
किसी पागल मन ने वीराने से
पन्नो पर तुम्हारा नाम लिखवाया था,
कल रात फिर तुम बिन बुलाए
मुझसे मिलने,ख्वाबों में चली
आई थी,
फिर सपनो की किलकारी से
मेरी रातें महकाई थी,
कल रात जिस्म को मेरे
किसी ने हिला कर जगाया था
कल फिर तुम्हारी महक से
मै ने खुद को मदहोश सा पाया था,
कल रात तुम्हारे साथ का
एक ख्वाब भी लिखा था,
ख्वाबों में मैंने अपने
तेरा-मेरा साथ भी लिखा था,
कल रात तुम्हारी हर चीज
मुझे अपनी सी लगी थी,
कल रात मैंने तुम पर
कितना कुछ लिखा था,

शुभेन्द्र दुबे "शुभ"

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