लब पर तेरे अब, क्यों मेरा नाम नहीं आता । क्या जुर् | हिंदी कविता

"लब पर तेरे अब, क्यों मेरा नाम नहीं आता । क्या जुर्म है मेरा, क्यों ये कोई नहीं बताता । तेरी यादों से निकले अश्कों को, छिपा लिया करते थे हम क्यो आज भी तेरे जेहन में, मेरा नाम नही आता । बसते है जो दिल मे आज भी, क्यो वो हमें पहचान नही पाता ।। आख़िर, लब पर तेरे अब, क्यो मेरा नाम नहीं आता .... ~~~ अस्मिता"

लब पर तेरे अब, क्यों मेरा नाम नहीं आता ।
क्या जुर्म है मेरा, क्यों ये कोई नहीं बताता ।
तेरी यादों से निकले अश्कों को, छिपा लिया करते थे हम
क्यो आज भी तेरे जेहन में, मेरा नाम नही आता ।
बसते है जो दिल मे आज भी, क्यो वो हमें पहचान नही पाता ।।
आख़िर, लब पर तेरे अब, क्यो मेरा नाम नहीं आता ....

~~~
अस्मिता

लब पर तेरे अब, क्यों मेरा नाम नहीं आता । क्या जुर्म है मेरा, क्यों ये कोई नहीं बताता । तेरी यादों से निकले अश्कों को, छिपा लिया करते थे हम क्यो आज भी तेरे जेहन में, मेरा नाम नही आता । बसते है जो दिल मे आज भी, क्यो वो हमें पहचान नही पाता ।। आख़िर, लब पर तेरे अब, क्यो मेरा नाम नहीं आता .... ~~~ अस्मिता

#ShatteredLife

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