दया भाव से धरा वृक्ष का सिंचन खुद से करती है। जीवो

"दया भाव से धरा वृक्ष का सिंचन खुद से करती है। जीवों के जीवन में प्राणवायु नित भरती है। आज वृक्ष के कटने से भूधर भी गुस्साएं हैं;हिम-शिला के खण्डों को अब तो वों पिघलाएं हैं। अम्बर दुःख से;अनियंत्रित वर्षा ऋतु ले आये हैं। सागर की लहरों को देखो वो तूफ़ान मचाएँ हैं। लौट रहें सब गाँवो में शहरों ने धुन्ध बिछाएं हैं। देखों सब वृक्षों को काट-काट कितना उत्पात मचाएँ हैं।"

दया भाव से धरा वृक्ष का सिंचन खुद से करती है।
जीवों के जीवन में प्राणवायु नित भरती है।
आज वृक्ष के कटने से भूधर भी गुस्साएं हैं;हिम-शिला के खण्डों को अब तो वों पिघलाएं हैं।
अम्बर दुःख से;अनियंत्रित वर्षा ऋतु ले आये हैं।
सागर की लहरों को देखो वो तूफ़ान मचाएँ हैं।
लौट रहें सब गाँवो में शहरों ने धुन्ध बिछाएं हैं।
देखों सब वृक्षों को काट-काट कितना उत्पात मचाएँ हैं।

दया भाव से धरा वृक्ष का सिंचन खुद से करती है। जीवों के जीवन में प्राणवायु नित भरती है। आज वृक्ष के कटने से भूधर भी गुस्साएं हैं;हिम-शिला के खण्डों को अब तो वों पिघलाएं हैं। अम्बर दुःख से;अनियंत्रित वर्षा ऋतु ले आये हैं। सागर की लहरों को देखो वो तूफ़ान मचाएँ हैं। लौट रहें सब गाँवो में शहरों ने धुन्ध बिछाएं हैं। देखों सब वृक्षों को काट-काट कितना उत्पात मचाएँ हैं।

वृक्ष क्यों लगाएँ??

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