हर घड़ी बित रही जैसे, एक बूंद वारिश की इंतजार में | हिंदी शायरी

"हर घड़ी बित रही जैसे, एक बूंद वारिश की इंतजार में धरती कांप रही, नजरों से ओझल जो तू होवे, जान से जान जैसे निकल रही।। क्यूं तेरे इंतजार दिलको ऐसे होवे, जैसे और न कुछ दुनिया में होवे, जब की न आस कोई, न मुलाकात हुई, जाने अहेसास क्यूं इतने खास होवे, फिर टोड़नेकी इंतजाम जैसे जिंदेगी करावे।। जाने ये डर कैसी, क्यूं बेकरारी ऐसी, जाने क्या मिलने और खोनेकी देरी है।।"

हर घड़ी बित रही जैसे,
एक बूंद वारिश की इंतजार में धरती कांप रही,
नजरों से ओझल जो तू होवे,
जान से जान जैसे निकल रही।।
क्यूं तेरे इंतजार दिलको ऐसे होवे,
जैसे और न कुछ दुनिया में होवे,
जब की न आस कोई,
न मुलाकात हुई,
जाने अहेसास क्यूं इतने खास होवे,
फिर टोड़नेकी इंतजाम जैसे जिंदेगी करावे।।
जाने ये डर कैसी,
क्यूं बेकरारी ऐसी,
जाने क्या मिलने और खोनेकी देरी है।।

हर घड़ी बित रही जैसे, एक बूंद वारिश की इंतजार में धरती कांप रही, नजरों से ओझल जो तू होवे, जान से जान जैसे निकल रही।। क्यूं तेरे इंतजार दिलको ऐसे होवे, जैसे और न कुछ दुनिया में होवे, जब की न आस कोई, न मुलाकात हुई, जाने अहेसास क्यूं इतने खास होवे, फिर टोड़नेकी इंतजाम जैसे जिंदेगी करावे।। जाने ये डर कैसी, क्यूं बेकरारी ऐसी, जाने क्या मिलने और खोनेकी देरी है।।

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