ये रूहानी खुशी जो मुझमे झलकी हैं ये और कुछ नहीं ते | हिंदी कविता

"ये रूहानी खुशी जो मुझमे झलकी हैं ये और कुछ नहीं तेरी लगी आदत की दिल्लगी हैं मिले थे हम जब पहली दफा एक अनछुआ ,अनकहा एहसास मात्र था देखो ना आज मेरी जिंदगी के हर हिस्से में मौजूद हैं ये और कुछ नहीं बस मुझे तेरी आदत हैं वो मुलाकाते वो देर जगके सुनी जो बात कुछ सुलझे कुछ अनसुलझे अल्फाज जो बयां हुए थे हमारे बीच ये और कुछ नहीं बस मुझे तेरी आदत हैं इसलिए तुझसे शिकायत जो रही अब फिर वो पल लाना नामुमकिन होता जा रहा पर फिर भी वो ही दिल को बहुत याद आ रहा ये और कुछ नहीं बस अब मुझे तेरी आदत हो रही इसीलिए शिकायत हो रही वो समय के साथ मेरी गुस्ताखियां बड़ी हसीन लगती थी क्योकि तुझे इंतज़ार कराने में मुझे खुशी मिलती थी ये और कुछ नहीं बस अब मुझे तेरी आदत हो गई इसलिए शिकायत हो रही वो लम्हा वही ठहरे ऐसा तो मैं चाहती ही थी पर ये सफर यूं ही चलता रहा बस कभी थमे नहीं पर वक़्त मेरा बेरी बन गया वो आज बड़ा जहरी लगा ये और कुछ नहीं तेरी आदत हो गई इसलिए तुजसे शिकायत हो रही हाथ थाम था जब तूने मेरा मैं एकेली थी तूने सम्भल था मुझे उसी अनजाने रिश्ते से आगे बढ़ी थी मैं जिंदगी भर के सफर के लिए ये और कुछ नहीं आदत हैं तेरी मुझे इसलिए शिकायत हो रही"

ये रूहानी खुशी जो मुझमे झलकी हैं
ये और कुछ नहीं तेरी लगी आदत की दिल्लगी हैं
मिले थे हम जब पहली दफा
एक अनछुआ ,अनकहा एहसास मात्र था
देखो ना आज मेरी जिंदगी के हर हिस्से में मौजूद हैं
ये और कुछ नहीं बस मुझे तेरी आदत हैं
वो मुलाकाते वो देर जगके सुनी जो बात
कुछ सुलझे कुछ अनसुलझे अल्फाज जो बयां हुए थे हमारे बीच
ये और कुछ नहीं बस मुझे तेरी आदत हैं
इसलिए तुझसे शिकायत जो रही
अब फिर वो पल लाना नामुमकिन होता जा रहा
पर फिर भी वो ही दिल को बहुत याद आ रहा
ये और कुछ नहीं बस अब मुझे तेरी आदत हो रही
इसीलिए शिकायत हो रही
वो समय के साथ मेरी गुस्ताखियां बड़ी हसीन लगती थी
क्योकि तुझे इंतज़ार कराने में मुझे खुशी मिलती थी
ये और कुछ नहीं बस अब मुझे तेरी आदत हो गई
इसलिए शिकायत हो रही
वो लम्हा वही ठहरे ऐसा तो मैं चाहती ही थी
पर ये सफर यूं ही चलता रहा बस कभी थमे नहीं
पर वक़्त मेरा बेरी बन गया वो आज बड़ा जहरी लगा
ये और कुछ नहीं तेरी आदत हो गई
इसलिए तुजसे शिकायत हो रही
हाथ थाम था जब तूने मेरा मैं एकेली थी तूने सम्भल था मुझे
उसी अनजाने रिश्ते से आगे बढ़ी थी मैं जिंदगी भर के सफर के लिए
ये और कुछ नहीं आदत हैं तेरी मुझे
इसलिए शिकायत हो रही

ये रूहानी खुशी जो मुझमे झलकी हैं ये और कुछ नहीं तेरी लगी आदत की दिल्लगी हैं मिले थे हम जब पहली दफा एक अनछुआ ,अनकहा एहसास मात्र था देखो ना आज मेरी जिंदगी के हर हिस्से में मौजूद हैं ये और कुछ नहीं बस मुझे तेरी आदत हैं वो मुलाकाते वो देर जगके सुनी जो बात कुछ सुलझे कुछ अनसुलझे अल्फाज जो बयां हुए थे हमारे बीच ये और कुछ नहीं बस मुझे तेरी आदत हैं इसलिए तुझसे शिकायत जो रही अब फिर वो पल लाना नामुमकिन होता जा रहा पर फिर भी वो ही दिल को बहुत याद आ रहा ये और कुछ नहीं बस अब मुझे तेरी आदत हो रही इसीलिए शिकायत हो रही वो समय के साथ मेरी गुस्ताखियां बड़ी हसीन लगती थी क्योकि तुझे इंतज़ार कराने में मुझे खुशी मिलती थी ये और कुछ नहीं बस अब मुझे तेरी आदत हो गई इसलिए शिकायत हो रही वो लम्हा वही ठहरे ऐसा तो मैं चाहती ही थी पर ये सफर यूं ही चलता रहा बस कभी थमे नहीं पर वक़्त मेरा बेरी बन गया वो आज बड़ा जहरी लगा ये और कुछ नहीं तेरी आदत हो गई इसलिए तुजसे शिकायत हो रही हाथ थाम था जब तूने मेरा मैं एकेली थी तूने सम्भल था मुझे उसी अनजाने रिश्ते से आगे बढ़ी थी मैं जिंदगी भर के सफर के लिए ये और कुछ नहीं आदत हैं तेरी मुझे इसलिए शिकायत हो रही

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