रोज ना सही कभी कभी आवाज़ लगा लेता है,,उसके घर जाने | हिंदी शायरी

"रोज ना सही कभी कभी आवाज़ लगा लेता है,,उसके घर जाने का रास्ता मुझको बुला लेता है. जाना पहचाना सफर था जो कभी आज मुझको अजनबी सा बना देता है. गूंजता था शोर जिसके कदमों का हमेशा मेरे कानों में,,आज उसकी गलियों में यादों का सन्नाटा शोर मचा देता है।"

रोज ना सही कभी कभी आवाज़ लगा लेता है,,उसके घर जाने का रास्ता मुझको बुला लेता है.

जाना पहचाना सफर था जो कभी आज मुझको अजनबी सा बना देता है.

गूंजता था शोर जिसके कदमों का हमेशा मेरे कानों में,,आज उसकी गलियों में यादों का सन्नाटा शोर मचा देता है।

रोज ना सही कभी कभी आवाज़ लगा लेता है,,उसके घर जाने का रास्ता मुझको बुला लेता है. जाना पहचाना सफर था जो कभी आज मुझको अजनबी सा बना देता है. गूंजता था शोर जिसके कदमों का हमेशा मेरे कानों में,,आज उसकी गलियों में यादों का सन्नाटा शोर मचा देता है।

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