#OpenPoetry मेरी माँ वो मुझसे कितनी उम्मीदें लगाए | हिंदी Shayari

"#OpenPoetry मेरी माँ वो मुझसे कितनी उम्मीदें लगाए बैठी है कि अपना सब कुछ दाओं पे लगाए बैठी है हार मानू भी तो कैसे मानू मैं वो मेरी एक जीत पे अपनी पुरी उमर लगाए बैठी है"

#OpenPoetry मेरी माँ

वो मुझसे कितनी उम्मीदें लगाए बैठी है 
कि अपना सब कुछ दाओं पे लगाए बैठी है 
हार मानू भी तो कैसे मानू मैं 
वो मेरी एक जीत पे 
अपनी पुरी उमर लगाए बैठी है

#OpenPoetry मेरी माँ वो मुझसे कितनी उम्मीदें लगाए बैठी है कि अपना सब कुछ दाओं पे लगाए बैठी है हार मानू भी तो कैसे मानू मैं वो मेरी एक जीत पे अपनी पुरी उमर लगाए बैठी है

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