एक 'पेड़' के दो टहनियों जैसे हैं हमारे रिश्ते जड़े | हिंदी कविता

"एक 'पेड़' के दो टहनियों जैसे हैं हमारे रिश्ते जड़ें छोड़ नहीं सकते, जुदा हो नहीं पाते एक 'सांस' के निरंतर चलने जैसे होता है तुम्हारा एहसास, जिनके थमने से जीवन नाराज़ हो जाते हैं एक नदी के दो छोर से हैं हम दोनों की 'देह' के रिश्ते, टकराते रोज़ हैं मिलते कभी भी नहीं एक पलक के झपकने भर जितना रह गया है लोगों पे 'विश्वास', फिर रिश्ते टूट जाते हैं और अपने छूट जाते हैं, . एक दिन इस सृष्टि का और इंसान का नाश इंसान ख़ुद करेगा, एक दिन वो 'पेड़' जाला दिए जाएंगे, एक दिन वो 'देह' राख हो जाएंगी, एक दिन वो 'सांसें' सिरा दी जाएंगी, एक दिन सब 'विश्वास' फ़िर डगमगाएंगे, . एक दिन तुम्हारा विरह योगी का कीर्तन हो जाएगा, एक दिन तुम्हारा बोलना मुर्दे का स्वर लगेगा, एक दिन तुम्हारा चुम्बन शिव का विष हो जाएगा, एक दिन हमारा साथ शिव की तीसरी नेत्र हो जाएगा, उस दिन मैं शायद आज़ाद हो जाऊंगा। ©Shivam Nahar"

 एक 'पेड़' के दो टहनियों जैसे हैं हमारे रिश्ते
जड़ें छोड़ नहीं सकते, जुदा हो नहीं पाते

एक 'सांस' के निरंतर चलने जैसे होता है तुम्हारा एहसास,
जिनके थमने से जीवन नाराज़ हो जाते हैं

एक नदी के दो छोर से हैं हम दोनों की 'देह' के रिश्ते,
टकराते रोज़ हैं मिलते कभी भी नहीं

एक पलक के झपकने भर जितना रह गया है लोगों पे 'विश्वास',
फिर रिश्ते टूट जाते हैं और अपने छूट जाते हैं,
.
एक दिन इस सृष्टि का और इंसान का नाश
इंसान ख़ुद करेगा,
एक दिन वो 'पेड़' जाला दिए जाएंगे,
एक दिन वो 'देह' राख हो जाएंगी,
एक दिन वो 'सांसें' सिरा दी जाएंगी,
एक दिन सब 'विश्वास' फ़िर डगमगाएंगे,
.
एक दिन तुम्हारा विरह योगी का कीर्तन हो जाएगा,
एक दिन तुम्हारा बोलना मुर्दे का स्वर लगेगा,
एक दिन तुम्हारा चुम्बन शिव का विष हो जाएगा,
एक दिन हमारा साथ शिव की तीसरी नेत्र हो जाएगा,
उस दिन मैं शायद आज़ाद हो जाऊंगा।

©Shivam Nahar

एक 'पेड़' के दो टहनियों जैसे हैं हमारे रिश्ते जड़ें छोड़ नहीं सकते, जुदा हो नहीं पाते एक 'सांस' के निरंतर चलने जैसे होता है तुम्हारा एहसास, जिनके थमने से जीवन नाराज़ हो जाते हैं एक नदी के दो छोर से हैं हम दोनों की 'देह' के रिश्ते, टकराते रोज़ हैं मिलते कभी भी नहीं एक पलक के झपकने भर जितना रह गया है लोगों पे 'विश्वास', फिर रिश्ते टूट जाते हैं और अपने छूट जाते हैं, . एक दिन इस सृष्टि का और इंसान का नाश इंसान ख़ुद करेगा, एक दिन वो 'पेड़' जाला दिए जाएंगे, एक दिन वो 'देह' राख हो जाएंगी, एक दिन वो 'सांसें' सिरा दी जाएंगी, एक दिन सब 'विश्वास' फ़िर डगमगाएंगे, . एक दिन तुम्हारा विरह योगी का कीर्तन हो जाएगा, एक दिन तुम्हारा बोलना मुर्दे का स्वर लगेगा, एक दिन तुम्हारा चुम्बन शिव का विष हो जाएगा, एक दिन हमारा साथ शिव की तीसरी नेत्र हो जाएगा, उस दिन मैं शायद आज़ाद हो जाऊंगा। ©Shivam Nahar

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