आज फ़िर इक रात ने मेरी पलकों को भीगते हुए देखा! फ़िर इक बार आँसुआे...

आज फ़िर इक रात ने मेरी पलकों को भीगते हुए देखा! फ़िर इक बार आँसुआेमें छुपे दर्द को मेरी दास्तान सुनाते हुए देखा! पूछ रहा था चाँद रात से, दिखता हैं रोज़ यहिपर क्या इसकी आंखो को नींद से बगावत सी थीं! रात ने कहां क्यों न होगी बंदे को उनसे मोहब्बत जो थीं!

                                       ओम                    

आज फ़िर इक रात ने मेरी पलकों को भीगते हुए देखा! फ़िर इक बार आँसुआेमें छुपे दर्द को मेरी दास्तान सुनाते हुए देखा! पूछ रहा था चाँद रात से, दिखता हैं रोज़ यहिपर क्या इसकी आंखो को नींद से बगावत सी थीं! रात ने कहां क्यों न होगी बंदे को उनसे मोहब्बत जो थीं!                                        ओम                    

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