हज़ार ख़्वाहिशों का बोझ लिए चलते हैं, कहीं गिर ना जा | हिंदी शायरी

हज़ार ख़्वाहिशों का बोझ लिए चलते हैं, कहीं गिर ना जाए
 बार-बार  संभलते हैं
ठोकरें लगी भी तो  
उन्हीं से लगी यारो
जो कहते थे हम 
साथ साथ चलते हैं

हज़ार ख़्वाहिशों का बोझ लिए चलते हैं, कहीं गिर ना जाए बार-बार संभलते हैं ठोकरें लगी भी तो उन्हीं से लगी यारो जो कहते थे हम साथ साथ चलते हैं

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