ये बचपन की बात है 🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂 माँ के आँचल में छुपना, | हिंदी कविता

"ये बचपन की बात है 🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂 माँ के आँचल में छुपना, बाबा की गोद में रहना ये ज़िन्दगी की बहुत अनोखी बात है पर क्या करे गुज़र गया सब कुछ *ये बचपन की बात है* बहनों से लड़ कर, भाई से बैट बॉल छीन लेते थे ज़ोर ज़ोर से रो कर, हर लड़ाई जीत लेते थे नो दोस्त न दुश्मन समझ आता था हमें जो आता था मुहल्ले में, सबके साथ खेल लेते थे काँचा से निशान लगाते थे, पतंग साथ उड़ाते थे गीले शिकवे भूलकर दोस्त बन जाते थे ज़िन्दगी की छांव में, अब कहाँ वो जज़्बात है पर क्या करे गुज़र गया सब कुछ *ये बचपन की बात है* पर आज बचपन की बात फिर दोहराते हैं थके हारे हैं, दुनिया से, माँ के कदमों तले सो जाते हैं आज बाबा की भी याद, शिद्दत से दिल को आई है चलो सब भाई-बहनों से मिल आते हैं एक डोर तुम पकड़ लेना, पतंग हम लहरायेंगे काटने लगे जब ज़माना, खुद ही कटकर ठहाके लगाएंगे बचपन की बात को फिर से दोहरायँगे पानी तुम लाना, मिट्टि से गोली हम बनाएंगे हल्की सी मुस्कुराहट लिए, ये छोटी सी मुलाक़ात है फ़िर बच्चे बन जाते हैं न, चलो माना ये बचपन की बात है।"

ये बचपन की बात है
🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂
माँ के आँचल में छुपना, बाबा की गोद में रहना
ये ज़िन्दगी की बहुत अनोखी बात है
पर क्या करे गुज़र गया सब कुछ
*ये बचपन की बात है*

बहनों से लड़ कर, भाई से बैट बॉल छीन लेते थे
ज़ोर ज़ोर से रो कर, हर लड़ाई जीत लेते थे
नो दोस्त न दुश्मन समझ आता था हमें 
जो आता था मुहल्ले में, सबके साथ खेल लेते थे
काँचा से निशान लगाते थे, पतंग साथ उड़ाते थे
गीले शिकवे भूलकर दोस्त बन जाते थे
ज़िन्दगी की छांव में, अब कहाँ वो जज़्बात है
पर क्या करे गुज़र गया सब कुछ
*ये बचपन की बात है*

पर आज बचपन की बात फिर दोहराते हैं
थके हारे हैं, दुनिया से, माँ के कदमों तले सो जाते हैं
आज बाबा की भी याद, शिद्दत से दिल को आई है
चलो सब भाई-बहनों से मिल आते हैं

एक डोर तुम पकड़ लेना, पतंग हम लहरायेंगे
काटने लगे जब ज़माना, खुद ही कटकर ठहाके लगाएंगे
बचपन की बात को फिर से दोहरायँगे
पानी तुम लाना, मिट्टि से गोली हम बनाएंगे
हल्की सी मुस्कुराहट लिए, ये छोटी सी मुलाक़ात है
फ़िर बच्चे बन जाते हैं न, चलो माना ये बचपन की बात है।

ये बचपन की बात है 🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂 माँ के आँचल में छुपना, बाबा की गोद में रहना ये ज़िन्दगी की बहुत अनोखी बात है पर क्या करे गुज़र गया सब कुछ *ये बचपन की बात है* बहनों से लड़ कर, भाई से बैट बॉल छीन लेते थे ज़ोर ज़ोर से रो कर, हर लड़ाई जीत लेते थे नो दोस्त न दुश्मन समझ आता था हमें जो आता था मुहल्ले में, सबके साथ खेल लेते थे काँचा से निशान लगाते थे, पतंग साथ उड़ाते थे गीले शिकवे भूलकर दोस्त बन जाते थे ज़िन्दगी की छांव में, अब कहाँ वो जज़्बात है पर क्या करे गुज़र गया सब कुछ *ये बचपन की बात है* पर आज बचपन की बात फिर दोहराते हैं थके हारे हैं, दुनिया से, माँ के कदमों तले सो जाते हैं आज बाबा की भी याद, शिद्दत से दिल को आई है चलो सब भाई-बहनों से मिल आते हैं एक डोर तुम पकड़ लेना, पतंग हम लहरायेंगे काटने लगे जब ज़माना, खुद ही कटकर ठहाके लगाएंगे बचपन की बात को फिर से दोहरायँगे पानी तुम लाना, मिट्टि से गोली हम बनाएंगे हल्की सी मुस्कुराहट लिए, ये छोटी सी मुलाक़ात है फ़िर बच्चे बन जाते हैं न, चलो माना ये बचपन की बात है।

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