20 रुपये का अचार कहानी बोलबचन की ज़ुबानी बोलबचन जी

"20 रुपये का अचार कहानी बोलबचन की ज़ुबानी"

20 रुपये का अचार
कहानी बोलबचन की ज़ुबानी

20 रुपये का अचार कहानी बोलबचन की ज़ुबानी

बोलबचन जी घर में बैठे अखबार पढ़ रहे थे। तभी दरवाज़े की खटखट ने उनका ध्यान अपनी तरफ किया। उन्होंने दरवाज़ा खोला तो देखा कि नीरज खड़ा था। दोनों अंदर बैठ कर बातें करने लगे। तभी बिजली चली गयी। दोनों बाहर जा कर बैठ गए। अभी दोनों बात कर ही रहे थे तभी एक आवाज़ आई। आचार ले लो। निम्बू का, आम का, लहसुन का, अदरक का। अचार ले लो। दोनों ने देखा कि एक रेहड़ी वाला अचार बेचने के लिए जोर जोर से आवाज़ लगा रहा था। तभी आचार वाला बोलबचन जी के दरवाजे तक आ गया। उसने बोलबचन जी से पूछा "साहेब अचार लेंगे" बहुत अच्छा है। ये सुन कर नीरज ने मना कर दिया। वो अचार वाला जाने लगा बोलबचन जी ने उसे रोक लिया। बोलबचन जी ने कहा रुको। रेहड़ी वाला रुक गया। बोलबचन जी ने कहा एक काम करो 20 रुपये का अचार दे दो। रेहड़ी वाले ने 20 रुपये का अचार दिया और पैसे लेकर चला गया। अचार का लिफ़ाफ़ा हाथ में पकड़े हुए थे। जैसे ही उन्होंने उसे बगल में रखा तो नीरज ने बोलबचन जी से एक सवाल पूँछा। गुरु जी घर में इतना अचार रखा पड़ा है। ऊपर से आप तो अचार खाते भी नहीं तो क्यों बेवजह अचार खरीद लिया। बेवजह पैसे बर्बाद कर दिए आपने। बोलबचन जी ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया। यही तो तुम समझे नहीं नीरज। बनते तो बड़े ज्ञानी हो पर छोटी सी बात समझ नही पाए। नीरज ने कहा क्या नहीं समझ पाया गुरु जी। बोलबचन जी फिर कहा।
कई बार जब हम कुछ भी खरीदते हैं ये जरूरी नहीं कि उसे अपने फायदे के लिये ही खरीदें। अब अचार की बात से ही समझो। अचार बेचने वाला सुबह से आचार बेच रहा है। उसमें उसकी मेहनत मिली है। अचार बनाने से लेकर और उसके बिकने तक उसकी मेहनत लगी है। दूसरी बात मैंने सिर्फ 20 रुपये का अचार खरीदा जिसमे से उसको ज्यादा से ज्यादा 5 रुपये ही बचेंगे। लेकिन मेरे अचार खरीदने के बाद उसके सिर से कुछ चिंता तो कम होगी कि अब उसे कम चार बेचना पड़ेगा, दूसरी बात वो रेहड़ा सुबह से खींच रहा है। मेरे अचार खरीदने से कुछ ज्यादा ना सही 200 ग्राम वजन तो रेहड़ी का कम तो होगा अब उसे कम वजन भी ढोना पड़ेगा। साथ में अब सोचो जब वो रात को खाने के लिए राशन लेने जाएगा तो उसके घर में बनी एक रोटी मेरे खरीदे अचार की होगी। उसकी भूख मिटाने में मेरा योगदान रहा कि नहीं। अब बताओ क्या गलत कहा मैंने।
नीरज ने कहा वो तो ठीक है गुरु जी लेकिन अचार तो बर्बाद ही जायेगा। आप तो खाते नहीं। बोलबचन जी ने फिर हँसते हुए कहा एक काम करो अचार जाकर बगल की गली के गुरुद्वारे में दे आओ। सुना है लंगर लगता है रोज़ वहाँ। अपना भी कुछ योगदान हो जाएगा। नीरज ने जाते हुए कहा वाह गुरुजी अच्छी सीख दी आपने।
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