प्रेमावली ------------ प्रेम नयन में जब बसै, दिव

"प्रेमावली ------------ प्रेम नयन में जब बसै, दिव्य ज्योति मिलि जात ज्यौं ओढै तु प्रीति चुनर चौहू ओर प्रीति बढि जात । प्रेम का गागर जैसे सागर जितना बाटो उससे अधिक वापस होई जात प्रेम से सीचत नीर वृक्ष को प्रेमवशी होकर वृक्ष, तुम वारी जात। है प्रेम रूप अनेक, जो जग में बाटा जात करे प्रेम केहू मोह से, केहू प्रभु प्रेम होई जात ज्योंहू प्रेम होत प्रभु चरणन में, जीवन कलेश मुक्त होई जात। प्रेम नयन की रीति पुरानी, देखत प्रेम होई जात मन तरस -दरस प्रभु चरणों की, हेरत -फिरत -मिलत प्रभु चरणों से, जीवन सफल होई जात। प्रेम का धाँगा जग को बाँधा जग फलत -फूलत आगे बढि जात करत कर्म नित प्रेम क लाँगा जीवन श्रेष्ठ, लक्ष्य भेद होई जात। प्रेम श्रेष्ठ दिव्य शक्ति की जैसी करत प्रयोग बाँधा हर जात प्रेम बसाए मन में जैसी, तेहि भाँति जगत दिख जात। चिंता चिता समान हवैं, चिंतन से हल मिलि जात ज्यौं मन में तु प्रेम बसावैं, बाँधा सब मिटि जात । ©Raj Yaduvanshi"

प्रेमावली 
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प्रेम नयन में जब बसै, 
दिव्य ज्योति मिलि जात 
ज्यौं ओढै तु प्रीति चुनर 
चौहू ओर प्रीति बढि जात ।

प्रेम का गागर जैसे सागर 
जितना बाटो उससे अधिक वापस होई जात 
प्रेम से सीचत नीर वृक्ष को 
प्रेमवशी होकर वृक्ष, तुम वारी जात। 

है प्रेम रूप अनेक, जो जग में बाटा जात 
करे प्रेम केहू मोह से, केहू प्रभु प्रेम होई जात 
ज्योंहू प्रेम होत प्रभु चरणन में, 
जीवन कलेश मुक्त होई जात। 

प्रेम नयन की रीति पुरानी, 
देखत प्रेम होई जात 
मन तरस -दरस प्रभु चरणों की, 
हेरत -फिरत -मिलत प्रभु चरणों से, जीवन सफल होई जात। 

प्रेम का धाँगा जग को बाँधा 
जग फलत -फूलत आगे बढि जात 
करत कर्म नित प्रेम क लाँगा 
जीवन श्रेष्ठ, लक्ष्य भेद होई जात। 

प्रेम श्रेष्ठ दिव्य शक्ति की जैसी 
करत प्रयोग बाँधा हर जात 
प्रेम बसाए मन में जैसी, 
तेहि भाँति जगत दिख जात। 

चिंता चिता समान हवैं, 
चिंतन से हल मिलि जात 
ज्यौं मन में तु प्रेम बसावैं, 
बाँधा सब मिटि जात ।

©Raj Yaduvanshi

प्रेमावली ------------ प्रेम नयन में जब बसै, दिव्य ज्योति मिलि जात ज्यौं ओढै तु प्रीति चुनर चौहू ओर प्रीति बढि जात । प्रेम का गागर जैसे सागर जितना बाटो उससे अधिक वापस होई जात प्रेम से सीचत नीर वृक्ष को प्रेमवशी होकर वृक्ष, तुम वारी जात। है प्रेम रूप अनेक, जो जग में बाटा जात करे प्रेम केहू मोह से, केहू प्रभु प्रेम होई जात ज्योंहू प्रेम होत प्रभु चरणन में, जीवन कलेश मुक्त होई जात। प्रेम नयन की रीति पुरानी, देखत प्रेम होई जात मन तरस -दरस प्रभु चरणों की, हेरत -फिरत -मिलत प्रभु चरणों से, जीवन सफल होई जात। प्रेम का धाँगा जग को बाँधा जग फलत -फूलत आगे बढि जात करत कर्म नित प्रेम क लाँगा जीवन श्रेष्ठ, लक्ष्य भेद होई जात। प्रेम श्रेष्ठ दिव्य शक्ति की जैसी करत प्रयोग बाँधा हर जात प्रेम बसाए मन में जैसी, तेहि भाँति जगत दिख जात। चिंता चिता समान हवैं, चिंतन से हल मिलि जात ज्यौं मन में तु प्रेम बसावैं, बाँधा सब मिटि जात । ©Raj Yaduvanshi

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