जब शहर के चकाचौंध में गांव की याद सताने लगती हैं, | हिंदी शायरी

"जब शहर के चकाचौंध में गांव की याद सताने लगती हैं, मैं तो रो पड़ता हूँ लेकिन मेरी किताबें हँसने लगती हैं.. मैं क्या बताऊँ उन गलियों से दूर आके क्या हुआ, मैं अंदर से जलता रहा तब जाकर बाहर से रौशन हुआ... वो किसी से मिलना फिर घण्टों बाते करना, वो किसी का हर बात पे रूठना..फिर गले से लगाना.. कभी-कभी बहुत याद आता हैं कोई गुज़रा हुआ ज़माना।:- AMAN"

जब शहर के चकाचौंध में गांव की याद सताने लगती हैं, मैं तो रो पड़ता हूँ लेकिन मेरी किताबें हँसने लगती हैं..
मैं क्या बताऊँ उन गलियों से दूर आके क्या हुआ, मैं अंदर से जलता रहा तब जाकर बाहर से रौशन हुआ...
वो किसी से मिलना फिर घण्टों बाते करना, वो किसी का हर बात पे रूठना..फिर गले से लगाना..
कभी-कभी बहुत याद आता हैं कोई गुज़रा हुआ ज़माना।:- AMAN

जब शहर के चकाचौंध में गांव की याद सताने लगती हैं, मैं तो रो पड़ता हूँ लेकिन मेरी किताबें हँसने लगती हैं.. मैं क्या बताऊँ उन गलियों से दूर आके क्या हुआ, मैं अंदर से जलता रहा तब जाकर बाहर से रौशन हुआ... वो किसी से मिलना फिर घण्टों बाते करना, वो किसी का हर बात पे रूठना..फिर गले से लगाना.. कभी-कभी बहुत याद आता हैं कोई गुज़रा हुआ ज़माना।:- AMAN

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