हाथ की लकीरों का कोई भरोसा नहीं होता, बुलंदियों का | हिंदी Story

"हाथ की लकीरों का कोई भरोसा नहीं होता, बुलंदियों का कोई मजहब नहीं होता, आसमा से झांक कर देखो कभी तुम, वहां से जमीन का नामो निशान नहीं होता। D. N."

हाथ की लकीरों का कोई भरोसा नहीं होता, बुलंदियों का कोई मजहब नहीं होता,
आसमा से झांक कर देखो कभी तुम,
वहां से जमीन का नामो निशान नहीं होता।
  D. N.

हाथ की लकीरों का कोई भरोसा नहीं होता, बुलंदियों का कोई मजहब नहीं होता, आसमा से झांक कर देखो कभी तुम, वहां से जमीन का नामो निशान नहीं होता। D. N.

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