समय चला, पर कैसे चला…पता ही नहीं चला… ज़िन्दगी की आ

समय चला, पर कैसे चला…पता ही नहीं चला…
ज़िन्दगी की आपाधापी में, कब निकली उम्र हमारी, यारों
पता ही नहीं चला.
कंधे पर चढ़ने वाले बच्चे, कब कंधे तक आ गए,
पता ही नहीं चला.
किराये के घर से शुरू हुआ था सफर अपना
कब अपने घर तक आ गए,
पता ही नहीं चला.

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