लालच नहीं है किसी चीज की मुझको बस खुदको चाहत की बे

"लालच नहीं है किसी चीज की मुझको बस खुदको चाहत की बेबसी मेहसूस करती हूं सुकुन थोड़ा मिल जाए इस बेबस से दिल को बस इसी सुकून की चाहत रखती हूं जब दर्द बढ़ जाता है तब किसी और चीज का खयाल नहीं होता खयाल का क्या है वो तो आता जाता रहता है बस इसी खयाल का खयाल करती रहती हूं मै भी ना जाने किस सोच में डूबी रहती हूं डूबने से डर नहीं लगता अब मुझको जब तू होता है सामने तब फ़िक्र नहीं होती मुझको इस फ़िक्र की क्या बात करू मै इसी फ़िक्र की मारी मारी फिरती हूं बस तुझसे ही ये सवाल करती रहती हूं। मुझे मालूम है कि कुछ सोचने की जरुरत नहीं समझता है तू पर क्या करे हमने इसी सोच पर तुझे पाया है जहा भी से नजर घुमाई बस तुझी में खुद को पाया है अब तुझसे मिलकर खुदको पाती रहती हूं बस यही सवाल हमेशा से मै खुदसे पूछती रहती हूं। लालच नहीं है मुझको तेरे इश्क़ की बस खुदको इश्क़ की अधूरी सी समझती हूं क्या करू इस दिल का मै क्या करू इस बेपर्वाने दिलका मै बस यही सोचती रहती हूं बस यही एक सवाल है जो खुदसे हमेशा पूछती रहती हूं।।"

लालच नहीं है किसी चीज की मुझको
बस खुदको चाहत की बेबसी मेहसूस करती हूं
सुकुन थोड़ा मिल जाए इस बेबस से दिल को
बस इसी सुकून की चाहत रखती हूं

जब दर्द बढ़ जाता है तब किसी और चीज का खयाल नहीं होता
खयाल का क्या है वो तो आता जाता रहता है
बस इसी खयाल का खयाल करती रहती हूं
मै भी ना जाने किस सोच में डूबी रहती हूं

डूबने से डर नहीं लगता अब मुझको
जब तू होता है सामने तब फ़िक्र नहीं होती मुझको
इस फ़िक्र की क्या बात करू मै
इसी फ़िक्र की मारी मारी फिरती हूं
बस तुझसे ही ये सवाल करती रहती हूं।

मुझे मालूम है कि कुछ सोचने की जरुरत नहीं समझता है तू
पर क्या करे हमने इसी सोच पर तुझे पाया है
जहा भी से नजर घुमाई बस तुझी में खुद को पाया है
अब तुझसे मिलकर खुदको पाती रहती हूं
बस यही सवाल हमेशा से मै खुदसे पूछती रहती हूं।

लालच नहीं है मुझको तेरे इश्क़ की 
बस खुदको इश्क़ की अधूरी सी समझती हूं
क्या करू इस दिल का मै
क्या करू इस बेपर्वाने दिलका मै
बस यही सोचती रहती हूं
बस यही एक सवाल है जो खुदसे हमेशा पूछती रहती हूं।।

लालच नहीं है किसी चीज की मुझको बस खुदको चाहत की बेबसी मेहसूस करती हूं सुकुन थोड़ा मिल जाए इस बेबस से दिल को बस इसी सुकून की चाहत रखती हूं जब दर्द बढ़ जाता है तब किसी और चीज का खयाल नहीं होता खयाल का क्या है वो तो आता जाता रहता है बस इसी खयाल का खयाल करती रहती हूं मै भी ना जाने किस सोच में डूबी रहती हूं डूबने से डर नहीं लगता अब मुझको जब तू होता है सामने तब फ़िक्र नहीं होती मुझको इस फ़िक्र की क्या बात करू मै इसी फ़िक्र की मारी मारी फिरती हूं बस तुझसे ही ये सवाल करती रहती हूं। मुझे मालूम है कि कुछ सोचने की जरुरत नहीं समझता है तू पर क्या करे हमने इसी सोच पर तुझे पाया है जहा भी से नजर घुमाई बस तुझी में खुद को पाया है अब तुझसे मिलकर खुदको पाती रहती हूं बस यही सवाल हमेशा से मै खुदसे पूछती रहती हूं। लालच नहीं है मुझको तेरे इश्क़ की बस खुदको इश्क़ की अधूरी सी समझती हूं क्या करू इस दिल का मै क्या करू इस बेपर्वाने दिलका मै बस यही सोचती रहती हूं बस यही एक सवाल है जो खुदसे हमेशा पूछती रहती हूं।।

#तुमसेसवाल

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