पता हैं ? तुम तक पहुँचने क़े लिए मुझे तुम तक नही आ

"पता हैं ? तुम तक पहुँचने क़े लिए मुझे तुम तक नही आना पड़ता। बस दिल क़ि गहराई में झांक लिखती हूं। जहां सिर्फ तुम हों। मेरे इश्क में गोते लगाते हुए, अपनी कश्ती को संवारते हुए। तुम्हारी कश्ती मेरे दिल की हर कोने से होकर जाना चाहती है, हर उस मोड़ से, जहां मैं खड़ी थी। सिर्फ तुम्हारे इंतजार में।"

पता हैं ? 
तुम तक पहुँचने क़े लिए
मुझे तुम तक नही आना पड़ता।

बस दिल क़ि गहराई में झांक लिखती हूं।
जहां सिर्फ तुम हों।
मेरे इश्क में गोते लगाते हुए,
 अपनी कश्ती को संवारते हुए।

 तुम्हारी कश्ती मेरे दिल की हर कोने से होकर जाना चाहती है,
 हर उस मोड़ से, जहां मैं खड़ी थी।

 सिर्फ तुम्हारे इंतजार में।

पता हैं ? तुम तक पहुँचने क़े लिए मुझे तुम तक नही आना पड़ता। बस दिल क़ि गहराई में झांक लिखती हूं। जहां सिर्फ तुम हों। मेरे इश्क में गोते लगाते हुए, अपनी कश्ती को संवारते हुए। तुम्हारी कश्ती मेरे दिल की हर कोने से होकर जाना चाहती है, हर उस मोड़ से, जहां मैं खड़ी थी। सिर्फ तुम्हारे इंतजार में।

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