माँ का आँचल हजार बार गिर जाओ उठाती हैं माँ| गम कित

"माँ का आँचल हजार बार गिर जाओ उठाती हैं माँ| गम कितना भी हो मुस्काती हैं माँ| वैसे तो लज्जा ही स्त्री का गहना हैं| सबके सामने ही दूध पिलाती हैं माँ|| पिता के मार और डाँट से बचा के| अपने आँचल में मुझे छुपाती हैं माँ|| रश्मि आर्य"

माँ का आँचल हजार बार गिर जाओ उठाती हैं माँ|
गम कितना भी हो मुस्काती हैं माँ|
वैसे तो लज्जा ही स्त्री का गहना हैं|
सबके सामने ही दूध पिलाती हैं माँ||
पिता के मार और डाँट से बचा के|
अपने आँचल में मुझे छुपाती हैं माँ||

रश्मि आर्य

माँ का आँचल हजार बार गिर जाओ उठाती हैं माँ| गम कितना भी हो मुस्काती हैं माँ| वैसे तो लज्जा ही स्त्री का गहना हैं| सबके सामने ही दूध पिलाती हैं माँ|| पिता के मार और डाँट से बचा के| अपने आँचल में मुझे छुपाती हैं माँ|| रश्मि आर्य

हर गम में मुस्काती हैं माँ......

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