बेहद ... हां हद है, परन्तु प्रेम, अनहद है। फि | हिंदी Poem

"बेहद ... हां हद है, परन्तु प्रेम, अनहद है। फिर कैसे मिलता, हम तो दायरे में रहे, दुनियादारी और सभ्यता की समझदारी के।। हमें तो दुनिया मिली, और हम समझदार दुनिया को। बस खो गया खुद का कुछ, हां सभ्य और कुल मर्यादक हैं हम।।"

बेहद ...
हां हद है, 

परन्तु प्रेम, 
अनहद है। 

फिर कैसे मिलता,
हम तो दायरे में रहे,

दुनियादारी और 
सभ्यता की समझदारी के।।

हमें तो दुनिया मिली,
और हम समझदार दुनिया को।

बस खो गया खुद का कुछ, 
हां सभ्य और कुल मर्यादक हैं हम।।

बेहद ... हां हद है, परन्तु प्रेम, अनहद है। फिर कैसे मिलता, हम तो दायरे में रहे, दुनियादारी और सभ्यता की समझदारी के।। हमें तो दुनिया मिली, और हम समझदार दुनिया को। बस खो गया खुद का कुछ, हां सभ्य और कुल मर्यादक हैं हम।।

#हदों_से_परे

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