सुबह से ही निकल जाते हैं बिना रोटी लिए, दो वक्त की | हिंदी Poem

"सुबह से ही निकल जाते हैं बिना रोटी लिए, दो वक्त की रोटी के लिए । जिम्मेदारी के बोझ के आगे , साइकिल पर लादे सामान का बोझ भी कम लगता हैं । गांव गांव, गली मोहल्ले घुम कर , सारे दिन बेबसी की पुकार लगाते हैं । कई बार लचारी के कारण , कम कीमत में ही बोनी करा लेते हैं । कभी बिक जाता पुरा सामान , कभी बिना बेचे घर लौट आते हैं । शहर के लोगों को देख , कभी कभी अपनी जिंदगी को देख रोने लगते हैं । खुद मे ही कमी मान , सारी जिंदगी गरीबी का बोझ तले जीते हैं । सुबह से ही निकल जाते हैं , बिना रोटी लिए , दो वक्त की रोटी के लिए ।"

सुबह से ही निकल जाते हैं
बिना रोटी लिए, दो वक्त की रोटी के लिए ।
जिम्मेदारी के बोझ के आगे ,
साइकिल पर लादे सामान का बोझ भी कम लगता हैं ।
गांव गांव, गली मोहल्ले घुम कर ,
सारे दिन बेबसी की पुकार लगाते हैं ।
कई बार लचारी के कारण ,
कम कीमत में ही बोनी करा लेते हैं ।
कभी बिक जाता पुरा सामान ,
कभी बिना बेचे घर लौट आते हैं ।
शहर के लोगों को देख ,
 कभी कभी अपनी जिंदगी को देख रोने लगते हैं ।
खुद मे ही कमी मान ,
सारी जिंदगी गरीबी का बोझ तले जीते हैं ।
सुबह से ही निकल जाते हैं ,
बिना रोटी लिए , दो वक्त की रोटी के लिए ।

सुबह से ही निकल जाते हैं बिना रोटी लिए, दो वक्त की रोटी के लिए । जिम्मेदारी के बोझ के आगे , साइकिल पर लादे सामान का बोझ भी कम लगता हैं । गांव गांव, गली मोहल्ले घुम कर , सारे दिन बेबसी की पुकार लगाते हैं । कई बार लचारी के कारण , कम कीमत में ही बोनी करा लेते हैं । कभी बिक जाता पुरा सामान , कभी बिना बेचे घर लौट आते हैं । शहर के लोगों को देख , कभी कभी अपनी जिंदगी को देख रोने लगते हैं । खुद मे ही कमी मान , सारी जिंदगी गरीबी का बोझ तले जीते हैं । सुबह से ही निकल जाते हैं , बिना रोटी लिए , दो वक्त की रोटी के लिए ।

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