कविता की आत्मकथा। किसी का जुनून हूँ मैं, किसी के | हिंदी Poem

कविता की आत्मकथा।

किसी का जुनून हूँ मैं,
किसी के लिए सुकून हूँ मैं।

ज़िक्र होता है मुझमें कभी प्यार, कभी नफ़रत,
कभी ख़्याल, नही तो कभी न पूरी होती हसरत।

कोई मुझमें शब्दों की शरारत का बुनता जाल है,
किसी के लिए जैसे वो मेरी माँ और उसका लाल मैं।

कोई भरता मुझमें गुड़, मिश्री जैसे मीठे एहसास,
तो कोई करता मुझमें कुछ कड़वे सच पर्दाफ़ाश।

किसी का हमसफ़र तो हमसाया हूँ मैं,
आपबीती सुनाने का सीढ़ियों सा सहारा हूँ मैं।

कोई शब्दो की सीमा से मुझको बाँधता है,
कोई जैसे मुझमें डूबकर स्वत्रंता की सारी सीमा लांघता है।

कागज़ कलम के सहारे मुझमें राज़ छिपात व्यक्ति,
किसी कलमकार के लिए मै उसकी रचना,अभिव्यक्ति।

मुझे लिखा किसी ने कलमकार कहलाने के लिए,
तो किसी ने दर्द से भरे अपने हालात बताने के लिए।

सभागार में सुनने वालो को बहुत सी बातों का मिलता साक्ष्य मुझमें,
तो बस किसी को नज़र आता टेढ़ी मेड़ी नदिया और उनकी धारा से हुआ किनारों पर कटाक्ष मुझमें।

यारियां, अय्याशियां, मयख़ाना, और साकीपन,
कोई न कोई दूर करता है मेरे ज़रिये अपना एकाकीपन।

दोस्त हूँ अख़बार सुबह की पहली चाय जैसे,
किसी के लिए हमदर्द, हमराज़ या कहूँ उसकी परछाई जैसे।

खेल हूँ अल्फाज़ो का कोई मुझे बस ऐसे चंद शब्दों में बयां कर जाता है,
तो कोई मुझे अलंकारो से सटीक नयी नवेली दुल्हन सा सजाता है।

कोई लापरवाही से किसी भी पन्ने पर लिख जाता मुझे,
तो कोई बड़े प्यार से रात में तकिया तले अपनी डायरी में। लिख थपकियाँ देकर सुलाता मुझे।

किसी का जुनून हूँ मैं,
तो किसी के लिए सुकून हूँ मैं।

किसी का पेशा, तो किसी का हुनर
तो किसी के लिए पहला प्यार हूँ मैं।

हाँ मैं कविता हूँ अपने कलमकार की,
शायद हूँ उसके जीवन का सार भी।
©saumyasinghvisen
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