रिश्ते तुम समझ नहीं पायी अपनी दिल्लगी चाय कि जो ह | हिंदी Poem

"रिश्ते तुम समझ नहीं पायी अपनी दिल्लगी चाय कि जो हरा पत्ता टूटा वो मेरा सजीवन था जो सूखा के पत्ती बनी वो मेरा पतझड़ था जो पानी ओर दूध मिलाया वो रस था मेरे एहसासो का जो चीनी तूने डाली वो मेरी ही मिठास थी तू ना समझ पायी मगर तेरे लबो को हर वक़्त मेरी ही प्यास थी.."

रिश्ते  तुम समझ नहीं पायी अपनी दिल्लगी चाय कि
जो हरा पत्ता टूटा वो मेरा सजीवन था
जो सूखा के पत्ती बनी वो मेरा पतझड़ था
जो पानी ओर दूध मिलाया वो रस था मेरे एहसासो का
जो चीनी तूने डाली वो मेरी ही मिठास थी
तू ना समझ पायी मगर तेरे लबो को हर वक़्त
 मेरी ही प्यास थी..

रिश्ते तुम समझ नहीं पायी अपनी दिल्लगी चाय कि जो हरा पत्ता टूटा वो मेरा सजीवन था जो सूखा के पत्ती बनी वो मेरा पतझड़ था जो पानी ओर दूध मिलाया वो रस था मेरे एहसासो का जो चीनी तूने डाली वो मेरी ही मिठास थी तू ना समझ पायी मगर तेरे लबो को हर वक़्त मेरी ही प्यास थी..

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