एक प्रसिद्ध लेखक पत्रकार और राजनयिक जो बेहद ही हंस | हिंदी समाज और संस

"एक प्रसिद्ध लेखक पत्रकार और राजनयिक जो बेहद ही हंसमुख स्वभाव और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी है। उनकी पत्रकारिता देश ही नहीं अपितु विदेश में भी प्रसिद्ध है। उन्होंने वैसे जगह पर भी पत्रकारिता की है जहां अन्य पत्रकारों के लिए संभव नहीं है।उनकी हसमुख प्रवृत्ति और हाजिर जवाब का कोई सानी नहीं है। एक समय की बात है वह एक सभा को संबोधित कर रहे थे , सभा में जनसैलाब उमड़ा था , लोग उन्हें सुनने के लिए दूर-दूर से आए हुए थे। जब वह अपना भाषण समाप्त कर बाहर निकले , तब उनकी ओर भीड़ ऑटोग्राफ के लिए बढ़ी। तभी एक नौजवान उस भीड़ से उनके सामने आया उस नौजवान ने उनसे कहा -” मैं आपका बहुत बड़ा श्रोता और प्रशंसक हूं , मैं साहित्य प्रेमी हूं , जिसके कारण मुझे आपकी लेखनी बेहद रुचिकर लगती है। इस कारण आप मेरे सबसे प्रिय लेखक भी हैं। मैंने आपकी सभी पुस्तकें पढ़ी है और आपके व्यक्तित्व को अपने जीवन में उतारना चाहता हूं। किंतु मैं ऐसा क्या करूं जिससे मैं एक अलग पहचान बना सकूं। आपकी तरह ख्याति पा सकूं।” ऐसा कहते हुए उस नौजवान ने अपनी पुस्तिका ऑटोग्राफ के लिए उनकी ओर बढ़ाई। उन्होंने उस समय कुछ नहीं कहा और उसकी पुस्तिका में कुछ शब्द लिखें और ऑटोग्राफ देकर उस नौजवान को पुस्तिका वापस कर दी। इस पुस्तिका में यह लिखा हुआ था – ” आप अपना समय स्वयं को पहचान दिलाने के लिए लगाएं , किसी दूसरे के ऑटोग्राफ से आपकी पहचान नहीं बनेगी। जो समय आप दूसरे लोगों को लिए देते हैं वह समय आप स्वयं के लिए दें। “ नौजवान इस जवाब को पढ़कर बेहद प्रसन्न हुआ और उसने उन्हें धन्यवाद कहा कि – “मैं आपका यह वचन जीवन भर याद रखूंगा और अपनी एक अलग पहचान बना कर दिखाऊंगा। “ उन्होंने उस नौजवान को धन्यवाद दिया और सफलता के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं भी दी। Moral of the story:- Create your own unique personality and identity instead of following others. The one who follows will always have to remain under the shadow of the topper. The biggest thing in life is respect and uniqueness you have for which people remember you. So stop following. Start creating followers. विष्णु सहस्रनाम(एक हजार नाम)आज 670 से 681 नाम :- 670 ब्राह्मणप्रियः जो ब्राह्मणों को प्रिय हैं 671 महाक्रमः जिनका डग महान है 672 महाकर्मा जगत की उत्पत्ति जैसे जिनके कर्म महान हैं 673 महातेजा जिनका तेज महान है 674 महोरगः जो महान उरग (वासुकि सर्परूप) है 675 महाक्रतुः जो महान क्रतु (यज्ञ) है 676 महायज्वा महान हैं और लोक संग्रह के लिए यज्ञानुष्ठान करने से यज्वा भी हैं 677 महायज्ञः महान हैं और यज्ञ हैं 678 महाहविः महान हैं और हवि हैं 679 स्तव्यः जिनकी सब स्तुति करते हैं लेकिन स्वयं किसीकी स्तुति नहीं करते 680 स्तवप्रियः जिनकी सभी स्तुति करते हैं 681 स्तोत्रम् वह गुण कीर्तन हैं जिससे उन्ही की स्तुति की जाती है 🙏बोलो मेरे सतगुरु श्री बाबा लाल दयाल जी महाराज की जय🌹 ©Vikas Sharma Shivaaya'"

 एक प्रसिद्ध लेखक पत्रकार और राजनयिक जो बेहद ही हंसमुख स्वभाव और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी है। उनकी पत्रकारिता देश ही नहीं अपितु विदेश में भी प्रसिद्ध है। उन्होंने वैसे जगह पर भी पत्रकारिता की है जहां अन्य पत्रकारों के लिए संभव नहीं है।उनकी हसमुख प्रवृत्ति और हाजिर जवाब का कोई सानी नहीं है। 

एक समय की बात है वह एक सभा को संबोधित कर रहे थे , सभा में जनसैलाब उमड़ा था , लोग उन्हें सुनने के लिए दूर-दूर से आए हुए थे।

जब वह अपना भाषण समाप्त कर बाहर निकले , तब उनकी ओर भीड़ ऑटोग्राफ के लिए बढ़ी। तभी एक नौजवान उस भीड़ से  उनके सामने आया उस नौजवान ने उनसे कहा -” मैं आपका बहुत बड़ा श्रोता और प्रशंसक हूं , मैं साहित्य प्रेमी हूं , जिसके कारण मुझे आपकी लेखनी बेहद रुचिकर लगती है। इस कारण आप मेरे सबसे प्रिय लेखक भी हैं। मैंने आपकी सभी पुस्तकें पढ़ी है और आपके व्यक्तित्व को अपने जीवन में उतारना चाहता हूं। किंतु मैं ऐसा क्या करूं जिससे मैं एक अलग पहचान बना सकूं। आपकी तरह ख्याति पा सकूं।”

ऐसा कहते हुए उस नौजवान ने अपनी पुस्तिका ऑटोग्राफ के लिए उनकी ओर बढ़ाई।

उन्होंने उस समय कुछ नहीं कहा और उसकी पुस्तिका में कुछ शब्द लिखें और ऑटोग्राफ देकर उस नौजवान को पुस्तिका वापस कर दी।

इस पुस्तिका में यह लिखा हुआ था  –

” आप अपना समय स्वयं को पहचान दिलाने के लिए लगाएं ,

किसी दूसरे के ऑटोग्राफ से आपकी पहचान नहीं बनेगी।

जो समय आप दूसरे लोगों को लिए देते हैं

वह समय आप स्वयं के लिए दें। “

नौजवान इस जवाब को पढ़कर बेहद प्रसन्न हुआ और उसने उन्हें धन्यवाद कहा कि –

“मैं आपका यह वचन जीवन भर याद रखूंगा और अपनी एक अलग पहचान बना कर दिखाऊंगा। “

उन्होंने उस नौजवान को धन्यवाद दिया और सफलता के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं भी दी।

Moral of the story:-

Create your own unique personality and identity instead of following others.

The one who follows will always have to remain under the shadow of the topper.

The biggest thing in life is respect and uniqueness you have for which people remember you.

So stop following. Start creating followers.

विष्णु सहस्रनाम(एक हजार नाम)आज 670  से 681 नाम :-
670 ब्राह्मणप्रियः जो ब्राह्मणों को प्रिय हैं
671 महाक्रमः जिनका डग महान है
672 महाकर्मा जगत की उत्पत्ति जैसे जिनके कर्म महान हैं
673 महातेजा जिनका तेज महान है
674 महोरगः जो महान उरग (वासुकि सर्परूप) है
675 महाक्रतुः जो महान क्रतु (यज्ञ) है
676 महायज्वा महान हैं और लोक संग्रह के लिए यज्ञानुष्ठान करने से यज्वा भी हैं
677 महायज्ञः महान हैं और यज्ञ हैं
678 महाहविः महान हैं और हवि हैं
679 स्तव्यः जिनकी सब स्तुति करते हैं लेकिन स्वयं किसीकी स्तुति नहीं करते
680 स्तवप्रियः जिनकी सभी स्तुति करते हैं
681 स्तोत्रम् वह गुण कीर्तन हैं जिससे उन्ही की स्तुति की जाती है

🙏बोलो मेरे सतगुरु श्री बाबा लाल दयाल जी महाराज की जय🌹

©Vikas Sharma Shivaaya'

एक प्रसिद्ध लेखक पत्रकार और राजनयिक जो बेहद ही हंसमुख स्वभाव और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी है। उनकी पत्रकारिता देश ही नहीं अपितु विदेश में भी प्रसिद्ध है। उन्होंने वैसे जगह पर भी पत्रकारिता की है जहां अन्य पत्रकारों के लिए संभव नहीं है।उनकी हसमुख प्रवृत्ति और हाजिर जवाब का कोई सानी नहीं है। एक समय की बात है वह एक सभा को संबोधित कर रहे थे , सभा में जनसैलाब उमड़ा था , लोग उन्हें सुनने के लिए दूर-दूर से आए हुए थे। जब वह अपना भाषण समाप्त कर बाहर निकले , तब उनकी ओर भीड़ ऑटोग्राफ के लिए बढ़ी। तभी एक नौजवान उस भीड़ से उनके सामने आया उस नौजवान ने उनसे कहा -” मैं आपका बहुत बड़ा श्रोता और प्रशंसक हूं , मैं साहित्य प्रेमी हूं , जिसके कारण मुझे आपकी लेखनी बेहद रुचिकर लगती है। इस कारण आप मेरे सबसे प्रिय लेखक भी हैं। मैंने आपकी सभी पुस्तकें पढ़ी है और आपके व्यक्तित्व को अपने जीवन में उतारना चाहता हूं। किंतु मैं ऐसा क्या करूं जिससे मैं एक अलग पहचान बना सकूं। आपकी तरह ख्याति पा सकूं।” ऐसा कहते हुए उस नौजवान ने अपनी पुस्तिका ऑटोग्राफ के लिए उनकी ओर बढ़ाई। उन्होंने उस समय कुछ नहीं कहा और उसकी पुस्तिका में कुछ शब्द लिखें और ऑटोग्राफ देकर उस नौजवान को पुस्तिका वापस कर दी। इस पुस्तिका में यह लिखा हुआ था – ” आप अपना समय स्वयं को पहचान दिलाने के लिए लगाएं , किसी दूसरे के ऑटोग्राफ से आपकी पहचान नहीं बनेगी। जो समय आप दूसरे लोगों को लिए देते हैं वह समय आप स्वयं के लिए दें। “ नौजवान इस जवाब को पढ़कर बेहद प्रसन्न हुआ और उसने उन्हें धन्यवाद कहा कि – “मैं आपका यह वचन जीवन भर याद रखूंगा और अपनी एक अलग पहचान बना कर दिखाऊंगा। “ उन्होंने उस नौजवान को धन्यवाद दिया और सफलता के लिए ढेर सारी शुभकामनाएं भी दी। Moral of the story:- Create your own unique personality and identity instead of following others. The one who follows will always have to remain under the shadow of the topper. The biggest thing in life is respect and uniqueness you have for which people remember you. So stop following. Start creating followers. विष्णु सहस्रनाम(एक हजार नाम)आज 670 से 681 नाम :- 670 ब्राह्मणप्रियः जो ब्राह्मणों को प्रिय हैं 671 महाक्रमः जिनका डग महान है 672 महाकर्मा जगत की उत्पत्ति जैसे जिनके कर्म महान हैं 673 महातेजा जिनका तेज महान है 674 महोरगः जो महान उरग (वासुकि सर्परूप) है 675 महाक्रतुः जो महान क्रतु (यज्ञ) है 676 महायज्वा महान हैं और लोक संग्रह के लिए यज्ञानुष्ठान करने से यज्वा भी हैं 677 महायज्ञः महान हैं और यज्ञ हैं 678 महाहविः महान हैं और हवि हैं 679 स्तव्यः जिनकी सब स्तुति करते हैं लेकिन स्वयं किसीकी स्तुति नहीं करते 680 स्तवप्रियः जिनकी सभी स्तुति करते हैं 681 स्तोत्रम् वह गुण कीर्तन हैं जिससे उन्ही की स्तुति की जाती है 🙏बोलो मेरे सतगुरु श्री बाबा लाल दयाल जी महाराज की जय🌹 ©Vikas Sharma Shivaaya'

एक प्रसिद्ध लेखक पत्रकार और राजनयिक जो बेहद ही हंसमुख स्वभाव और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी है। उनकी पत्रकारिता देश ही नहीं अपितु विदेश में भी प्रसिद्ध है। उन्होंने वैसे जगह पर भी पत्रकारिता की है जहां अन्य पत्रकारों के लिए संभव नहीं है।उनकी हसमुख प्रवृत्ति और हाजिर जवाब का कोई सानी नहीं है।

एक समय की बात है वह एक सभा को संबोधित कर रहे थे , सभा में जनसैलाब उमड़ा था , लोग उन्हें सुनने के लिए दूर-दूर से आए हुए थे।

जब वह अपना भाषण समाप्त कर बाहर निकले , तब उनकी ओर भीड़ ऑटोग्राफ के लिए बढ़ी। तभी एक नौजवान उस भीड़ से उनके सामने आया उस नौजवान ने उनसे कहा -” मैं आपका बहुत बड़ा श्रोता और प्रशंसक हूं , मैं साहित्य प्रेमी हूं , जिसके कारण मुझे आपकी लेखनी बेहद रुचिकर लगती है। इस कारण आप मेरे सबसे प्रिय लेखक भी हैं। मैंने आपकी सभी पुस्तकें पढ़ी है और आपके व्यक्तित्व को अपने जीवन में उतारना चाहता हूं। किंतु मैं ऐसा क्या करूं जिससे मैं एक अलग पहचान बना सकूं। आपकी तरह ख्याति पा सकूं।”

ऐसा कहते हुए उस नौजवान ने अपनी पुस्तिका ऑटोग्राफ के लिए उनकी ओर बढ़ाई।

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