मैं प्यासी रेत रेगिस्तान की, तू समंदर में उठी लहर | हिंदी Poem

"मैं प्यासी रेत रेगिस्तान की, तू समंदर में उठी लहर.. मैं गांव एक बियाबान सा, तू जीता - जागता शहर.. मैं सुनसान रात बरसात की, तू सर्दी में शिखर दोपहर.. मैं कोई तुकबंदी "वत्स" की, तू 'ग़ालिब' की गजल-बहर... ©dr Vats"

मैं प्यासी रेत रेगिस्तान की, 
तू समंदर में उठी लहर.. 

मैं गांव एक बियाबान सा, 
तू जीता - जागता शहर..

मैं सुनसान रात बरसात की,
तू सर्दी में शिखर दोपहर.. 

मैं कोई तुकबंदी "वत्स" की, 
तू 'ग़ालिब' की गजल-बहर...
                             ©dr Vats

मैं प्यासी रेत रेगिस्तान की, तू समंदर में उठी लहर.. मैं गांव एक बियाबान सा, तू जीता - जागता शहर.. मैं सुनसान रात बरसात की, तू सर्दी में शिखर दोपहर.. मैं कोई तुकबंदी "वत्स" की, तू 'ग़ालिब' की गजल-बहर... ©dr Vats

Tukbandi 'Vats' ki..
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