आजकल यूँही कागजों पर आरे तिरछे लकीड़ें खेंच कर मिटा | हिंदी कविता

"आजकल यूँही कागजों पर आरे तिरछे लकीड़ें खेंच कर मिटाया नहीं करता! हाँ तुम्हें लिखने में, मैं अब वक़्त जाया नहीं करता!! - क्रांति"

आजकल यूँही कागजों पर आरे तिरछे लकीड़ें खेंच कर मिटाया नहीं करता!
हाँ तुम्हें लिखने में,
मैं अब वक़्त जाया नहीं करता!!

- क्रांति

आजकल यूँही कागजों पर आरे तिरछे लकीड़ें खेंच कर मिटाया नहीं करता! हाँ तुम्हें लिखने में, मैं अब वक़्त जाया नहीं करता!! - क्रांति

#वक़्त_जाया_नहीं_करता

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