Rishikesh kashyap

Rishikesh kashyap Lives in Begusarai, Bihar, India

||लेखक|| लिखता हूँ कुछ पंक्तियाँ शब्दों के मायाजाल से शब्द को तलाश कर अपनी रुह से हर छंदों को जोड़कर करता हूँ तैयार दैनिक परिस्थितियों को अखबारों के पन्नों को निचोड़कर लिखता हूँ कभी मां पर जिसमें ममत्व का एहसास झलकता है हरिश्रृंगार पुष्प के समान सदैव सौरभ महकता है कभी लिखता हूँ ऐतिहासिक स्थलों पर जो भारत भूमि का वैभव है कभी लिखता हूँ बच्चों पर जिन्हें राष्ट्र हित पर गौरव है उस निर्धन बच्चों पर भी लिखता हूँ जो पढ़ ना सके गरीबी से दरिंदगी की शिकार हुई बच्चियों पर भी कभी कभी टिप्पणी करता हूँ आप भी देखो पढकर कभी क्या लिखता हूँ,कैसा लिखता हूँ❓ जो कुछ भी लिखता हूँ सच्चे हृदय से लिखता हूँ - ऋषिकेश

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"||गौड़ा श्रृंगार व्यथा|| (कविता अनुशीर्षक में पढ़ें) ©ऋषिकेश कश्यप"

||गौड़ा श्रृंगार व्यथा||

(कविता अनुशीर्षक में पढ़ें)

©ऋषिकेश कश्यप

प्रणय मंडप में बैठी गौड़ा
मन ही मन रहीं विचार
पिया मिलन की व्याकुलता के कारण
कहीं छूट ना गया हो कोई श्रृंगार

नयनों में काजल से पलकें झुकाए
स्वर्णिम नथ से नाक की शोभा बढ़ाए
फिर भी रहीं विचार

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"||एक कहानी बचपन की|| देख कर उन तितलियों को आज भी कोमल मन मचल उठता है दौड़ लगाना चाहूँ भी तो रुक जाता हूँ पता नहीं शायद ये उम्र फिर से वही बचपन जीना चाहता है कभी जागता है चाहत उस चांद को अपने दामन में पाने की एक बडे़ पात्र में जल भर कर फिर से सबके नजरों से चुराने की बनाना चाहता हूँ वो मिट्टी के छोटे छोटे खिलौनें जिसमें खुशियों का खज़ाना था लौटना चाहता हूँ फिर उसी वस्ती में जिसका कोई ना ठिकाना था उस गरजती हुई घटाओं से सहम कर माँ के आंचल में छुपना चाहता हूँ वो कागज़ की कश्ती को फिर से बारिश में बहाना चाहता हूँ ©ऋषिकेश कश्यप"

||एक कहानी बचपन की||
देख कर उन तितलियों को
आज भी कोमल मन मचल उठता है
दौड़ लगाना चाहूँ भी तो रुक जाता हूँ
पता नहीं शायद ये उम्र फिर से वही
बचपन जीना चाहता है

कभी जागता है चाहत
उस चांद को 
अपने दामन में पाने की
एक बडे़ पात्र में जल भर कर
फिर से सबके नजरों से चुराने की

बनाना चाहता हूँ वो 
मिट्टी के छोटे छोटे खिलौनें
जिसमें खुशियों का खज़ाना था
लौटना चाहता हूँ फिर उसी वस्ती में
जिसका कोई ना ठिकाना था

उस गरजती हुई घटाओं से
सहम कर माँ के आंचल में
छुपना चाहता हूँ
वो कागज़ की कश्ती को 
फिर से बारिश में बहाना चाहता हूँ

©ऋषिकेश कश्यप

@Dhaansu Bhai @Sreya Chakraborty @haramii ricky @Kalakar Ambuj Rai @म सून्दर @म सून्दर

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"||श्रीराम अग्रजा "शांता" का त्याग|| (सम्पूर्ण कविता अनुशीर्षक में पढ़ें) ©ऋषिकेश कश्यप"

||श्रीराम अग्रजा "शांता" का त्याग||

(सम्पूर्ण कविता अनुशीर्षक में पढ़ें)

©ऋषिकेश कश्यप

यश-कृति की कामना, रहीं ना कुछ भी शेष|
निसंतानता की भावना थीं उनमें विशेष|
रघुवंश की जीवन रेखा सीमित मात्र थीं दशरथ पर|
विद्यमान जीवन शैली हो रहा था भारी, तब रानी कौशल्या ने जन्मीं एक नन्ही सुकुमारी|
संतानहीनता की पीड़ा को भर दिया "शांता" ने सारी|
फिर भी दशरथ के मन में पुत्र लालसा था भारी|
दशरथ की भावना को देखते, कौशल्या ने दो भिन्न विवाह रचा दी|
बीत गयी जब सोलह वर्ष,पुनः पुत्रविहिन रह गए दंपत्ति|

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"||विनम्र श्रद्धांजलि|| {माँ की 8वीं पूण्यतिथि पर कुछ विशेष पंक्तियाँ} #16 नवंबर 2012# [कविता अनुशीर्षक में पढ़ें] -ऋषिकेश ©ऋषिकेश कश्यप"

||विनम्र श्रद्धांजलि||

{माँ की 8वीं पूण्यतिथि पर कुछ विशेष पंक्तियाँ}

#16 नवंबर 2012#

[कविता अनुशीर्षक में पढ़ें]

-ऋषिकेश

©ऋषिकेश कश्यप

निष्प्राण तस्वीर पर अब
श्रद्धा सुमन अर्पित करने आया
कर स्वीकार अभिनंदन मेरा
आपके चरणों का वंदन करने आया

साथ खड़ीं रही हर मंजिल पर मेरी
कठिन क्षणों में दिया साथ मेरा
प्रेम अनंत मिला आपसे

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"||होने दो फिर से बलात्कार|| (कविता अनुशीर्षक में पढ़ें) ©ऋषिकेश कश्यप"

||होने दो फिर से बलात्कार||


(कविता अनुशीर्षक में पढ़ें)

©ऋषिकेश कश्यप

जला कर लाखों मोमबत्तीयां को
सड़कों पर शोर मचाएंगे
होने दो फिर से बलात्कार
अगली बार आवाज उठाएंगे

छोटे कपड़े पहनती है तो
उसकी सोच को भी छोटी बताएंगे
होने दो फिर से बलात्कार

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