ऋषिकेश कश्यप

ऋषिकेश कश्यप Lives in Begusarai, Bihar, India

||लेखक|| लिखता हूँ कुछ पंक्तियाँ शब्दों के मायाजाल से शब्द को तलाश कर अपनी रुह से हर छंदों को जोड़कर करता हूँ तैयार दैनिक परिस्थितियों को अखबारों के पन्नों को निचोड़कर लिखता हूँ कभी मां पर जिसमें ममत्व का एहसास झलकता है हरिश्रृंगार पुष्प के समान सदैव सौरभ महकता है कभी लिखता हूँ ऐतिहासिक स्थलों पर जो भारत भूमि का वैभव है कभी लिखता हूँ बच्चों पर जिन्हें राष्ट्र हित पर गौरव है उस निर्धन बच्चों पर भी लिखता हूँ जो पढ़ ना सके गरीबी से दरिंदगी की शिकार हुई बच्चियों पर भी कभी कभी टिप्पणी करता हूँ आप भी देखो पढकर कभी क्या लिखता हूँ,कैसा लिखता हूँ❓ जो कुछ भी लिखता हूँ सच्चे हृदय से लिखता हूँ - ऋषिकेश

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"मौन हो रहा हूँ मैं अपने जीवन के किरदार से कभी किसी प्रकार का बैर न रखना दो विदाई मुझे प्यार से उन हसीन लम्हों को साथ जिया हमनें साथ लड़े-झगड़े और रहे भी प्यार से ना रखना कटुता हृदय में अब तो दे दो विदाई मुझे प्यार से जीवन पथ के इन कठिन पल में जीवंतता के दृढ़ भार को भी ढो रहा हूँ मुझ सा अभागा और कोई ना अपनों का भी अब साथ छोड़ रहा हूँ माँ के ना रहते हुए भी कितने प्रयत्नों से पाला था आपने वृद्धावस्था के इस कठिन काल में आपका भी दामन छोड़ रहा हूँ जीवंतता के तराजू पर अपनों से ज्यादा दुःख का भार हो गया इतनी पीड़ा अब तो सहन ना हो रही करने अब अपने जीवन का अंत चला शिकायतों को संजोए दिल में रखना ना करना इंकार अपनी छवि तो आपके दिल में बना चला मन से देना मुझे प्यार प्रकृति के विरुद्ध अपनी जीवन-लीला समाप्त कर रहा हूँ खुद से फिर भी दे दो विदाई मुझे प्यार से -ऋषिकेश"

मौन हो रहा हूँ मैं 
अपने जीवन के किरदार से
कभी किसी प्रकार का बैर न रखना
दो विदाई मुझे प्यार से

उन हसीन लम्हों को साथ जिया हमनें
साथ लड़े-झगड़े और रहे भी प्यार से
ना रखना कटुता हृदय में
अब तो दे दो विदाई मुझे प्यार से

जीवन पथ के इन कठिन पल में
जीवंतता के दृढ़ भार को भी ढो रहा हूँ
मुझ सा अभागा और कोई ना
अपनों का भी अब साथ छोड़ रहा हूँ

माँ के ना रहते हुए भी कितने प्रयत्नों से पाला था आपने
वृद्धावस्था के इस कठिन काल में
आपका भी दामन छोड़ रहा हूँ

जीवंतता के तराजू पर
अपनों से ज्यादा दुःख का भार हो गया
इतनी पीड़ा अब तो सहन ना हो रही
करने अब अपने जीवन का अंत चला

शिकायतों को संजोए दिल में रखना
ना करना इंकार
अपनी छवि तो आपके दिल में बना चला
मन से देना मुझे प्यार

प्रकृति के विरुद्ध अपनी जीवन-लीला समाप्त कर रहा हूँ खुद से
फिर भी दे दो विदाई मुझे प्यार से
-ऋषिकेश

#Stars&Me

133 Love

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"||लेखक|| लिखता हूँ कुछ पंक्तियाँ शब्दों के मायाजाल से शब्द को तलाश कर अपनी रुह से हर छंदों को जोड़कर करता हूँ तैयार दैनिक परिस्थितियों को अखबारों के पन्नों को निचोड़कर लिखता हूँ कभी मां पर जिसमें ममत्व का एहसास झलकता है हरिश्रृंगार पुष्प के समान सदैव सौरभ महकता है कभी लिखता हूँ ऐतिहासिक स्थलों पर जो भारत भूमि का वैभव है कभी लिखता हूँ बच्चों पर जिन्हें राष्ट्र हित पर गौरव है उस निर्धन बच्चों पर भी लिखता हूँ जो पढ़ ना सके गरीबी से दरिंदगी की शिकार हुई बच्चियों पर भी कभी कभी टिप्पणी करता हूँ आप भी देखो पढकर कभी क्या लिखता हूँ,कैसा लिखता हूँ❓ जो कुछ भी लिखता हूँ सच्चे हृदय से लिखता हूँ - ऋषिकेश"

||लेखक||
लिखता हूँ कुछ पंक्तियाँ
शब्दों के मायाजाल से शब्द को तलाश कर
अपनी रुह से हर छंदों को जोड़कर
करता हूँ तैयार दैनिक परिस्थितियों को
अखबारों के पन्नों को निचोड़कर

लिखता हूँ कभी मां पर
जिसमें ममत्व का एहसास झलकता है
हरिश्रृंगार पुष्प के समान
सदैव सौरभ महकता है

कभी लिखता हूँ ऐतिहासिक स्थलों पर
जो भारत भूमि का वैभव है
कभी लिखता हूँ बच्चों पर
जिन्हें राष्ट्र हित पर गौरव है

उस निर्धन बच्चों पर भी लिखता हूँ
जो पढ़ ना सके गरीबी से
दरिंदगी की शिकार हुई बच्चियों पर भी
कभी कभी टिप्पणी करता हूँ

आप भी देखो पढकर कभी
क्या लिखता हूँ,कैसा लिखता हूँ❓
जो कुछ भी लिखता हूँ
सच्चे हृदय से लिखता हूँ
- ऋषिकेश

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124 Love

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"||गुस्ताखी|| कितने वर्षों से जानते हो मुझे मेरी शरारतों से तुम चूक गए लडाई झगड़े की कोई बात भी नहीं थी फिर क्यों तुम पीछे छूट गए क्षमा चाहता हूँ हे मित्र अंजानें में खरीं-खोंटी बोल गया इतना तो हक था तेरी दोस्ती पर मुझे फिर क्यों तुम मुझसे रुठ गया नादानियां बसीं थी मन में मेरी बिना सोचे समझे कुछ बोल दिया तेरी बातों को मैंने हृदय से भी ना लगाया फिर क्यों तुमनें मुंह मोड़ लिया तुम्हें दुखी करने में मेरा कोई लोभ न था फिर क्यों तुम नें भी परस्पर विरोध ना किया जैसे मेरी हर एक खता तुम्हारे लिए शरारतें थीं ठीक उसी तरह तुम्हारी हर अदा मेरी मुस्कुराहटें थीं मेरी कही-सुनीं को हृदय से ना लगाना अगर सक्षम हो तो भूल भी जाना यूँ रुठे रहोगे अगर तुम मुझसे मैं जीते जी मर जाऊँगा दिक्कतें आईं हैं मेरी बातों से तो मैं दूर कहीं चला जाऊँगा मेरे वापस आने की राह भी मत देखना इस मोह-माया के संसार से दूर कहीं निकल जाऊँगा -ऋषिकेश (क्षमा मित्र😔😢)"

||गुस्ताखी||
कितने वर्षों से जानते हो मुझे
मेरी शरारतों से तुम चूक गए
लडाई झगड़े की कोई बात भी नहीं थी
फिर क्यों तुम पीछे छूट गए

क्षमा चाहता हूँ हे मित्र
अंजानें में खरीं-खोंटी बोल गया
इतना तो हक था तेरी दोस्ती पर मुझे
फिर क्यों तुम मुझसे रुठ गया

नादानियां बसीं थी मन में मेरी
बिना सोचे समझे कुछ बोल दिया
तेरी बातों को मैंने हृदय से भी ना लगाया
फिर क्यों तुमनें मुंह मोड़ लिया

तुम्हें दुखी करने में मेरा कोई लोभ न था
फिर क्यों तुम नें भी परस्पर विरोध ना किया
जैसे मेरी हर एक खता तुम्हारे लिए शरारतें थीं
ठीक उसी तरह तुम्हारी हर अदा मेरी मुस्कुराहटें थीं

मेरी कही-सुनीं को हृदय से ना लगाना
अगर सक्षम हो तो भूल भी जाना
यूँ रुठे रहोगे अगर तुम मुझसे
मैं जीते जी मर जाऊँगा

दिक्कतें आईं हैं मेरी बातों से तो
मैं दूर कहीं चला जाऊँगा
मेरे वापस आने की राह भी मत देखना
इस मोह-माया के संसार से दूर कहीं निकल जाऊँगा
-ऋषिकेश
                       (क्षमा मित्र😔😢)

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117 Love

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"#पुत्र-वियोग# रुठ गयी हूँ मैं तुझसे,बात भी मत करना तु मुझसे कितने यातनाओं से पाला था,क्या यही दिन दिखाने तुम्हें यहाँ आना था कितना कठिन था जीवन उनका,फिर भी सामना किया उसका तुझ पर क्या विपत्ति आयी जो इतनी जल्दी तु चला आया जीवन-रथ की सारथी थीं मैं कालचक्र की उर्मि में मैं तो पीछे मुड़ गयी लेकिन तु तो था नेत्र उनका फिर क्यों तु पिता को छोड़ आया मेरे यहाँ आने की तत्परता के कारण कितने असहजताओं की उन्होंने लड़ी लडा़ई मैं सुहागन होने के साथ एक अभागन भी थीं जो जीवन पथ पर उनको अकेला छोड़ आई पत्नी वियोग की पीड़ा को किसी प्रकार वो झेल गए लेकिन पुत्र वियोग की पीड़ा तो असहनीय होगा उनके लिए क्या थीं तत्परता तुम्हें यहाँ आने की कौन सी पीड़ा तुम्हें बरदास्त ना हुआ जो ऐसा तुने कुकर्म किया अभी तो पूरा जीवन था,साथ पिता का देना था क्या कोई परेशानी थीं,जो माँ से मिलने इतना जल्दी तुझे आना था -ऋषिकेश"

#पुत्र-वियोग#
रुठ गयी हूँ मैं तुझसे,बात भी मत करना तु मुझसे
कितने यातनाओं से पाला था,क्या यही दिन दिखाने तुम्हें यहाँ आना था

कितना कठिन था जीवन उनका,फिर भी सामना किया उसका
तुझ पर क्या विपत्ति आयी जो इतनी जल्दी तु चला आया

जीवन-रथ की सारथी थीं मैं
कालचक्र की उर्मि में मैं तो पीछे मुड़ गयी
लेकिन तु तो था नेत्र उनका फिर क्यों तु पिता को छोड़ आया

मेरे यहाँ आने की तत्परता के कारण
कितने असहजताओं की उन्होंने लड़ी लडा़ई
मैं सुहागन होने के साथ एक अभागन भी थीं
जो जीवन पथ पर उनको अकेला छोड़ आई

पत्नी वियोग की पीड़ा को किसी प्रकार वो झेल गए
लेकिन पुत्र वियोग की पीड़ा तो असहनीय होगा उनके लिए

क्या थीं तत्परता तुम्हें यहाँ आने की
कौन सी पीड़ा तुम्हें बरदास्त ना हुआ जो ऐसा तुने कुकर्म किया

अभी तो पूरा जीवन था,साथ पिता का देना था
क्या कोई परेशानी थीं,जो माँ से मिलने इतना जल्दी तुझे आना था
                                          -ऋषिकेश

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"||याद करो कुर्बानी|| साक्षात्कार करो उनका उस देशानुरागी सेनानी का देशहित में अपना बलिदान दिया जिन्होंने मत करना मोल उनकी कुर्बानी का भूल बैठे हो तुम जिन्हें आजाद,सुभाष जैसे महादानी को साम्प्रदायिक राष्ट्र के खातिर जिन्होंने न्योछावर किये अपनी जवानी को धर्म देश की रक्षा हेतु अंग्रेजों के समक्ष डटी रही महाबलिदानी इतिहास के पन्नों में सिमट कर ही रह गई शुद्र मातंगिनी और तारा रानी धर्म-सपूत मंगल और भगत ना डरे अंग्रेज़ों के अत्याचारों से बाल उम्र में रचा इतिहास खुदीराम ने अपने स्वाभिमानी विचारों से मूल्य नहीं कर सकता कोई इनके अमर बलिदानों को सुप्रसिद्ध रचयिता बने इतिहास का जरा याद करो इनकी कुर्बानी को -ऋषिकेश"

||याद करो कुर्बानी||
साक्षात्कार करो उनका
उस देशानुरागी सेनानी का
देशहित में अपना बलिदान दिया जिन्होंने
मत करना मोल उनकी कुर्बानी का

भूल बैठे हो तुम जिन्हें
आजाद,सुभाष जैसे महादानी को
साम्प्रदायिक राष्ट्र के खातिर जिन्होंने
न्योछावर किये अपनी जवानी को

धर्म देश की रक्षा हेतु
अंग्रेजों के समक्ष डटी रही महाबलिदानी
इतिहास के पन्नों में सिमट कर ही रह गई
शुद्र मातंगिनी और तारा रानी

धर्म-सपूत मंगल और भगत
ना डरे अंग्रेज़ों के अत्याचारों से
बाल उम्र में रचा इतिहास खुदीराम ने
अपने स्वाभिमानी विचारों से

मूल्य नहीं कर सकता कोई
इनके अमर बलिदानों को
सुप्रसिद्ध रचयिता बने इतिहास का
जरा याद करो इनकी कुर्बानी को
-ऋषिकेश

#independenceday2020 @Prashant Kumar @Love Inspector Raj @Mukesh kaushal @Bnna 99 @Divya N

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