Adarsh Singh

Adarsh Singh Lives in Bahraich, Uttar Pradesh, India

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"जिस डगर पर भटकता रहा उम्र भर वो डगर क्या तुम्हारे ही घर जाती है आस दिल में लिये मैं खड़ा हूँ वहीँ कब तू दुनिया से होकर के घर आती है"

जिस डगर पर भटकता रहा उम्र भर 
वो डगर क्या तुम्हारे ही घर जाती है 
आस दिल में लिये मैं खड़ा हूँ वहीँ 
कब तू दुनिया से होकर के घर आती है

#nojotowriters

#walkingalone

64 Love

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"जरा खेतों के भी तरफ देखो , जख्म दिख जाएंगे किसानों में कितने शाखों पर लटक जाते हैं , सिर्फ इस बात को बताने में । लाडली उम्र पर है ब्याह के अब , फसल सूखी पड़ी कुम्भला रही है थके चेहरे पर चिन्ता की लकीरें , गरीबी साथ बढ़ती जा रही है बड़ा मजबूर है ये देव भू का , कर्ज के रेत को चबाने में जरा खेतों के भी तरफ देखो , जख्म दिख जाएंगे किसानों में । मन हूआ छुटकी भी स्कूल जाए , मगर माँ की दवाई जा रही है नहीं कटती रजाई बिन जो रातें , समझदारी में कटती जा रही है न बदला हाल पर मौसम है बदला , ये सर्दी और बढ़ती जा रही है देखकर कांपते मासूम बचपन , गरीबी खुद में ही शर्मा रही है मुझे बस याद करती है हुकूमत , सियासी रोटियां पकाने में जरा खेतों के भी तरफ देखो , जख्म दिख जाएंगे किसानों में। सियासी पर्व अब है आने वाला , कृषक तब याद उनको आ रहा है कहाँ पर किसको है कैसे फसाना , कई फन्दा बनाया जा रहा है बजट के जाल पर रोटी बिछाकर , ख़्वाब झूठा दिखाया जा रहा है शहर से गांव तक हर रेलियों में , झूठ का घर बनाया जा रहा है बहुत मेहनत हुकूमत कर रही है , हमारी अर्थियां सजाने में । जरा खेतों के भी तरफ देखो , जख्म दिख जाएंगे किसानों में। कितने शाखों से लटक जाते हैं , सिर्फ इस बात को बताने में।। आदर्श सिंह ©aadarsh thakur"

जरा खेतों के भी तरफ देखो , जख्म दिख जाएंगे किसानों में
कितने शाखों पर लटक जाते हैं , सिर्फ इस बात को बताने में ।
लाडली उम्र पर है ब्याह के अब , फसल सूखी पड़ी कुम्भला रही है
थके चेहरे पर चिन्ता की लकीरें , गरीबी साथ बढ़ती जा रही है
बड़ा मजबूर है ये देव भू का , कर्ज के रेत को चबाने में
जरा खेतों के भी तरफ देखो , जख्म दिख जाएंगे किसानों में ।
मन हूआ छुटकी भी स्कूल जाए , मगर माँ की दवाई जा रही है
नहीं कटती रजाई बिन जो रातें , समझदारी में कटती जा रही है
न बदला हाल पर मौसम है बदला , ये सर्दी और बढ़ती जा रही है
देखकर कांपते मासूम बचपन , गरीबी खुद में ही शर्मा रही है
मुझे बस याद करती है हुकूमत , सियासी रोटियां पकाने में
जरा खेतों के भी तरफ देखो , जख्म दिख जाएंगे किसानों में।
सियासी पर्व अब है आने वाला , कृषक तब याद उनको आ रहा है
कहाँ पर किसको है कैसे फसाना , कई फन्दा बनाया जा रहा है
बजट के जाल पर रोटी बिछाकर , ख़्वाब झूठा दिखाया जा रहा है
शहर से गांव तक हर रेलियों में , झूठ का घर बनाया जा रहा है
बहुत मेहनत हुकूमत कर रही है , हमारी अर्थियां सजाने में ।
जरा खेतों के भी तरफ देखो , जख्म दिख जाएंगे किसानों में।
कितने शाखों से लटक जाते हैं , सिर्फ इस बात को बताने में।।
आदर्श सिंह

©aadarsh thakur

#nojotohindi2020 #anamikajain #IndianWritingCommunity #status#Poetry #nojotonews____ #anamikajain

#FarmBill2020
#nojotowriters

#InspireThroughWriting

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"उसने हँस हँस कर देखा है जिसे उनके आँखो को अब दीवाना कहा जाएगा । 'आदर्श '"

उसने हँस हँस कर देखा है जिसे 
उनके आँखो को अब दीवाना कहा जाएगा ।

            'आदर्श '

#loveaajkal

#InspireThroughWriting

101 Love

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"नींद आई है,  बस इतना कहकर।  सो रहे मुझको ताउम्र जगाने वाले।"

नींद आई है,  बस इतना कहकर। 

सो रहे  मुझको ताउम्र  जगाने वाले।

#Shikayat
#Aapbeeti

#InspireThroughWriting

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"    और बताओ कैसी हो, पिछले बार मिली थी क्या तुम अब भी वैसी हो, और बताओ कैसी हो अब भी क्या कोई तेरे बातों को काट नहीं पाता अब भी क्या कोई तेरे चेहरे को भांप नहीं पाता अब भी क्या कोई तेरे आंखों को पढ़ता रहता है अब भी क्या कोई तेरे सांसों में चलता रहता है अब भी क्या चुप होने वाला गुस्सा करती रहती हो और बताओ कैसी हो, पिछले बार मिली थी क्या तुम अब भी वैसी हो,और बताओ कैसी हो अब भी क्या चर्चा में रहती तुम अपने अंगड़ाई से अब भी क्या दिन काट रही हो स्वेटर और सलाई से अब भी क्या तुमको कोई देखा करता है चोरी से अब भी क्या मेरी बातें करती हो खास सहेली से अब भी क्या बातों बातों में जिद्द पर अड़ती रहती हो और बताओ कैसी हो, पिछले बार मिली थी क्या तुम अब भी वैसी हो, और बताओ कैसी हो और बताओ और बताओ अब भी तुम कहती हो क्या अच्छे थे कुछ ख़्वाब हमारे ख़्वाबों में रहती हो क्या मन में सब जज़्बात छिपाए अब भी हंसती रहती क्या मेरा सब कुछ ठीक ठाक है अब भी कहती रहती क्या मेरी सारी बात अधूरी , तू हंस दे हो जाए पूरी तेरे आंखों की मंजूरी, मिल जाए मिट जाए दूरी मैं तो पत्थर बन बैठा हूं, तुम क्या करती रहती हो और बताओ कैसी हो, पिछले बार मिली थी क्या तुम अब भी वैसी हो, और बताओ कैसी हो...आदर्श ..."

 

 

और बताओ कैसी हो, पिछले बार मिली थी
क्या तुम अब भी वैसी हो, और बताओ कैसी हो
अब भी क्या कोई तेरे बातों को काट नहीं पाता
अब भी क्या कोई तेरे चेहरे को भांप नहीं पाता
अब भी क्या कोई तेरे आंखों को पढ़ता रहता है
अब भी क्या कोई तेरे सांसों में चलता रहता है
अब भी क्या चुप होने वाला गुस्सा करती रहती हो
और बताओ कैसी हो, पिछले बार मिली थी
क्या तुम अब भी वैसी हो,और बताओ कैसी हो

अब भी क्या चर्चा में रहती तुम अपने अंगड़ाई से
अब भी क्या दिन काट रही हो स्वेटर और सलाई से
अब भी क्या तुमको कोई देखा करता है चोरी से
अब भी क्या मेरी बातें करती हो खास सहेली से
अब भी क्या बातों बातों में जिद्द पर अड़ती रहती हो
और बताओ कैसी हो, पिछले बार मिली थी
क्या तुम अब भी वैसी हो, और बताओ कैसी हो

और बताओ और बताओ अब भी तुम कहती हो क्या
अच्छे थे कुछ ख़्वाब हमारे ख़्वाबों में रहती हो क्या
मन में सब जज़्बात छिपाए अब भी हंसती रहती क्या
मेरा सब कुछ ठीक ठाक है अब भी कहती रहती क्या
मेरी सारी बात अधूरी , तू हंस दे हो जाए पूरी
तेरे आंखों की मंजूरी, मिल जाए मिट जाए दूरी
मैं तो पत्थर बन बैठा हूं, तुम क्या करती रहती हो
और बताओ कैसी हो, पिछले बार मिली थी
क्या तुम अब भी वैसी हो, और बताओ कैसी हो...आदर्श ...

#MoonHiding #बातचीत #कहासुनी

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