रजनीश

रजनीश "स्वच्छंद" Lives in New Delhi, Delhi, India

खुद की रूह को तलाशता एक आज़ाद परिंदा।।।।9811656875।।।।

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कौन है जो बालों का राज़ मेरे है खोलता।।
ये दवा लो वो दवा लो है गूगल भी बोलता।

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फूंक फूंक कर चल।।

ये दुनिया मायाजाल रे बंदे फूंक फूंक कर चल।
उलझे हैं कई सवाल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

अपना पराया कौन, किस हाथ छुरी किस मुंह राम,
बस चलते बांहें डाल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

तेरी व्यथा कौन है सुनता, बस सुन इठलाते लोग,
बस पूछेंगे तेरा हाल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

अपने जड़ को जमा जमीं में दे पानी तू सींच,
फिर निकलेंगे डाल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

कौन तुझे है राह दिखाता, सूध है लेता कौन,
मकड़ी बन बुनते जाल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

पहिया समय का घूम रहा, कहीं न इसका ठौर,
साथी कभी कभी काल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

किसे समय जो तेरी सुन ले, सबकी अपनी माया,
क्यूँ बैठ बजाए गाल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

तेरी किस्मत हाथों में तेरे, तू जोहे किसकी बाट,
बस रहे बीतते साल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

©रजनीश "स्वछंद"

फूंक फूंक कर चल।।

ये दुनिया मायाजाल रे बंदे फूंक फूंक कर चल।
उलझे हैं कई सवाल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

अपना पराया कौन, किस हाथ छुरी किस मुंह राम,
बस चलते बांहें डाल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

तेरी व्यथा कौन है सुनता, बस सुन इठलाते लोग,
बस पूछेंगे तेरा हाल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

अपने जड़ को जमा जमीं में दे पानी तू सींच,
फिर निकलेंगे डाल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

कौन तुझे है राह दिखाता, सूध है लेता कौन,
मकड़ी बन बुनते जाल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

पहिया समय का घूम रहा, कहीं न इसका ठौर,
साथी कभी कभी काल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

किसे समय जो तेरी सुन ले, सबकी अपनी माया,
क्यूँ बैठ बजाए गाल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

तेरी किस्मत हाथों में तेरे, तू जोहे किसकी बाट,
बस रहे बीतते साल रे बन्दे फूंक फूंक कर चल।

©रजनीश "स्वछंद"
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है अंधेरा छंट रहा, फिर भी रौशनी की दरकार है।।
सूर्य रश्मि है चरम पर, फिर क्यूँ दीये पर 
वार है।।

है अंधेरा छंट रहा, फिर भी रौशनी की दरकार है।।
सूर्य रश्मि है चरम पर, फिर क्यूँ दीये पर वार है।।
#Quotes

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शीला लेख।।

छेनी हथौड़ी हाथ मे ले, स्मृतियों की वक्षशीला पर,
शब्द हूँ मैं कुरेदता।।
बन दधीचि अस्थियों का ले तूणीर तरकश में भर,
तम हूँ मैं भेदता।।

धीर स्थिर अन्तःकरण का, नीर ले आंखों में भर,
तार हूँ मैं छेड़ता।
मूक बधिर मैं सूरदास, शब्ददृष्टि संग लिए समर
पार हूँ मैं देखता।।

शिशु, बालक, वयस्क, वृद्ध, सबके मन वास कर,
ज्ञानचक्षु मैं फेरता।
कोई सबल, निर्बल हो या हो दिनचर या निशाचर,
दर्द सबकी टेरता।।

पौरुष का हुंकार भी मैं, नारी का गहना मान बन,
निज से हूं झेंपता।
पवनसुत का बल कभी तो कभी कान्हा समान बन,
वस्त्र भी हूँ फेंकता।।

शब्द की महत्ता जो समझे, बन स्तंभ अशोक का,
ज्ञान हूँ मैं टेकता।।
बन शीला लेख मैं, खुशी से परे, बिन शोक का,
जन जन को मैं सेवता।।

©रजनीश "स्वछंद"

शीला लेख।।

छेनी हथौड़ी हाथ मे ले, स्मृतियों की वक्षशीला पर,
शब्द हूँ मैं कुरेदता।।
बन दधीचि अस्थियों का ले तूणीर तरकश में भर,
तम हूँ मैं भेदता।।

धीर स्थिर अन्तःकरण का, नीर ले आंखों में भर,
तार हूँ मैं छेड़ता।
मूक बधिर मैं सूरदास, शब्ददृष्टि संग लिए समर
पार हूँ मैं देखता।।

शिशु, बालक, वयस्क, वृद्ध, सबके मन वास कर,
ज्ञानचक्षु मैं फेरता।
कोई सबल, निर्बल हो या हो दिनचर या निशाचर,
दर्द सबकी टेरता।।

पौरुष का हुंकार भी मैं, नारी का गहना मान बन,
निज से हूं झेंपता।
पवनसुत का बल कभी तो कभी कान्हा समान बन,
वस्त्र भी हूँ फेंकता।।

शब्द की महत्ता जो समझे, बन स्तंभ अशोक का,
ज्ञान हूँ मैं टेकता।।
बन शीला लेख मैं, खुशी से परे, बिन शोक का,
जन जन को मैं सेवता।।

©रजनीश "स्वछंद"
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हर हार से हूं सीखता।।

हर हार से हूं सीखता जो जीत की तलब रही।
अधूरी हर कहानी का बस हार ही सबब रही।।

लिए कलम हाथ मे मैं ज़िन्दगी हूँ लिख रहा,
हरेक लब्ज़, हरेक छंद एक नया सबक रही।।

इस ज़िन्दगी की धूंध में, आंख मल मैं ढूंढता,
हर कदम में हर सफर में पाने की ललक रही।

हर एक कंटीले राह पे पांव खाली चल पड़ा,
मन्ज़िलों की आग जो सीने में थी धधक रही।।

मैं हर शीला पे पांव का निशान हूँ बना रहा,
हर कदम पे कंकडों की एक नई खनक रही।।

हर अंधेरा छांट कर था मैं किरण को देखता,
कहीं दूर फलक के द्वार पर सूर्य की चमक रही।।

मैं मनुज हूँ, देव का अवतार कोई हूँ नहीं,
आंसू भी देख दर्द को रक्तबूँद थी छलक रही।।

रवानी नसों में डालकर, ध्येय की पुकार सुन,
किसी ठौर की तलाश में है ज़िन्दगी भटक रही।।

©रजनीश "स्वछंद"

हर हार से हूं सीखता।।

हर हार से हूं सीखता जो जीत की तलब रही।
अधूरी हर कहानी का बस हार ही सबब रही।।

लिए कलम हाथ मे मैं ज़िन्दगी हूँ लिख रहा,
हरेक लब्ज़, हरेक छंद एक नया सबक रही।।

इस ज़िन्दगी की धूंध में, आंख मल मैं ढूंढता,
हर कदम में हर सफर में पाने की ललक रही।

हर एक कंटीले राह पे पांव खाली चल पड़ा,
मन्ज़िलों की आग जो सीने में थी धधक रही।।

मैं हर शीला पे पांव का निशान हूँ बना रहा,
हर कदम पे कंकडों की एक नई खनक रही।।

हर अंधेरा छांट कर था मैं किरण को देखता,
कहीं दूर फलक के द्वार पर सूर्य की चमक रही।।

मैं मनुज हूँ, देव का अवतार कोई हूँ नहीं,
आंसू भी देख दर्द को रक्तबूँद थी छलक रही।।

रवानी नसों में डालकर, ध्येय की पुकार सुन,
किसी ठौर की तलाश में है ज़िन्दगी भटक रही।।

©रजनीश "स्वछंद"
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