रजनीश

रजनीश "स्वच्छंद" Lives in New Delhi, Delhi, India

खुद की रूह को तलाशता एक आज़ाद परिंदा।।।।9811656875।।।।

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अपने ही घर मे पराये हैं।

छोड़ जमीं पुरखों की अपनी, आज यहां क्यूँ भाग मैं आया।
पेट की खातिर अपने घर को, आज लगा क्यूँ आग मैं आया।

खेत मेरे, खलिहान मेरे,
मेरा घर, दालान मेरे।
बस शब्दों में अपने लगते,
क्यूँ ख़ुद को हैं ऐसे ठगते।

छोड़ पिता माता को अकेले,
खेल क्यूँ मैने ऐसे खेले।
किस मुख उनसे बात करूं,
कैसे मैं उनको साथ रखूं।

शहर की हवा जहरीली है,
कितने परिवारों को लीली है।
कहाँ कोई अपना यहाँ है,
निर्जीवों का बस मज़मा है।

आज जो आंखें खोली हैं, इससे पहले ना क्यूँ जाग मैं आया।
पेट की खातिर अपने घर को, आज लगा क्यूँ आग मैं आया।

जो बोया था कल को मैंने,
बैठ आज वही मैं काट रहा।
ज़ख्म हरे हैं वही पुराने,
बैठ आज वही मैं चाट रहा।

किससे शिकायत जा कर आऊं,
किसके सर पे दोष मढूं।
जब रुकना था मैं रुक न सका,
अब आगे मदहोश बढूं।

कैसी तरक्की, कैसा बढ़ना,
अपनों का जो साथ नहीं है।
किस्मत के ही बल पे बैठा,
सर पे मां का हाथ नहीं है।

जिससे कल तक था चिढ़ता मैं, गा वही अब राग मैं आया।
पेट की खातिर अपने घर को, आज लगा क्यूँ आग मैं आया।

अपने भी पीछे छूट गए,
अपनेपन का आभाव रहा।
मरहम की तो कमीं नहीं,
फिर भी दिल मे घाव रहा।

किसको अपना मैं कह जाऊं,
जा किससे दिल की बात कहूँ।
पहर पहर में खुद को भुला,
अपनो की यादों में दिन रात करूँ।

लौट सकूँ मैं थोड़ा पीछे,
सूरत ऐसी है दिखती नहीं।
सबल रहा सब पा सकता मैं,
मां की ममता पर बिकती नहीं।

दिल रोता है और ज़ख्म हरे हैं, अपनों को क्यूँ त्याग मैं आया।
पेट की खातिर अपने घर को, आज लगा क्यूँ आग मैं आया।

©रजनीश "स्वछंद"

अपने ही घर मे पराये हैं।

छोड़ जमीं पुरखों की अपनी, आज यहां क्यूँ भाग मैं आया।
पेट की खातिर अपने घर को, आज लगा क्यूँ आग मैं आया।

खेत मेरे, खलिहान मेरे,
मेरा घर, दालान मेरे।
बस शब्दों में अपने लगते,
क्यूँ ख़ुद को हैं ऐसे ठगते।

छोड़ पिता माता को अकेले,
खेल क्यूँ मैने ऐसे खेले।
किस मुख उनसे बात करूं,
कैसे मैं उनको साथ रखूं।

शहर की हवा जहरीली है,
कितने परिवारों को लीली है।
कहाँ कोई अपना यहाँ है,
निर्जीवों का बस मज़मा है।

आज जो आंखें खोली हैं, इससे पहले ना क्यूँ जाग मैं आया।
पेट की खातिर अपने घर को, आज लगा क्यूँ आग मैं आया।

जो बोया था कल को मैंने,
बैठ आज वही मैं काट रहा।
ज़ख्म हरे हैं वही पुराने,
बैठ आज वही मैं चाट रहा।

किससे शिकायत जा कर आऊं,
किसके सर पे दोष मढूं।
जब रुकना था मैं रुक न सका,
अब आगे मदहोश बढूं।

कैसी तरक्की, कैसा बढ़ना,
अपनों का जो साथ नहीं है।
किस्मत के ही बल पे बैठा,
सर पे मां का हाथ नहीं है।

जिससे कल तक था चिढ़ता मैं, गा वही अब राग मैं आया।
पेट की खातिर अपने घर को, आज लगा क्यूँ आग मैं आया।

अपने भी पीछे छूट गए,
अपनेपन का आभाव रहा।
मरहम की तो कमीं नहीं,
फिर भी दिल मे घाव रहा।

किसको अपना मैं कह जाऊं,
जा किससे दिल की बात कहूँ।
पहर पहर में खुद को भुला,
अपनो की यादों में दिन रात करूँ।

लौट सकूँ मैं थोड़ा पीछे,
सूरत ऐसी है दिखती नहीं।
सबल रहा सब पा सकता मैं,
मां की ममता पर बिकती नहीं।

दिल रोता है और ज़ख्म हरे हैं, अपनों को क्यूँ त्याग मैं आया।
पेट की खातिर अपने घर को, आज लगा क्यूँ आग मैं आया।

©रजनीश "स्वछंद"

#Love, #poem, #hindipoetry

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ख्वाबों की मियाद बढ़ानी है।।

मैं चुनता गया, मैं बुनता गया,
ख्वाबों के तिनके, आशियाँ ख्वाबों के।
मैं पूछता गया, मैं सुनता गया,
सवाल अधूरे, मतलब उनके जवाबों के।

कुछ तो मयस्सर हो न सका,
हर राह वहीं जा पहुंची, जहां से चले थे।
घरौंदा ख्वाबों का अज़ीज़ बड़ा,
फिर से लगे पलने वहीं, जहां वे पले थे।

ग़म का था बाजार गरम,
खुशियां थीं महंगी, थी औकात नहीं।
जीवन के पन्ने पलट देखा,
जो था वही था, थी कोई सौगात नहीं।

अरमां गर्म तवे पे सिंकती है,
जो जाना जो समझा, था वैसा कुछ भी नहीं।
हर मोड़ पे राहें बदलती गयीं,
मंज़िल का निशां, था वहां सचमुच ही नहीं।

बन बंजारा रहा भटकता,
ना चैन-ओ-सुकूं, ना आराम कहीं।
पहर पहर में फर्क था मुश्किल,
थी सुबह कहीं, थी बीती शाम कहीं।

अब तक हारा, शांत पड़ा,
जो पक्की ख्वाबों की बुनियाद बनानी है।
वक़्त का पहिया चलता जाता,
अब फिर ख्वाबों की मियाद बढ़ानी है।।

रजनीश "स्वच्छंद"

ख्वाबों की मियाद बढ़ानी है।।

मैं चुनता गया, मैं बुनता गया,
ख्वाबों के तिनके, आशियाँ ख्वाबों के।
मैं पूछता गया, मैं सुनता गया,
सवाल अधूरे, मतलब उनके जवाबों के।

कुछ तो मयस्सर हो न सका,
हर राह वहीं जा पहुंची, जहां से चले थे।
घरौंदा ख्वाबों का अज़ीज़ बड़ा,
फिर से लगे पलने वहीं, जहां वे पले थे।

ग़म का था बाजार गरम,
खुशियां थीं महंगी, थी औकात नहीं।
जीवन के पन्ने पलट देखा,
जो था वही था, थी कोई सौगात नहीं।

अरमां गर्म तवे पे सिंकती है,
जो जाना जो समझा, था वैसा कुछ भी नहीं।
हर मोड़ पे राहें बदलती गयीं,
मंज़िल का निशां, था वहां सचमुच ही नहीं।

बन बंजारा रहा भटकता,
ना चैन-ओ-सुकूं, ना आराम कहीं।
पहर पहर में फर्क था मुश्किल,
थी सुबह कहीं, थी बीती शाम कहीं।

अब तक हारा, शांत पड़ा,
जो पक्की ख्वाबों की बुनियाद बनानी है।
वक़्त का पहिया चलता जाता,
अब फिर ख्वाबों की मियाद बढ़ानी है।।

रजनीश "स्वच्छंद"
#khwaab, #Quotes, #Poetry, #hindipoetry

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हर बार छला जाता हूँ।।

तेरे रुदन का स्वर भी अब कानों में गूंज नहीं पाता।
सत्ता के इस चकाचौध में कुछ भी सूझ नहीं पाता।

रोटी छीनी जाती है, मैं सड़कों पे लाया जाता हूँ,
पांच बरस में एक बार फिर से बहलाया जाता हूँ।
अपने कलंक धोने को, मेरे लहु को पानी करते हो,
मिल जाये सत्ता तो फिर अपनी मनमानी करते हो।
हृदय बने हैं पत्थर क्यूँ, जो दर्द नहीं दिख पाता है,
इस ईमान का क्या करना, कौड़ी में बिक जाता है।

तेरी इन बहकी चालों को कोई क्यूँ बूझ नहीं पाता।
सत्ता के इस चकाचौध में कुछ भी सूझ नहीं पाता।

लोकतंत्र की बातें हैं बातें, जनता तो रौंदी जाती है,
अपना भोग लगाने को, इनकी थाली औंधी जाती है।
गरीब गरीब का नारा बस, नारों से पेट नहीं भरता,
ईमान बिके बाज़ारों में, क्यूँ इनका रेट नहीं घटता।
सड़कछाप गुंडे भी देखो अब बन नेता बौराते हैं,
अंधे बहरे लोकतंत्र की ये ही जनता को सौगाते हैं।

ईमान बना है बौना यहां, भूख से जूझ नहीं पाता,
सत्ता के इस चकाचौध में कुछ भी सूझ नहीं पाता।

रजनीश "स्वच्छंद" #NojotoQuote

हर बार छला जाता हूँ।।

तेरे रुदन का स्वर भी अब कानों में गूंज नहीं पाता।
सत्ता के इस चकाचौध में कुछ भी सूझ नहीं पाता।

रोटी छीनी जाती है, मैं सड़कों पे लाया जाता हूँ,
पांच बरस में एक बार फिर से बहलाया जाता हूँ।
अपने कलंक धोने को, मेरे लहु को पानी करते हो,
मिल जाये सत्ता तो फिर अपनी मनमानी करते हो।
हृदय बने हैं पत्थर क्यूँ, जो दर्द नहीं दिख पाता है,
इस ईमान का क्या करना, कौड़ी में बिक जाता है।

तेरी इन बहकी चालों को कोई क्यूँ बूझ नहीं पाता।
सत्ता के इस चकाचौध में कुछ भी सूझ नहीं पाता।

लोकतंत्र की बातें हैं बातें, जनता तो रौंदी जाती है,
अपना भोग लगाने को, इनकी थाली औंधी जाती है।
गरीब गरीब का नारा बस, नारों से पेट नहीं भरता,
ईमान बिके बाज़ारों में, क्यूँ इनका रेट नहीं घटता।
सड़कछाप गुंडे भी देखो अब बन नेता बौराते हैं,
अंधे बहरे लोकतंत्र की ये ही जनता को सौगाते हैं।

ईमान बना है बौना यहां, भूख से जूझ नहीं पाता,
सत्ता के इस चकाचौध में कुछ भी सूझ नहीं पाता।

रजनीश "स्वच्छंद"
#Poetry, #kavita, #poem, #hindipoetry

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है स्वयम्वर ये मृत्यु का।।

है किस्मतवाला वो, जो मृत्यु का वरण करता है।
देशप्रेम की वेदी पर जीवन का हवन करता है।

है स्वयम्वर ये मृत्यु का,
इसका यही विधान है।
सांझ टलेगी निशा छंटेगी,
आनेवाला एक बिहान है।

छद्मावरण में जीना कैसा,
मिट्टी का श्रृंगार बहुत है।
मां कदमों में एक पल जो जिया,
जीवन का ये सार बहुत है।

परिणय सूत्र में बंधने को,
जब मृत्यू भी लालायित हो।
उस जीवन का मोल ही क्या,
जो कुंठित हो जो शापित हो।

वर तो सच्चा वही जो शत्रु का दमन करता है।
देशप्रेम की वेदी पर जीवन का हवन करता है।

आंखों में चमक मधुर मिलन की,
भुजाएं ओज से पूरित हैं।
स्वर्णकिरणों की आभा में,
स्वप्नकलियाँ भी प्रस्फुटित हैं।

मनहारी है दृश्य बड़ा ये,
धरा को गिर ये चूम रहा।
देख पवन भी मंजर ऐसा,
संग कलियों के झूम रहा।

दुल्हन डोली में बैठी,
निज शोणित से श्रृंगार किया।
जननी की अभिलाषा भी,
निज शीश चढ़ा साकार किया।

वीरों का ही तो जग भी अभिनन्दन करता है।
देशप्रेम की वेदी पर जीवन का हवन करता है।

अपनी प्रियतमा की गोदी में,
हंसता हंसता ये झूल रहा।
धीमी होती सांसों में भी,
है गर्व से सीना फूल रहा।

खुशी से आंखें स्वर्णिम होतीं,
होठों पे एक मुस्कान रही।
देश बाराती जश्न मनाते,
शादी बड़ी धूमधाम रही।

आ चुकी मिलन की बेला है,
आंखें अब बन्द ये करता है।
मृत्यु हृदय में वास है इसका,
कब कहाँ कभी ये मरता है।

लगा के मौत गले, ये जननी का वंदन करता है।
देशप्रेम की वेदी पर जीवन का हवन करता है।
 #NojotoQuote

है स्वयम्वर ये मृत्यु का।।

है किस्मतवाला वो, जो मृत्यु का वरण करता है।
देशप्रेम की वेदी पर जीवन का हवन करता है।

है स्वयम्वर ये मृत्यु का,
इसका यही विधान है।
सांझ टलेगी निशा छंटेगी,
आनेवाला एक बिहान है।

छद्मावरण में जीना कैसा,
मिट्टी का श्रृंगार बहुत है।
मां कदमों में एक पल जो जिया,
जीवन का ये सार बहुत है।

परिणय सूत्र में बंधने को,
जब मृत्यू भी लालायित हो।
उस जीवन का मोल ही क्या,
जो कुंठित हो जो शापित हो।

वर तो सच्चा वही जो शत्रु का दमन करता है।
देशप्रेम की वेदी पर जीवन का हवन करता है।

आंखों में चमक मधुर मिलन की,
भुजाएं ओज से पूरित हैं।
स्वर्णकिरणों की आभा में,
स्वप्नकलियाँ भी प्रस्फुटित हैं।

मनहारी है दृश्य बड़ा ये,
धरा को गिर ये चूम रहा।
देख पवन भी मंजर ऐसा,
संग कलियों के झूम रहा।

दुल्हन डोली में बैठी,
निज शोणित से श्रृंगार किया।
जननी की अभिलाषा भी,
निज शीश चढ़ा साकार किया।

वीरों का ही तो जग भी अभिनन्दन करता है।
देशप्रेम की वेदी पर जीवन का हवन करता है।

अपनी प्रियतमा की गोदी में,
हंसता हंसता ये झूल रहा।
धीमी होती सांसों में भी,
है गर्व से सीना फूल रहा।

खुशी से आंखें स्वर्णिम होतीं,
होठों पे एक मुस्कान रही।
देश बाराती जश्न मनाते,
शादी बड़ी धूमधाम रही।

आ चुकी मिलन की बेला है,
आंखें अब बन्द ये करता है।
मृत्यु हृदय में वास है इसका,
कब कहाँ कभी ये मरता है।

लगा के मौत गले, ये जननी का वंदन करता है।
देशप्रेम की वेदी पर जीवन का हवन करता है।

©रजनीश "स्वछंद"
#deshprem, #Quotes, #Love

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भगत है बस नाम नहीं।

असली नकली का छोड़ भ्रम, देशप्रेम की आग रहे।
असली भगत बनना जो चाहो, देशहित ही याद रहे।

भगत भगत बस नाम नहीं,
एक विचार एक क्रांति है।
रुधिरों में जो बहता पानी,
युवाजोश तो एक भ्रांति है।

किस भुज जननी गर्व करे,
किन पूतों का सम्मान करें।
यौवन की कुंठित धार बहे,
क्यूँ रोती सांझ बिहान करे।

जननी को माता कहे नहीं,
टुकड़े का स्वर बुलंद करे।
अफजल को जो माने हीरो,
हाफ़ीज़ को भी सन्त कहे।

मां की जय कह सका नहीं,
मज़हब की आड़ में जीता हो।
ऐसे सन्तान हुए भगत कब,
जो अपनो का लहु भी पीता हो।

लाशों पर ना सींके रोटियां, मनुजहित की बात रहे।
असली भगत बनना जो चाहो, देशहित ही याद रहे।

समय भी बदले, युग भी बदले,
जरूरी नहीं कि बदलें हम भी।
सरहद पे गर जो हुई शहादत,
होनी चाहिये आंखें नम भी।

खुद को भगत जो कहते हो,
मातृ-दशा पे हो क्यूँ मौन खड़े।
आंखों से नीर नहीं क्यूँ बहता,
नेपथ्य में रहे क्यूँ गौण पड़े।

ये धरा तुम्हारी जननी, है माता,
क्यूँ रहा रक्तवर्ण लाल नहीं।
क्या सबूत तुम्हे दूँ वीर भगत का,
तब पूछा था किसीने सवाल नहीं।

तुम सोचो जरा विचार करो,
क्या तुमने लिया क्या तुमने दिया।
सरहद पे था वो मरता रहा,
कब विष का प्याला तुमने पिया।

ये कलंक तुम तक ही रहे, ना फिर ये तेरे बाद रहे।
असली भगत बनना जो चाहो, देशहित ही याद रहे।

©रजनीश "स्वछंद" #NojotoQuote

भगत है बस नाम नहीं।

असली नकली का छोड़ भ्रम, देशप्रेम की आग रहे।
असली भगत बनना जो चाहो, देशहित ही याद रहे।

भगत भगत बस नाम नहीं,
एक विचार एक क्रांति है।
रुधिरों में जो बहता पानी,
युवाजोश तो एक भ्रांति है।

किस भुज जननी गर्व करे,
किन पूतों का सम्मान करें।
यौवन की कुंठित धार बहे,
क्यूँ रोती सांझ बिहान करे।

जननी को माता कहे नहीं,
टुकड़े का स्वर बुलंद करे।
अफजल को जो माने हीरो,
हाफ़ीज़ को भी सन्त कहे।

मां की जय कह सका नहीं,
मज़हब की आड़ में जीता हो।
ऐसे सन्तान हुए भगत कब,
जो अपनो का लहु भी पीता हो।

लाशों पर ना सींके रोटियां, मनुजहित की बात रहे।
असली भगत बनना जो चाहो, देशहित ही याद रहे।

समय भी बदले, युग भी बदले,
जरूरी नहीं कि बदलें हम भी।
सरहद पे गर जो हुई शहादत,
होनी चाहिये आंखें नम भी।

खुद को भगत जो कहते हो,
मातृ-दशा पे हो क्यूँ मौन खड़े।
आंखों से नीर नहीं क्यूँ बहता,
नेपथ्य में रहे क्यूँ गौण पड़े।

ये धरा तुम्हारी जननी, है माता,
क्यूँ रहा रक्तवर्ण लाल नहीं।
क्या सबूत तुम्हे दूँ वीर भगत का,
तब पूछा था किसीने सवाल नहीं।

तुम सोचो जरा विचार करो,
क्या तुमने लिया क्या तुमने दिया।
सरहद पे था वो मरता रहा,
कब विष का प्याला तुमने पिया।

ये कलंक तुम तक ही रहे, ना फिर ये तेरे बाद रहे।
असली भगत बनना जो चाहो, देशहित ही याद रहे।

©रजनीश "स्वछंद"
#Poetry, #poems, #deshprem, #bhagatsingh,

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