रजनीश

रजनीश "स्वच्छंद" Lives in New Delhi, Delhi, India

खुद की रूह को तलाशता एक आज़ाद परिंदा।।।।9811656875।।।।

https://www.amarujala.com/user/%E0%A4%B0%E0%A4%9C%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B6-%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%9A%E0%A5%8D%E0%A4%9B%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6?option=stories

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"मुझपे, तुम भी तो मरते थे।। कहो ना, मुझपे, तुम भी तो मरते थे। थाम हाथ संग, तुम भी तो चलते थे। कहीं हो ना जाये आम मुहब्बत हमारी, मेरे संग संग तब, तुम भी तो डरते थे। हाथों पे गुदवाया था नाम हम दोनों ने, ये फ़िज़ूल ज़िद्द, तुम भी तो करते थे। पल भर को जुदा होना था गंवारा नहीं, उन पलों में आँहें, तुम भी तो भरते थे। एक जिस्म दो जान वाली सारी बातें, कंधे पे रख सर, तुम भी तो कहते थे। लगे रहना फोन पे करनी बातें लम्बी, पापा की डांट, तुम भी तो सहते थे। कॉलेज क्लास में बैठ, छुपकर सबसे, मेरे सारे मेसेजेज, तुम भी तो पढ़ते थे। चलो छोड़ो, छला गया मैं तो इश्क में, सिर्फ वक़्त नहीं, तुम भी तो छलते थे। मैं आज कर रहा हूँ शिकायत बस, ये ही शिकायतें, तुम भी तो करते थे। कुछ नहीं कहने को, है बाकी याद, अभी मैं, कभी, तुम भी तो ढलते थे। ©रजनीश "स्वछंद""

मुझपे, तुम भी तो मरते थे।।

कहो ना, मुझपे, तुम भी तो मरते थे।
थाम हाथ संग, तुम भी तो चलते थे।

कहीं हो ना जाये आम मुहब्बत हमारी,
मेरे संग संग तब, तुम भी तो डरते थे।

हाथों पे गुदवाया था नाम हम दोनों ने,
ये फ़िज़ूल ज़िद्द, तुम भी तो करते थे।

पल भर को जुदा होना था गंवारा नहीं,
उन पलों में आँहें, तुम भी तो भरते थे।

एक जिस्म दो जान वाली सारी बातें,
कंधे पे रख सर, तुम भी तो कहते थे।

लगे रहना फोन पे करनी बातें लम्बी,
पापा की डांट, तुम भी तो सहते थे।

कॉलेज क्लास में बैठ, छुपकर सबसे,
मेरे सारे मेसेजेज, तुम भी तो पढ़ते थे।

चलो छोड़ो, छला गया मैं तो इश्क में,
सिर्फ वक़्त नहीं, तुम भी तो छलते थे।

मैं आज कर रहा हूँ शिकायत बस,
ये ही शिकायतें, तुम भी तो करते थे।

कुछ नहीं कहने को, है बाकी याद,
अभी मैं, कभी, तुम भी तो ढलते थे।

©रजनीश "स्वछंद"

मुझपे, तुम भी तो मरते थे।।

कहो ना, मुझपे, तुम भी तो मरते थे।
थाम हाथ संग, तुम भी तो चलते थे।

कहीं हो ना जाये आम मुहब्बत हमारी,
मेरे संग संग तब, तुम भी तो डरते थे।

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"खट्टा मीठा प्यार।। बीवी के डर से.. तेरी ओढ़नी, अब कफ़न सी लगती है। तेरी मोहब्बत, अब घुटन सी लगती है। जब भी आते हैं मेसेजेज तेरे, फोन पे, देखूं न देखूं, एक उलझन सी लगती है। दिल की आवाज़... जो ना पढूं तुझे, एक अगन सी लगती है। अभी भी तू जैसे एक दुल्हन सी लगती है। तुम बिन जीना यूँ लगे अब जीना तो नहीं, जो न मिट सके, तू वो लगन सी लगती है। बीवी से, पकड़े जाने पर.. है ये कौन, तुम्हारी ही बहन सी लगती है। बस तेरी ही आंख मृगनयन सी लगती है। मैं तो हूँ बस तेरा, खाऊं कसम किसकी, मैं तो हूँ फूल, तुम तो चमन सी लगती है। हर दांव फ़ेल होने पर... बीवी, बीवी नहीं दुष्टदलन सी लगती है। ज़िन्दगी तो बस चीरहरण सी लगती है। दो नावों पे न रखना कभी तुम पांव यारों, हड्डी हवन में स्वाहा चन्दन सी लगती है। ©रजनीश "स्वछंद""

खट्टा मीठा प्यार।।

बीवी के डर से..
तेरी ओढ़नी, अब कफ़न सी लगती है।
तेरी मोहब्बत, अब घुटन सी लगती है।
जब भी आते हैं मेसेजेज तेरे, फोन पे,
देखूं न देखूं, एक उलझन सी लगती है।

दिल की आवाज़...
जो ना पढूं तुझे, एक अगन सी लगती है।
अभी भी तू जैसे एक दुल्हन सी लगती है।
तुम बिन जीना यूँ लगे अब जीना तो नहीं,
जो न मिट सके, तू वो लगन सी लगती है।

बीवी से, पकड़े जाने पर..
है ये कौन, तुम्हारी ही बहन सी लगती है।
बस तेरी ही आंख मृगनयन सी लगती है।
मैं तो हूँ बस तेरा, खाऊं कसम किसकी,
मैं तो हूँ फूल, तुम तो चमन सी लगती है।

हर दांव फ़ेल होने पर...
बीवी, बीवी नहीं दुष्टदलन सी लगती है।
ज़िन्दगी तो बस चीरहरण सी लगती है।
दो नावों पे न रखना कभी तुम पांव यारों,
हड्डी हवन में स्वाहा चन्दन सी लगती है।

©रजनीश "स्वछंद"

खट्टा मीठा प्यार।।

बीवी के डर से..
तेरी ओढ़नी, अब कफ़न सी लगती है।
तेरी मोहब्बत, अब घुटन सी लगती है।
जब भी आते हैं मेसेजेज तेरे, फोन पे,
देखूं न देखूं, एक उलझन सी लगती है।

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"कोई हिन्दू, कोई मुसलमां हो गया।। वक़्त ने ली ऐसी करवट, मैं हिन्दू तू मुसलमां हो गया। जिस दिल मे रहते थे दोनों, वहां अब दो जहां हो गया। बन मुर्गा रहे लड़ते, बांध पंजों में टुकड़ा एक ब्लेड का, जो रहा लड़ाता हमे, आज वही देखो रहनुमां हो गया। मिल बैठ पढ़ते थे आयतें श्लोक, गीता और कुरान की, क्यूँ आज तुम्हे कुरान और हमे गीता का गुमां हो गया। तुम भी तो आते थे मंदिर मेरे, था पढ़ा नमाज़ मैने भी, तेरे माथे का तिलक, मेरी आँखों का सुरमा खो गया। हमे याद हैं ईद की सेवईयां, तुम्हे भी होली के पकवान, क्यूँ इस होली में ख़ाक, हम दोनों का अरमां हो गया। मैं गंगा बन था बहता, तुम आ मिलते थे बनके यमुना, बदलीं दिशाएं, बन बांध ये नफरत कब जवां हो गया। बिन कहे जान जाते थे दर्द मेरा, गिरते थे आंसू तुम्हारे, आ मिल जा फिर से गले, मिले बहुत लम्हा हो गया। ©रजनीश "स्वछंद""

कोई हिन्दू, कोई मुसलमां हो गया।।

वक़्त ने ली ऐसी करवट, मैं हिन्दू तू मुसलमां हो गया।
जिस दिल मे रहते थे दोनों, वहां अब दो जहां हो गया।

बन मुर्गा रहे लड़ते, बांध पंजों में टुकड़ा एक ब्लेड का,
जो रहा लड़ाता हमे, आज वही देखो रहनुमां हो गया।

मिल बैठ पढ़ते थे आयतें श्लोक, गीता और कुरान की,
क्यूँ आज तुम्हे कुरान और हमे गीता का गुमां हो गया।

तुम भी तो आते थे मंदिर मेरे, था पढ़ा नमाज़ मैने भी,
तेरे माथे का तिलक, मेरी आँखों का सुरमा खो गया।

हमे याद हैं ईद की सेवईयां, तुम्हे भी होली के पकवान,
क्यूँ इस होली में ख़ाक, हम दोनों का अरमां हो गया।

मैं गंगा बन था बहता, तुम आ मिलते थे बनके यमुना,
बदलीं दिशाएं, बन बांध ये नफरत कब जवां हो गया।

बिन कहे जान जाते थे दर्द मेरा, गिरते थे आंसू तुम्हारे, 
आ मिल जा फिर से गले, मिले बहुत लम्हा हो गया।

©रजनीश "स्वछंद"

कोई हिन्दू, कोई मुसलमां हो गया।।

वक़्त ने ली ऐसी करवट, मैं हिन्दू तू मुसलमां हो गया।
जिस दिल मे रहते थे दोनों, वहां अब दो जहां हो गया।

बन मुर्गा रहे लड़ते, बांध पंजों में टुकड़ा एक ब्लेड का,
जो रहा लड़ाता हमे, आज वही देखो रहनुमां हो गया।

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"गज़ब दुनिया।। बड़ी गज़ब दुनिया है भैया, गदहा ज्ञान बताता है, ज्ञान पड़ा कोने में सड़ता, धन ही मान बढ़ाता है। चौखट चौखट आवाज़ है लगती, दिन तेरे फिरने वाले हैं, बातों से आज मैं दे दूं छतरी, फिर ओले गिरने वाले हैं। लोकतंत्र का पर्व अनोखा, वादों की लड़ी लगाई है, पांच साल से टिक टिक करती, फिर से घड़ी जगाई है। आज मैं उनका वो मेरे, एक दिन रिश्ता निभ पायेगा, आज लगाया हमने अंगूठा, ये नेता कल बिक जाएगा। बड़ी सरल गिनती इनकी, हम बूंदों में बिखरे मिलते हैं, गागर में भर सागर ये, फिर निखरे निखरे मिलते हैं। जो आज कहुँ तुमको सच मैं, तो दुश्मन मैं कहलाऊंगा, एक दिन के विद्व बने तुम, पोंगा पंडित मैं बन जाऊंगा। तुम जागे हो तो फिक्र नहीं, गर सोये तुम्हे जगाऊंगा, जो सोने का ढोंग किया, फिर काम तेरे न आऊंगा। पेट से ऊपर माथा तेरा, सोच जरा तू अक्ल लगा, तुझमे पशु में अंतर क्या फिर, मानव का तू शक्ल जगा। शब्द मेरे तो चुभते होंगे, दिल चीर पार हो जाएंगे, जिनको तू कांटे समझ रहा, कल तीर यार हो जाएंगे। ©रजनीश "स्वछंद""

गज़ब दुनिया।।

बड़ी गज़ब दुनिया है भैया,
गदहा ज्ञान बताता है,
ज्ञान पड़ा कोने में सड़ता,
धन ही मान बढ़ाता है।

चौखट चौखट आवाज़ है लगती,
दिन तेरे फिरने वाले हैं,
बातों से आज मैं दे दूं छतरी,
फिर ओले गिरने वाले हैं।

लोकतंत्र का पर्व अनोखा,
वादों की लड़ी लगाई है,
पांच साल से टिक टिक करती,
फिर से घड़ी जगाई है।

आज मैं उनका वो मेरे,
एक दिन रिश्ता निभ पायेगा,
आज लगाया हमने अंगूठा,
ये नेता कल बिक जाएगा।

बड़ी सरल गिनती इनकी,
हम बूंदों में बिखरे मिलते हैं,
गागर में भर सागर ये,
फिर निखरे निखरे मिलते हैं।

जो आज कहुँ तुमको सच मैं,
तो दुश्मन मैं कहलाऊंगा,
एक दिन के विद्व बने तुम,
पोंगा पंडित मैं बन जाऊंगा।

तुम जागे हो तो फिक्र नहीं,
गर सोये तुम्हे जगाऊंगा,
जो सोने का ढोंग किया,
फिर काम तेरे न आऊंगा।

पेट से ऊपर माथा तेरा,
सोच जरा तू अक्ल लगा,
तुझमे पशु में अंतर क्या फिर,
मानव का तू शक्ल जगा।

शब्द मेरे तो चुभते होंगे,
दिल चीर पार हो जाएंगे,
जिनको तू कांटे समझ रहा,
कल तीर यार हो जाएंगे।

©रजनीश "स्वछंद"

गज़ब दुनिया।।

बड़ी गज़ब दुनिया है भैया,
गदहा ज्ञान बताता है,
ज्ञान पड़ा कोने में सड़ता,
धन ही मान बढ़ाता है।

चौखट चौखट आवाज़ है लगती,

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"कब रुकता है।। पांव के छाले देखकर चलना कब रुकता है। तम से घिरा ये जुगनू जलना कब रुकता है।। तुम में मैं तुम मुझमे दोनों एक मे शामिल, जो हाथों से छूटे हाथ बढ़ना कब रुकता है। एक लहु है एक जमीं अम्बर एक है अपना, रात से डर सूरज का चढ़ना कब रुकता है। मेरा कंधा या तेरा कंधा है दोनों का अपना, भार से डर पेड़ का फलना कब रुकता है। एक कदम पे है मंज़िल पांव बढ़ा कर देख, गहराई से डर बोलो झरना कब रुकता है। अनन्त नही आयु तेरी काम नेक कर जा, इक्षाओं से डर बोलो मरना कब रुकता है। इस कागज़ पे सार तुम्हारा मैंने है लिख डाला, किसी से डर कवि का कहना कब रुकता है।। ©रजनीश "स्वछंद""

कब रुकता है।।

पांव के छाले देखकर चलना कब रुकता है।
तम से घिरा ये जुगनू जलना कब रुकता है।।

तुम में मैं तुम मुझमे दोनों एक मे शामिल,
जो हाथों से छूटे हाथ बढ़ना कब रुकता है।

एक लहु है एक जमीं अम्बर एक है अपना,
रात से डर सूरज का चढ़ना कब रुकता है।

मेरा कंधा या तेरा कंधा है दोनों का अपना,
भार से डर पेड़ का फलना कब रुकता है।

एक कदम पे है मंज़िल पांव बढ़ा कर देख,
गहराई से डर बोलो झरना कब रुकता है।

अनन्त नही आयु तेरी काम नेक कर जा,
इक्षाओं से डर बोलो मरना कब रुकता है।

इस कागज़ पे सार तुम्हारा मैंने है लिख डाला,
किसी से डर कवि का कहना कब रुकता है।।

©रजनीश "स्वछंद"

कब रुकता है।।

पांव के छाले देखकर चलना कब रुकता है।
तम से घिरा ये जुगनू जलना कब रुकता है।।

तुम में मैं तुम मुझमे दोनों एक मे शामिल,
जो हाथों से छूटे हाथ बढ़ना कब रुकता है।

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