दीपिका सिंह

दीपिका सिंह Lives in Delhi, Delhi, India

रूहानी रूह में बंजारा मन, ऐसा है जीवन से मेरा संबंध

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"विपरीत दिशा वो अनपढ़ पीढ़ी जो हमें डाँटती थी- नल धीरे खोलो अन्न नाली में ना जाए तुलसी पर जल चढ़ाओ बरगद पीपल आँवला पूजो मुँडेर पर चिड़िया के पानी रखा या नहीं ? सब्ज़ी के छिलके गाय बकरी को दो काँच कूड़े में मत डालो , कोई जानवर मुँह ना डाल दे , संस्कार देती शिशु के जन्म से पहले नौ माह गर्भ संस्कार का पालन कराती, परिवार जोड़ना सिखाती वह पीढ़ी शास्त्रों की श्रुति परम्परा की शिष्य थी। ये आधुनिक पीढ़ी आधे शिक्षित, आधे भ्रमित, आधे विज्ञान और आधे भगवान को मानने वाले, टूटे विश्वास टूटे घर, टूटे नातों तले मन में कसक लिए आधुनिकता के तमगे का भार लिए झुकी कमर के साथ अकेले सिसकते फिर रहे आत्मीयता की ठंडी छांव के लिए। जाने किस परंपरा के शिष्य है? ©दीपिका सिंह"

विपरीत दिशा वो अनपढ़ पीढ़ी 
जो हमें डाँटती थी-
नल धीरे खोलो अन्न नाली में ना जाए
तुलसी पर जल चढ़ाओ बरगद पीपल आँवला पूजो मुँडेर पर चिड़िया के पानी रखा या नहीं ?
सब्ज़ी के छिलके गाय बकरी को दो काँच कूड़े में मत डालो , कोई जानवर मुँह ना डाल दे , संस्कार देती शिशु के जन्म से पहले नौ माह गर्भ संस्कार का पालन कराती, परिवार जोड़ना सिखाती
वह पीढ़ी शास्त्रों की श्रुति परम्परा की शिष्य थी।
ये आधुनिक पीढ़ी
 आधे  शिक्षित, आधे भ्रमित, आधे विज्ञान और आधे भगवान को मानने वाले, टूटे विश्वास टूटे घर, टूटे नातों तले मन में कसक लिए आधुनिकता के तमगे का भार लिए झुकी कमर के साथ अकेले सिसकते फिर रहे आत्मीयता की ठंडी छांव के लिए। जाने किस परंपरा के शिष्य है?

©दीपिका सिंह

#WForWriters

27 Love

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"सस्ती कलाई घड़ी और महंगी कलाई घड़ी में बहुत फर्क होता है समय का जनाब !! सस्ती घड़ी का समय किसी प्लेटफार्म, किसी बस स्टैंड पर पसीना पोंछते, घीसटते, कलपते बहुत धीरे धीरे गुजरता है, और महंगी घड़ी का समय किसी फ्लाइट में पलक झपकते ही। ©दीपिका सिंह"

सस्ती कलाई घड़ी और महंगी कलाई घड़ी में  बहुत फर्क होता है समय का जनाब !! सस्ती घड़ी का समय किसी प्लेटफार्म, किसी बस स्टैंड पर पसीना  पोंछते, घीसटते, कलपते बहुत धीरे धीरे गुजरता है, और महंगी घड़ी का समय किसी फ्लाइट में पलक झपकते ही।

©दीपिका सिंह

#simplicity #Nojoto #नोजोतोहिन्दी

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"चेहरे का श्रृंगार करते समय अपनी जुबां का भी श्रृंगार करना ना भूलें, जीवन की बहुत सी समस्याएं अपने आप ही सुलझ जाएंगी। ©दीपिका सिंह"

चेहरे का श्रृंगार करते समय अपनी जुबां का भी श्रृंगार करना ना भूलें, जीवन की बहुत सी समस्याएं अपने आप ही सुलझ जाएंगी।

©दीपिका सिंह

जुबान का श्रृंगार
#नोजोटो #nojotonews

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"देखे के आता है कौन लौटकर अब, आजाद कर दिए हमने सब रिश्ते अपने अपने किरदारों से.. ©दीपिका सिंह"

देखे के आता है कौन लौटकर अब,
आजाद  कर दिए हमने सब रिश्ते
अपने अपने किरदारों से..

©दीपिका सिंह

#gaon #नोजोटो #nojotonews

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"लिखो, तो नीला रंग लिखना इन आसमां के बादलो में, या फिर सुबह की सुनहरी धूप लिखना काले अंधियारों में, लिखना उस चिड़िया की उड़ानों को जिसके नन्हे पंख फड़फड़ा के रह गए इन कंक्रीट के पहाड़ से ऊंचे मकानों में, लिखना उस भूखे बच्चे की भूख को को जो देखता रहा कूड़े में गिरे पकवानों को, लिखना के कैसे भूल गया बचपन बेफिक्री से उछलना इन सिमटते मैदानों में, लिखना के कैसे बिकती है मासूम कलियां हवस के बाजारों में, लिख सको तो लिखना उन एहसासों को, उन हालातों को मरी कैसे गैरत हम इंसानों में, लिख सको तो लिखना एक बार तुम ये जरूर लिखना... ©दीपिका सिंह"

लिखो,  तो नीला रंग लिखना इन आसमां के बादलो में,
या फिर सुबह की सुनहरी धूप लिखना काले अंधियारों में,
लिखना उस चिड़िया की उड़ानों को जिसके नन्हे पंख फड़फड़ा के रह गए     इन कंक्रीट के पहाड़ से ऊंचे मकानों में,
लिखना उस भूखे बच्चे की भूख को को जो देखता रहा कूड़े में गिरे पकवानों को,
लिखना के कैसे भूल गया बचपन बेफिक्री से उछलना इन सिमटते मैदानों में,
लिखना के कैसे बिकती है मासूम कलियां हवस के बाजारों में,
लिख सको तो लिखना उन  एहसासों को, उन हालातों को  मरी कैसे गैरत  हम  इंसानों में,
लिख सको तो लिखना एक बार तुम ये जरूर लिखना...

©दीपिका सिंह

#SunSet #नोजोटो #no #nojato

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