अधुरी कहानी (T.S Eli@t)

अधुरी कहानी (T.S Eli@t) Lives in Siwan, Bihar, India

मैं फुल हूँ, मैं दवा हूँ, मैं दर्द भी हूँ, मैं टिस् भी हूँ, मैं शराब हूँ, मैं सराफ़त भी, मैं शहर हूँ, मैं सफ़र भी मैं खुद के बारे मैं क्या बताऊ, बस मैं "मैं" हूँ

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"मैं अक्सर इतनी "सिद्दत" से इश्क़ कर बैठता हूँ, की कोई मेरा " दशहरा " छिन लेता हैं तो कोई मेरी " दीवाली ""

मैं अक्सर इतनी "सिद्दत" से इश्क़ कर बैठता हूँ, 
की

कोई मेरा " दशहरा " छिन लेता हैं तो
कोई मेरी " दीवाली "

मैं ऐसा ही हूँ

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"मैंने ये ग़लती कई दफ़ा की हैं, बस वफ़ा...... वफ़ा........ वफ़ा की हैं"

मैंने ये ग़लती कई दफ़ा की हैं, 

बस वफ़ा...... वफ़ा........ वफ़ा की हैं

बस वफ़ा की हैं @Parveen @Sandeep Kumar @Chandan Kumar @सार (एक एहसास) AS_writes

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"तेरे नाम का व्रत वो पुरुषों से बराबरी की वकालत भी करती हैं, फ़िर उनके नाम का व्रत रख लम्बी उम्र की कामना भी करती हैं ।"

तेरे नाम का व्रत वो पुरुषों से बराबरी की वकालत भी करती हैं, 

फ़िर उनके नाम का व्रत रख लम्बी उम्र

की कामना भी करती हैं  ।

ऐसे कैसे चलेगा........

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"मैं नाम नहीं जो मिट जाऊंगा, मैं विचार हूँ, जब - जब भी लोगो के जेहन में आऊँगा मैं जी उठूंगा ।"

मैं नाम नहीं जो मिट जाऊंगा, 
मैं विचार हूँ, 
जब - जब भी लोगो के जेहन में आऊँगा
मैं जी उठूंगा  ।

मैं गांधीं हूँ @shivam kumar mishra @AS_writes @🇦 🇳 🇰 🇮 🇹 🇮🇳 🇲OTIVATIO🇳0️⃣6️⃣ @Sandeep Kumar

7 Love

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"आप भी कमाल पुछतें हों, टुटें से उसका चाल पुछतें हों। राख ले गई अपने साथ समेट के कितनी लकड़ियाँ, मुर्दें से ये कैसा सवाल पुछतें हों।। और तुम भूल कर भी न बैठना मेरें कनिस्तर पे, पुराने कैलेंडर से क्यों नया साल पुछतें हों।।। तुम जाओं तुम्हें जहां जाना हैं, तुम जाओं तुम्हें जहां तक जाना हैं, जो दफ़न हो चुका उससे क्या मलाल पुछतें हों।।।। ईद, बकरीद, होली, दीवाली, दशहरा मेरा सब तुमसे था, गैरों का दामन थाम के, अब मेरा हाल पुछतें हों ।"

आप भी कमाल पुछतें हों, 
टुटें से उसका चाल पुछतें हों। 

राख ले गई अपने साथ समेट के कितनी लकड़ियाँ, 
मुर्दें से ये कैसा सवाल पुछतें हों।। 

और तुम भूल कर भी न बैठना मेरें कनिस्तर पे, 
पुराने कैलेंडर से क्यों नया साल पुछतें हों।।। 

तुम जाओं तुम्हें जहां जाना हैं, 
तुम जाओं तुम्हें जहां तक जाना हैं, 
जो दफ़न हो चुका उससे क्या मलाल पुछतें हों।।।। 

ईद, बकरीद, होली, दीवाली, दशहरा मेरा
सब तुमसे था, 
गैरों का दामन थाम के, अब मेरा हाल पुछतें हों  ।

मेरा हाल पुछतें हों

आप भी कमाल पुछतें हों,
टुटें से उसका चाल पुछतें हों।

राख ले गई अपने साथ समेट के कितनी लकड़ियाँ,
मुर्दें से ये कैसा सवाल पुछतें हों।।

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