Pushpa D

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Bokaro steel city

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"जाना गर इतना भारी न होता, तो आना कितना आसान हो जाता.......... @पुृष्पवृतियां"

जाना गर इतना भारी न होता,    
तो आना कितना आसान हो जाता..........

                                             @पुृष्पवृतियां

#DesertWalk

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"कहना बहुत कुछ हो, और कुछ कहा न जाता हो, बहुत कुछ कह जाती हैं,मुस्कान हल्की हल्की सी........ जानने वालों से चलता है याराना, याद उनकी भी अक्सर मन भर देती हैं, जिनसे हो जाती हैं पहचान हल्की हल्की सी.......... गगन को चूमने की, पवन संग झूमने की ख़्वाहिशें,उनकी ही दम धरे, परो में हैं जिंदा जिनके उड़ान हल्की हल्की सी........... यूं तो समझा रखा हैं दिल को, समझ भी जाता हैं मगर, अपने धुन की लाता हैं, तूफान हल्की हल्की सी........... वो जाना उनका, तड़पा जाता हैं अक्सर ही, जाते जाते पलट कर देखना, हाय ले जाती हैं जान हल्की हल्की सी........... @पुष्पवृतियां"

कहना बहुत कुछ हो, और कुछ कहा न जाता हो,        
बहुत कुछ कह जाती हैं,मुस्कान हल्की हल्की सी........
                    जानने वालों से चलता है याराना, 
                           याद उनकी भी अक्सर मन भर देती हैं, 
जिनसे हो जाती हैं 
                   पहचान हल्की हल्की सी.......... 
गगन को चूमने की,                                                
पवन संग झूमने की ख़्वाहिशें,उनकी ही दम धरे,          
परो में हैं जिंदा जिनके उड़ान हल्की हल्की सी........... 
        यूं तो समझा रखा हैं दिल को, 
 समझ भी जाता हैं मगर,  
अपने धुन की लाता हैं,    
          तूफान हल्की हल्की सी...........
    वो जाना उनका, 
                 तड़पा जाता हैं अक्सर ही, 
                    जाते जाते पलट कर देखना, 
हाय ले जाती हैं जान हल्की हल्की सी...........

                                        @पुष्पवृतियां

कुछ यूं ही सा

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"वो है, वो ख़्वाब, जो नज़र को छू कर जाती हैं, वो है वो बात जो चुपचाप लबों से गुज़र जाती हैं....... वो है, वो शोर, जो सुनना मुझे गंवारा नही, वो है मांझी मगर मेरा कोई किनारा नही.......... वो हैं, वो सुकून, पर उथल पुथल से मेल मेरा, वो है ठहराव सम, आँधियों सा मन रहा उद्वेल मेरा......... धुप सा सौंधा है वो, दीये सा जलना है मुझे, अकेला हूँ अकेला ही चलना हैं मुझे.......... दूर तलक जाना है,न संग चलो न हाथ धरो, इतने विरोधाभासो में अब मेल की बात न करो....... @पुष्पवृतियां ©Pushpa D"

वो है,                                              
वो ख़्वाब,                                        
जो नज़र को छू कर जाती हैं,             
                      वो है वो बात जो चुपचाप लबों से गुज़र जाती हैं.......

           वो है,                                         
वो शोर,                           
जो सुनना मुझे गंवारा नही, 
                             वो है मांझी मगर मेरा कोई किनारा नही..........

      वो हैं,                                                         
वो सुकून,                                             
पर उथल पुथल से मेल मेरा,                  
                      वो है ठहराव सम, आँधियों सा मन रहा उद्वेल मेरा.........

              धुप सा सौंधा है वो,
                   दीये सा जलना है मुझे,
                                                 अकेला हूँ अकेला ही चलना हैं मुझे.......... 

दूर तलक जाना है,न संग चलो न हाथ धरो,           
इतने विरोधाभासो में अब मेल की बात न करो.......

                  @पुष्पवृतियां

©Pushpa D

#अंतर्मन संग बाते

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"अहा! कितने सुंदर पंख तुम्हारे, कुछ कुछ मेरी आशाओं के गगन जैसे......... तुम भी कितने कोमल हो, बिल्कुल मेरे मन जैसे...... तुम्हें देख आनंद की गति में, हर्ष के अनंत आकाश तक पंखो को फैलाकर उड़ान भरने को जी होता हैं........ मगर डरती हूँ नियति से........ उस हश्र के भय के सिहरन से, उस कराह से जो परो को नोचें जाने का होता हैं, उस अदृश्य लहू के रिसाव से, जो अंतर्मन की पीड़ा में होती हैं.............. इसलिए स्वीकार्य हैं, ये बंधन, ये बेड़िया, ये पिंजर, स्वीकार्य हैं मुझे, तेरे लिए भी, मेरे लिए भी.......... @ पुष्पवृतियां ©Pushpa D"

अहा! कितने सुंदर पंख तुम्हारे,                         
                                             कुछ कुछ मेरी आशाओं के गगन जैसे.........
                   तुम भी कितने कोमल हो, 
                  बिल्कुल मेरे मन जैसे......
    तुम्हें देख आनंद की गति में,         
हर्ष के अनंत आकाश तक        
                             पंखो को फैलाकर उड़ान भरने को जी होता हैं........
मगर डरती हूँ नियति से........  
                       उस हश्र के भय के सिहरन से,
उस कराह से 
                              जो परो को नोचें जाने का होता हैं, 
उस अदृश्य लहू के रिसाव से,
                      जो अंतर्मन की पीड़ा में होती हैं..............  
इसलिए स्वीकार्य हैं, ये बंधन, ये बेड़िया, ये पिंजर, 
     स्वीकार्य हैं मुझे,
 तेरे लिए भी, 
           मेरे लिए भी.......... 

                             @ पुष्पवृतियां

©Pushpa D

खग संग मन की बातें

कुछ यूं ही सा

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"इक शाम ,इक ख्याल और मैं, न जाने कितने सवाल और मैं, सवाल रुग्ण हैं, ख्याल मौन हैं, जो था अगर वो सत्य, जो हैं वो कौन हैं........... जो बदल गया, वो मुझमें, बदलना जरुरी था क्या, बदल ही गया, तो बदल कर उसे, मुझे मिला क्या.......... क्या संभव हैं फिर उस गुमशुदा को पाना, क्या संभव हैं ताउम्र इस मिले से निभाना....... इक सोंच, गहरी स्वांस मंद मंद और मैं, इक प्याला चाय का, इक द्वंद और मैं......... ये जो मेरा आज हैं, वो समय और ज़माने का हैं, जो मेरा अपना था, अब महज़ फसाने का हैं........ इक क्षोभ, इक तलाश और मैं, मेरी अधुरी प्यास और मैं.............. @पुष्पवृतियां ©Pushpa D"

इक शाम ,इक ख्याल और मैं,                                                         
न जाने कितने सवाल और मैं,                                                        
सवाल रुग्ण हैं, ख्याल मौन हैं,                                                        
जो था अगर वो सत्य, जो हैं वो कौन हैं........... 
जो बदल गया, 
वो मुझमें,       
              बदलना जरुरी था क्या, 
 बदल ही गया, 
      तो बदल कर उसे, 
मुझे मिला क्या.......... 
क्या संभव हैं फिर उस गुमशुदा को पाना, 
      क्या संभव हैं ताउम्र इस मिले से निभाना.......
इक सोंच, 
                           गहरी स्वांस मंद मंद और मैं, 
                       इक प्याला चाय का, इक द्वंद और मैं.........
ये जो मेरा आज हैं, वो समय और ज़माने का हैं,           
जो मेरा अपना था, अब महज़ फसाने का हैं........       
   इक क्षोभ, इक तलाश और मैं,
           मेरी अधुरी प्यास और मैं.............. 

                                 @पुष्पवृतियां

©Pushpa D

#अनुभव

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