Pushpvritiya

Pushpvritiya

india

  • Popular
  • Latest
  • Repost
  • Video

""

"कुछ कहानियां गढ़ी गई, कुछ किरदार मारे गए, पटकथा मरोड़ी गई, नए सूत्रधार उतारे गए............. दरअसल रस नही था, काव्य नही बन पाता, तो इसलिए, उस आनंद, उस अनुभूति के आस्वादन हेतू, मूल रूप में रसों के सहारे गए...... और कुछ कहानियां गढ़ी गई, कुछ किरदार मारे गए, पटकथा मरोड़ी गई, नए सूत्रधार उतारे गए........ फिर नाटकों के मंचन हुए, भावो के विमोचन हुए, हथेलियों की थाप, तालियों की गड़गड़ाहट, गुंजित रंगमंच, सजल नेत्र लोचन हुए............. और यूं ही खंड खंड कर रूपान्तरित मूल सारे हुए............. कुछ कहानियां गढ़ी गई, कुछ किरदार मारे गए, पटकथा मरोड़ी गई, नए सूत्रधार उतारे गए............. @पुष्पवृतियां ©thak gaya aur chalne ki kwahish nahi"

कुछ कहानियां गढ़ी गई,                                              
कुछ किरदार मारे गए,                                                
            पटकथा मरोड़ी गई,                                 
नए सूत्रधार उतारे गए.............   
            
  दरअसल रस नही था,                    
काव्य नही बन पाता,                   
तो इसलिए, 
उस आनंद,
 उस अनुभूति के आस्वादन हेतू,      
मूल रूप में रसों के सहारे गए...... 
और कुछ कहानियां गढ़ी गई, 
कुछ किरदार मारे गए,          
पटकथा मरोड़ी गई,            
नए सूत्रधार उतारे गए........ 

फिर नाटकों के मंचन हुए,                                 
भावो के विमोचन हुए,                                     
हथेलियों की थाप, तालियों की गड़गड़ाहट,                          
गुंजित रंगमंच, सजल नेत्र लोचन हुए.............                    
और यूं ही खंड खंड कर               
 रूपान्तरित मूल सारे हुए.............
कुछ कहानियां गढ़ी गई,        
कुछ किरदार मारे गए,          
पटकथा मरोड़ी गई,             
    नए सूत्रधार उतारे गए.............

  @पुष्पवृतियां

©thak gaya aur chalne ki kwahish nahi

 

110 Love
1 Share

""

"हँसत, खेलत, चलत, उम्र की तेरहवीं में आई री......... कोरी कोरी सादी चूनर, बाबा से मंगवाई री.......... पंख बनाकर वो चूनर, मां की लाडो लहराई री........... स्वप्नलोक कोई कहीं, सुदूर तक आकाश सजाई री............. हाय री विघ्ना...... बस धरा से कुछ ऊपर तक की,उड़ान भर पाई री, चुभ गई कुछ नज़र, फब्तियां, सीने को ढांक सकुचाई री............. मंशा कोऊ चूनर छूने की, कोऊ तार तार को आई री........... धम्म पड़ौ फिर कहीं मनोबल, जोडूं, जोड़ न पाई री.......... आंगन, चौखट, घर की देहरी, लांघू, ये सोंच घबराई री, फिर सेहरा, डोली द्वार पर,पिय नाम चूनर रंगवाई री........... और लाल रंग को भाल सजा, पिया तोरी होकर आई री............ पिय प्रेम तो ढांका ढ़ाका हैं,पिय भेद करौ पराई री, जा तन तोरा मन राखा, सो तन घाव लगाई री........... मैला धोया, चौका लिपा, चुल्हा ही सुलगाई री, निज उदर क्षुब्धा जला, अपनो को कोर खिलाई री............ पक्की ये दुनिया हिसाब में, पक्का हिसाब कर जाई री, जाहिल की जाहिल मैं रही, रोटियां गिन नही पाई री.............. मैं भी वही, मेरी चूनर भी, बस तेरहवीं से तिरपनवी, झुर्रियां, चमड़ी झूली, दर्पण देख लजाई री, आज भी मोरी चूनर मोसे लिपटी देत दुहाई री, हे विघ्ना, फिर चूनर की, यो गति न कबहूं दोहराई री.......... @पुष्पवृतियां ©thak gaya aur chalne ki kwahish nahi"

हँसत, खेलत, चलत, उम्र की तेरहवीं में आई री.........                           
कोरी कोरी सादी चूनर, बाबा से मंगवाई री.......... 
पंख बनाकर वो चूनर,                      
मां की लाडो लहराई री...........       
स्वप्नलोक कोई कहीं, 
                        सुदूर तक आकाश सजाई री.............
हाय री विघ्ना......                                                     
बस धरा से कुछ ऊपर तक की,उड़ान भर पाई री,                    
चुभ गई कुछ नज़र, फब्तियां,    
      सीने को ढांक सकुचाई री............. 
           मंशा कोऊ चूनर छूने की, 
                          कोऊ तार तार को आई री........... 
                 धम्म पड़ौ फिर कहीं मनोबल, 
                जोडूं, जोड़ न पाई री.......... 
आंगन, चौखट, घर की देहरी,             
लांघू, ये सोंच घबराई री,                     
                                        फिर सेहरा, डोली द्वार पर,पिय नाम चूनर रंगवाई री...........        
और लाल रंग को भाल सजा, 
        पिया तोरी होकर आई री............ 
पिय प्रेम तो ढांका ढ़ाका हैं,पिय भेद करौ पराई री,                           
    जा तन तोरा मन राखा,                          
सो तन घाव लगाई री...........          
मैला धोया, चौका लिपा, चुल्हा ही सुलगाई री, 
                   निज उदर क्षुब्धा जला, अपनो को कोर खिलाई री............ 
पक्की ये दुनिया हिसाब में, पक्का हिसाब कर जाई री,             
जाहिल की जाहिल मैं रही, रोटियां गिन नही पाई री.............. 
मैं भी वही, मेरी चूनर भी, 
बस तेरहवीं से तिरपनवी, 
झुर्रियां, चमड़ी झूली,      
दर्पण देख लजाई री,     
आज भी मोरी चूनर मोसे लिपटी देत दुहाई री, 
                    हे विघ्ना, फिर चूनर की, यो गति न कबहूं दोहराई री..........

                              @पुष्पवृतियां

©thak gaya aur chalne ki kwahish nahi

 

65 Love
1 Share

""

"तन आहत हैं, रक्तरंजित मन पड़ा हैं, स्वांस अब भी चल रही हैं, मैं अभी ज़िंदा हूँ............. पैरो तले रौंदी गई अनंत आशाएं मगर, कामनायें पल रही हैं,मैं अभी ज़िंदा हूँ.............. वर्चस्व के मद में अन्धांध अत्याचार, झेला सहा संभल रही हूँ, मैं अभी ज़िंदा हूँ............ हो सकता हैं जहां तक, तुमने नकारा हैं वहां तक, अस्तित्व की बाती मेरी, मद्धम गति में जल रही थी, जल रही हैं, मैं अभी ज़िंदा हूँ.................... तु जानता हैं एक मेरा कमज़ोर होना, तुम्हें बलवान कितना बनाता हैं मेरा उपकार हैं कि हे पुरुष तु पुरुष बन पाता हैं.... मैं जो धरती सी हूँ, तो सुन मेरे स्वभाव में माँ हैं, मेरा निर्माण हैं तु,गौर कर मेरी ही रचना हैं......... फिर भी कुचलना हैं तुझे तो शौक से कुचल ले आ, संग समय के मेरी प्रकृति बदल रही हैं, मैं अभी ज़िंदा हूँ............... @पुष्पवृतियां ©Pushpa Diiii"

तन आहत हैं,           
 रक्तरंजित मन पड़ा हैं, 
     स्वांस अब भी चल रही हैं,
       मैं अभी ज़िंदा हूँ............. 

    पैरो तले रौंदी गई अनंत आशाएं मगर, 
                           कामनायें पल रही हैं,मैं अभी ज़िंदा हूँ..............     

              वर्चस्व के मद में अन्धांध अत्याचार,                                    
झेला सहा संभल रही हूँ, मैं अभी ज़िंदा हूँ............ 

                            हो सकता हैं जहां तक, तुमने नकारा हैं वहां तक, 
अस्तित्व की बाती मेरी,        
               मद्धम गति में जल रही थी, जल रही हैं, 
              मैं अभी ज़िंदा हूँ....................        
          
       तु जानता हैं एक मेरा कमज़ोर होना,
तुम्हें बलवान कितना बनाता हैं 
                          मेरा उपकार हैं कि हे पुरुष तु पुरुष बन पाता हैं....

        मैं जो धरती सी हूँ, तो सुन मेरे स्वभाव में माँ हैं, 
          मेरा निर्माण हैं तु,गौर कर मेरी ही रचना हैं.........

फिर भी कुचलना हैं तुझे तो शौक से कुचल ले आ,          
    संग समय के मेरी प्रकृति बदल रही हैं,                              
मैं अभी ज़िंदा हूँ...............

                 @पुष्पवृतियां

©Pushpa Diiii

नारी सर्ग

52 Love

""

"रात ख़्वाब सा जिंदगी को आ मिला, वो जो आसमां सा था, जमीं को अा मिला........ और जर्रा जर्रा, सौंध सौंध सा भींगा भींगा, उनकी चश्म का मोती मेरी नमीं को आ मिला........ चाहतें ढली शिद्दत-ए-खुदाई में, मज़ार की मन्नत कोई,बंदगी को आ मिला........... खुशनुमा, खुबसुरत, ख़ुमार वो क्या ग़ज़ब, ख़्वाब की रंगत लिए ख़्वाब ही को आ मिला........ और पंक्तियाें से थोड़ा अलग......... कि "ऐ काश" जैसी दिलकशी "काश" ही में आता हैं, सब ख़ाक "काश" जो सही को आ मिला........ @पुष्पवृतियां ©Pushpvritiya"

रात ख़्वाब सा जिंदगी को आ मिला, 
                वो जो आसमां सा था, जमीं को अा मिला........ 

      और जर्रा जर्रा, सौंध सौंध सा भींगा भींगा, 
                    उनकी चश्म का मोती मेरी नमीं को आ मिला........ 

चाहतें ढली शिद्दत-ए-खुदाई में,         
                     मज़ार की मन्नत कोई,बंदगी को आ मिला...........     

       खुशनुमा, खुबसुरत, ख़ुमार वो क्या ग़ज़ब, 
                  ख़्वाब की रंगत लिए ख़्वाब ही को आ मिला........ 

और पंक्तियाें से थोड़ा अलग.........                                      
                   कि "ऐ काश" जैसी दिलकशी "काश" ही में आता हैं, 
              सब ख़ाक "काश" जो सही को आ मिला........ 

                              @पुष्पवृतियां

©Pushpvritiya

कुछ यूं ही सा

#wetogether

52 Love
1 Share

""

"ऐ सुधी मेरी, सुन कभी, होगा कोई दिन, कुछ पल छिन, अपने भी........ ये कर्म की गुत्थी थोड़ी सुलझ जाए, कर्तव्य की गठरी थोड़ी हल्की हो जाए.......... स्वप्न अपनो के पहुंचे सिरहाने तक, राह धर ले सब अपने ठिकाने तक.......... फिर कुछ बेफिक्र सांसें हम भी ले लेंगे, खोलकर बांहें हवाओ संग खेलेंगे, उम्र की ये सीढ़ियाँ थका भी दे तो क्या, सफेदी से वापस कौमार्य के रास्ते लेंगे.......... और झुर्रियों संग अल्हड़पन का मेल करके हम, धुंधली नज़र से ही सारे नज़ारे देखेंगे, चांद को कविता में ढालेंगे ,सितारे देखेंगे....... निश्चिंत दोनो संग, कंपित काया,कंपित ऊंगलियाँ, तेरा भी प्यारा पेय, मेरी चाय, खुला चौबारा, अपनी चुगलियां.......... @पुष्पवृतियां ©Pushpvritiya"

ऐ सुधी मेरी, 
सुन कभी,   
              होगा कोई दिन, 
            कुछ पल छिन,
               अपने भी........ 
ये कर्म की गुत्थी थोड़ी सुलझ जाए,
               कर्तव्य की गठरी थोड़ी हल्की हो जाए.......... 
 स्वप्न अपनो के पहुंचे सिरहाने तक,                 
राह धर ले सब अपने ठिकाने तक..........      

                          फिर कुछ बेफिक्र सांसें हम भी ले लेंगे, 
                   खोलकर बांहें हवाओ संग खेलेंगे, 
                        उम्र की ये सीढ़ियाँ थका भी दे तो क्या,
                                   सफेदी से वापस कौमार्य के रास्ते लेंगे..........

  और झुर्रियों संग अल्हड़पन का मेल करके हम,
 धुंधली नज़र से ही सारे नज़ारे देखेंगे,             
चांद को कविता में ढालेंगे ,सितारे देखेंगे.......

निश्चिंत दोनो संग, 
               कंपित काया,कंपित ऊंगलियाँ,
                                    तेरा भी प्यारा पेय, मेरी चाय, 
                खुला चौबारा, 
                             अपनी चुगलियां..........

                                    @पुष्पवृतियां

©Pushpvritiya

#you&Me @Sudha Tripathi

51 Love
1 Share