bhavna Pindari

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"याद बहुत आता है दादा का गांव घूमते थे लहराते खेतों में हम नंगे पाव और जब थक जाते थे घूम कर बहुत फिर बैठ जाते फिर नीम की छांव। याद बहुत आता है दादा का गांव।। पर अब हम शहर में हैं गर्मी और धुएं के कहर में हैं हर रोज नए पहर में हैं । और अब हम शहर में है।। सुना है दादा का गांव भीअब एक शहर हो गया है। लहराता सा जो खेत था वह बंजर हो गया है। नंगे पाव अब कोई दौड़ता नहीं उसमें क्योंकि दादा का गांव भी शहर हो गया।। Bhavna pindari"

याद बहुत आता है दादा का गांव
 घूमते थे लहराते खेतों में हम नंगे पाव
 और जब थक जाते थे घूम कर बहुत 
फिर बैठ जाते फिर नीम की छांव।

 याद बहुत आता है दादा का गांव।।

 पर अब हम शहर में हैं
 गर्मी और धुएं के कहर में हैं
 हर रोज नए पहर में हैं ।
और अब हम शहर में है।।

सुना है दादा का गांव भीअब एक शहर हो गया है।
 लहराता सा जो खेत था वह बंजर हो गया है।
 नंगे पाव अब कोई दौड़ता नहीं उसमें 
क्योंकि दादा का गांव भी शहर हो गया।।



Bhavna pindari

#village

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"वह मकान को अपना घर बना लेती है। अनजान लोगों के बीच अपना शहर बसा लेती है।। बेटी जब ससुराल जाती है बहू बन जाती है।। लोग कहते हैं घर की बहू है और वो उसे , बहू का घर बना देती है।। Bhavna pindari ,"

वह मकान को अपना घर बना लेती है।
 अनजान लोगों के बीच अपना शहर बसा लेती है।।

 बेटी जब ससुराल जाती है 
बहू बन जाती है।।

 लोग कहते हैं घर की बहू है 
और वो उसे ,
बहू का घर बना देती है।।




 Bhavna pindari
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"चांद नहीं है तो क्या रात वही है। बात नहीं अब हमारे बीच ,जज्बात वहीं है। और मैं रूठा नहीं, बस खामोश हूं। नहीं पता होश में हूं या बेहोश हूं । दिल के जज्बात और भी गहरे हो गए। तुम थे तो चल पड़े थे ,नहीं हो तो ठहरे रह गए। देर रात तक बातें अब होती नहीं, और जो आंखें जागती थीं रातों को अब सोती नहीं । इन आंखों में तुम बसे थे अब कोई नहीं है। रातें तो रोज आती है ये अर्सो से सोई नहीं है। और आलम ये है कि मैं घट रहा मुझमें तुम बढ़ रहे हो। यह हिचकियां रुकती नहीं मेरी शायद याद कर रहे हो।। bhavna pindari"

चांद नहीं है तो क्या रात वही है।
 बात नहीं अब हमारे बीच ,जज्बात वहीं है।
 और मैं रूठा नहीं, बस खामोश हूं।
 नहीं पता होश में हूं या बेहोश हूं ।
दिल के जज्बात और भी गहरे हो गए।
 तुम थे तो चल पड़े थे ,नहीं हो तो ठहरे रह गए।
 देर रात तक बातें अब होती नहीं,
 और जो आंखें जागती थीं रातों को अब सोती नहीं ।
इन आंखों में तुम बसे थे अब कोई नहीं है।
 रातें तो रोज आती है ये अर्सो से सोई नहीं है।
 और आलम ये  है कि
 मैं घट रहा मुझमें  तुम बढ़ रहे हो।
 यह हिचकियां रुकती नहीं मेरी शायद याद कर रहे हो।।



bhavna pindari

#feather

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"यादों का घर ढल जा ए शाम घर जाना चाहता हूं मुदतो हो गए उनसे मिले मिलकर उनकी आंखों में उतर जाना चाहता हूं।। जब ढल जाती है शाम तो रात हो जाती है। फिर उसके बाद घर की याद बहुत आती है।। निगाहें घर को, पर कदम सफर की तरफ जाते हैं। घर के लिए घर से निकलना है, मेरी मजबूरियां बताती है। bhavna pindari"

यादों का घर ढल जा ए शाम घर जाना चाहता हूं 

मुदतो  हो गए उनसे मिले 
मिलकर उनकी आंखों में उतर जाना चाहता हूं।।

 जब ढल जाती है शाम
 तो रात हो जाती है।
 फिर उसके बाद घर की याद बहुत आती है।।

 निगाहें घर को, पर कदम सफर की तरफ जाते हैं।

 घर के लिए घर से निकलना है,
 मेरी मजबूरियां बताती है।




bhavna pindari

#YaadonKaGhar

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"Grandparents say माथा लकीरों से भर आता है और चेहरा उम्र बताता है। बूढ़ा हो जाए शरीर गर तो फिर आराम चाहता है ।। जैसे सूरज हर शाम ढलता है। जीवन में सुख दुख चलता है वैसे ही बचपन जवानी में और फिर जवानी बुढ़ापे में बदलता है। Bhavna pindari"

Grandparents say  माथा लकीरों से भर आता है 
और चेहरा उम्र बताता है।

 बूढ़ा हो जाए शरीर गर तो
 फिर आराम चाहता है ।।

जैसे सूरज हर शाम ढलता है।
 जीवन में सुख दुख चलता है 

वैसे ही बचपन जवानी में
 और फिर जवानी बुढ़ापे में बदलता है।






Bhavna pindari

 

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