Anil Siwach

Anil Siwach Lives in Hisar, Haryana, India

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 10

।।श्री हरिः।।
4 - अकाम

'असंकल्पाज्जयेत् कामम्'

काम जानामि ते मूलं संकल्पात् सम्भविष्यसि।
न त्वां संकल्पयिष्यामि ततस्ते प्रभव: कुत:।।

जो उसे देखता है, देखता रहता है। यह आयु, यह सुन्दर शरीर और यह वेश! यह कोई साधुवेश भी होता तो एक बात थी; किंतु जब उसे इसी प्रकार रहना था तो साधु क्यों नहीं हो जाता?

इकहरा गोरा शरीर, साँचे में ढले-से अंग, उन्नत ललाट, पतले लाल अधर, बड़ी-बड़ी भावभरी आंखे और कोमल कलाकार-सी अंगुलियाँ। कठिनाई से पच्चीस वर्ष पूरे किये होंगे। मैली आधी बाँह की कमीज, खादी की मैली कुछ फटी एक ही धोती, एक कम्बल, लोटा और गीता की छोटी-सी पुस्तक - कुल इतना परिग्रह है उसके समीप।

सिर के घुंघराले केश धूसर हो गये हैं, उलझ गये हैं और अस्त-व्यस्त तो रहते ही हैं। छोटी-सी दाढी बढ आयी है। जिसे अपने शरीर को रगड़ कर स्नान करके स्वच्छ करने का ध्यान नहीं रहता, वह वस्त्र और केशों का ध्यान कहाँ तक रखेगा।

शरीर का सौन्दर्य अपना एक आकर्षण रखता है - महत्वपूर्ण आकर्षण। उसे बिना माँगे आग्रहपूर्वक भोजन करा देती हैं माताएँ, जहाँ वह बस्ती में निकल जाता है। साधुवेश न होनेपर भी बहुत-से लोग उसे महात्मा मानकर अनेक बार उसके पीछे पड़े हैं।

'मैं साधु नहीं हूँ - मैं साधु होने योग्य भी नहीं हूँ।' वह थक गया है यह कहते-कहते; किंतु लोग तो अपनी मान्यता कहना जानते हैं। वे सुनना जानते ही नहीं। अत: वह कहीं टिकता नहीं, टिक पाता नहीं। एक से दूसरे स्थान में भटक रहा है।

'मैं साधु होने योग्य नहीं हूँ। अपने भीतर कामना का कलुष लिये साधुवेश ले लूँ तो वेश कलंकित होगा। आपको और संसार को धोखा देना मुझसे बनेगा नहीं।' उसे शिष्य बनाने को तत्पर ही नहीं, समुत्सुक हुए अनेक - कई प्रसिद्ध और गद्दीधारी भी। इतना सुन्दर युवा, सुपठित शिष्य मिले तो कौन गुरु न बनना चाहे; किंतु वह शिष्य बनने को जो प्रस्तुत नहीं है।

उसमें श्रद्धा नहीं है, साधुवेश के प्रति आस्था नहीं है, यह किसी को कभी अनुभव नहीं हुआ; किंतु वह भी दूसरे की कहाँ सुनता है? उसे भी अपनी ही धुन है और अब उसने किसी साधु के स्थान में ठहरना बंद कर दिया है। वहाँ उसका जो पहुँचते ही स्नेह-सत्कार होता है, उसका तात्पर्य वह जान गया है। किसी की आशा पूर्ण करने की स्थिति अपनी न हो तो किसी को आशा में रखा ही क्यों जाय।

वह भटक रहा है, एक से दूसरे स्थान में भटक रहा है।
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'किसी को आशा क्यों बंधायी जाय!' बड़े कसक भरे भाव हैं। 'मेरा दोष? अन्तत: कलुष की परम्परा प्रस्थापित करने से ससांर का क्या उपकार हो सकता है?'

बात मुझे स्पष्ट कर देनी चाहिये; क्योंकि उसकी कहानी आपको मैं बताने चला हूँ। वह संपन्न घर का है, सुशिक्षित है। पिता को उसने रोका था कि वह विवाह अभी नहीं करेगा, किन्तु माता का मन - बहू का देखने की उतावली माता को होती ही है। पिता ने एक सम्बन्ध स्वीकार कर लिया और तब वह घर से निकल भागा।

उसे विवाह नहीं करना है? ऐसी बात तो नहीं है। पिता की प्रेरणा से ही उसने रामायण पढना प्रारम्भ किया था। गीता पढता है। श्रीमदभागवत की कथा में भी उसे पिता ही ले गये थे।

पुत्र में अच्छी संस्कार हों, वह सदाचारी एवं आस्तिक बने, इस प्रकार प्रयत्न करने वाले पिता को आप दोषी नहीं कह सकते और उसका ही क्या दोष था। उसने कथा ध्यान से सूनी और ग्रहण की। यह दोष तो नहीं है।

सृष्टि के आदि में भगवान् ब्रह्मा ने अपने पुत्रों से कहा - 'सृष्टि करो!' और वे ब्रह्मपुत्र तपस्या में लग गये। कथावाचकजी ने अपनी व्याख्या में कहा था - 'काम-कलुषित व्यक्ति की संतान सृष्टि में कलुष बढावेगी, यह बात आदियुग के उन निसर्ग ज्ञानमुर्तियों को समझाना आवश्यक नहीं था। अन्त:करण की शुद्धि प्रत्येक व्यक्ति की प्रथम आवश्यकता है और जितनी वह भगवतप्राप्ति के लिए आवश्यक है, उतनी ही गृहस्थ के लिए भी आवश्यक है।

'काम-कलुषित व्यक्ति की संतान संसार में कलुष ही बढावेगी।' यह बात उसने हृदय में रख ली। एक कान से सुनकर दुसरे से निकाल नहीं दी। आप इसे उसका दोष मानें या गुण।

कितनी निराशा हुई होगी उस कन्या के पिता को और उस भोली बालिका को!' वह कम दुखी नहीं है; किंतु ..... कौन जाने इस हठधर्मी ने, इस अपराध ने ही उसके हृदय को और क्षुब्ध कर दिया हो। किसी निरपराध बालिका की अवमानना - अपराध तो है यह और यह सत्य है कि उसका चित्त घर छोड़ने के पश्चात् अधिक चंचल रहने लगा है। उसके मन के विकार - देह की जितनी उपेक्षा वह कर लेता है, कहीं मन की भी उतनी ही कर पाता।
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भगवती भागीरथी का पावन पुलिन, वट का सुमनोहर आश्रय। उसने नहीं देखा वट के समीप की मढिया को, जिसमें दो भग्नप्राय मूर्तियाँ थीं शुकदेव - महर्षि शुकदेव एवं महाराज परीक्षित की। उस समय शुकताल पर न आज जैसा भव्य मन्दिर था, न आस-पास साधु-आश्रम एवं निवास-भिक्षा की व्यवस्था। जंगल था आसपास - रात्रि में पशु वट के नीचे आनन्द से गुर्रा सकते थे।

किंतु उसमें यह सब देखने-समझने की शक्ति नहीं थी। वह गंगा-किनारे चलता आया और वट-वृक्ष के नीचे गिर पड़ा।

गिर ही पड़ा था वह तीव्र ज्वर के कारण। उसका कम्बल सिर के नीचे पड़ा था। लौटा लुढ़क गया था और वह मूर्छितप्राय पड़ा था। सहसा मस्तक पर किन्हीं करों का सुखद शीतल स्पर्श हुआ और उसने नेत्र खोले।

कोई ग्रामीण कन्या आ गयी थी उस ओर और उसके समीप बैठ गयी थी। मूर्छित अस्त-व्यस्त पड़े यूवक के प्रति सहानुभूति उमड़ आयी थी उसके कोमल चित्त में। वह झुकी पूछ रही थी - 'पानी पिओगे भैया?'

बड़े-बड़े नेत्र, खिले कमल के समान मुख और धूलि-धूसर केशराशि - वह देखता रहा दो क्षण और फिर उसने नेत्र बंद कर लिये।

'मैं संकल्प नहीं करूंगा। मैं जानता हूँ कि काम संकल्प से उत्पन्न होता है। मैं संकल्प करूंगा ही नहीं!' व्यर्थ बात - पिछले कई सप्ताह से वह इस प्रयत्न में विफल रहा है और आज - 'बड़े-बड़े सुमनोहर नेत्र, विकच कमल-सा मुख और घूलिधूसर केशराशि........' मस्तक पर मृदुल करों का स्पर्श हो रहा है, संकल्प रोक देना क्या बहुत सीधी बात है।

'करुणामय! पतितपावन!' वह लगभग चीख पड़ा और आप जानते हैं कि आर्त की पुकार अनसुनी कर देने की शक्ति उस सर्वशक्तिमान में भी नही है।

'संगात्संजायते काम:' जैसे किसी ने पूरे हृदय में प्रकाश का विस्फोट कर दिया हो। मुझे लिखने में देर लगेगी - एकदम, एक साथ उसके चित्त में आलोक फूट पड़ा - 'काम उत्पन्न होता है आसक्ति से। संकल्प ही रोक देना अशक्य है। संकल्प की दिशा बदल देनी है। आसक्ति को दूर करके संकल्प करो न!'

'बहिन, पानी!' उसने नेत्र खोल दिये और वह कन्या उसका लौटा उठाकर भगवती भागीरथी का जल लेने झपटी।

'बड़े-बड़े सूमनोहर नेत्र, खिले कमल-सा परम सुंदर मुख, धूलिभरी केशराशि!' यह उसने देखा ही नहीं कहा भी और कहकर उन्मुक्त भाव से हँस पड़ा।

बात यह हुई कि वह कन्या जब जल लेकर लौटी और उसके कण्ठ में गंगाजल पहुँचा, तब ज्वर की ज्वाला घट गयी। उसे अपनी और एकटक देखते देखकर उस ग्रामीण कन्या ने संकोचपूर्वक पूछा - 'क्या देखते हो?'

'देख रहा हूँ जगद्धात्री जगदम्बा को।' वह पहले गम्भीरतापूर्वक बोला - 'जो जगन्माता प्रत्येक जीव का पालन करती है, वे ही करुणामयी आज अपने एक विपन्न पुत्र के समीप आ बैठी हैं।'

'क्या?' बालिका की समझ में कुछ नहीं आया। यह बात वह तत्काल समझ गया और तब हँसा।

'अपनी बहिन को ये बड़ी-बड़ी सुन्दर आँखें, कमल के समान खिला मुख और ये धूलि से भरे बाल देख रहा हूँ।' वह हंसता हुआ बोला।

'तुम बड़े दृष्ट भाई हो।' वह भी हँस पड़ी। युवक के नेत्रों में जो निष्कलुष भ्रातृत्व था, उसने उस सरला बालिका को भी संकोचहीन कर दिया था; क्योंकि हृदय हृदय के सत्य को शीघ्र पहचान लेता है।
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अब कहने को अधिक कुछ नहीं है। वह उस बालिका के घर चला गया; क्योकि बालिका ने अपने पिता को घर जाकर भेज दिया था उसे उठा लाने को और किसान की सेवा ने बहुत शीघ्र उसे स्वस्थ कर दिया।

आप आश्चर्य करेंगे, वह साधु नहीं बना। वह घर लौट गया उसकी आशा सफल करने, जिसकी आशा भंग कर आया था और उस किसान को अपनी पुत्री के साथ उसके विवाह में सम्मिलित होने का आग्रह स्वीकार करना पड़ा।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 10

।।श्री हरिः।।
3 - मा ते संगोस्त्वकर्मणि

'जीवन का उद्देश्य क्या है?' जिज्ञासा सच्ची हो तो वह अतृप्त नहीं रहती। भगवान की सृष्टि का विधान है कि कोई भी अपने को जिसका अधिकारी बना लेता है, उसे पाने से वह वंचित नहीं रखा जाता।

'आत्मसाक्षात्कार या भगवत्प्राप्ति?' उत्तर तो एक ही है। यही उत्तर उसे भी मिलना था और मिला - 'यह तो तुम्हारे अधिकार एवं रुचिपर निर्भर करता है कि तुम किसको चुनोगे। यदि तुम मस्तिष्कप्रधान हो तो प्रथम ओर हृदयप्रधान हो तो द्वितीय।'

वह राजपूत है - सच्चा राजपूत और यह समझ लेना चाहिये कि सच्चा राजपूत लगन का सच्चा होता है। वह पीछे पैर रखना नहीं जानता - किसी क्षेत्र में बढ़ने पर। सौभाग्य से पिता साधुसेवी थे और सत्संग ने उसे सिखा दिया था कि संसार के भोग तथ्यहीन हैं, उनमें सुख की खोज चावल के लिये तुस कुटने जैसा है।

'परमार्थ का मार्ग तो वह दिखला सकता है, जिसने स्वयं उसे देखा हो।' उसका निर्णय आप भ्रान्त तो नहीं कह सकते। कोई भी मार्ग वही दिखा बता सकता है, जो उसपर चला हो। सुन-सुनाकर बतानेवाले भूल कर सकते हैं। किसी की भूल से जब पूरे जीवन के भटक जाने की आशंका हो, ऐसा भय कौन आमन्त्रित करे। उसने निश्चय किया - 'समर्थ स्वामी रामदास के श्रीचरण ही मेरे आश्रय हो सकते हैं।'

कहाँ ढूँढे वह श्रीसमर्थ को। उन दिनों वे कहीं टिककर रहते नहीं थे। उन्होंने देश-भ्रमण प्रारम्भ कर दिया था। यह ठीक है कि वर्ष-दो-वर्ष में वे 'सातारा' आ जाते थे; किंतु जीवन के साथ जुआ तो नहीं खेला जा सकता जीवन वर्ष-दो वर्ष रहेगा ही - मृत्यु कल ही धर नहीं दबायेगी, इसका आश्वासन?

'स्वामी! मैं आपके समीप से उठनेवाला नहीं हूँ।' उसने श्रीपवनकुमार के श्रीविग्रह के चरणों के पास आसन लगाया। 'श्रीसमर्थ आपके हैं, मैं उन्हें कहां ढूंढने जा सकता हूँ।'

बात सच थी, संत ढूंढ़ने से मिलते होते तो देवर्षि नारद अपने भक्तिसूत्र में न कहते -
'लभ्यतेपि तत्कृपयैव' (४०)

किंतु उन्होंने ही यह भी तो कहा है -
'तस्मिस्तज्जने भेदाभावात्।' (४१)

श्रीमारुति के चरणों में पहुँची आर्त पुकार कभी निष्फल नहीं लौटी है। इस बार भी उसे नहीं लौटना था। पता नहीं कहाँ से घूमते हुए श्रीसमर्थ आ पहुँचे और किसी ग्राम या नगर में पहुँचने पर वे पहले वहाँ के श्रीमारुति मन्दिर में प्रणाम करने पहुँचेंगे, यह तो निश्चित ही रहता है।

'मैं तुम्हें ढूंढ़ने आया हूँ।' श्रीसमर्थ ने पवनकुमार को साष्टांग प्रणिपात किया और अपने पदों में प्रणत उस राजपूत युवक को उठा लिया।

'कृपामय न ढूंढे तो अज्ञ असमर्थ जन उन्हें कहाँ कैसे प्राप्त कर सकता है।' युवक के नेत्रों से अश्रु झर रहे थे।

‘तुम इस प्रकार यहां क्यों बैठे हो?' समर्थ की ओजपूर्ण वाणी गूंजी। 'तुम्हारे-जैसे समर्थ तरुणों की सेवा आज जनतारूप में विद्यमान श्रीजनार्दन माँग रहे हैं।'

'मनुष्य-जीवन बार-बार प्राप्त नहीं होता, यह आप महापुरुषों से ही सुना है।' युवक अपनी जिज्ञासा पर आ गया था। 'आप कृपा करें! यह जीवन आपकी कृपाकोर प्राप्त करके कृतकृत्य हो जायगा।'

'श्रीरघुवीर समर्थ अनंत करुणावरुणालय हैं।' समर्थ स्वामी अभय दे रहे थे। कृपा की क्या कृपणता है वहाँ। उनके श्रीचरणों से कृपा की अजस्त्र स्त्रोतस्विनीं त्रिभुवन को आप्लावित करती झर रही है। तुम अपने को उन श्रीचरणों में अर्पित तो कर दो।'
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'मुझे आज्ञा दें प्रभु!' वह युवक अब एक आश्रम का मुख्य प्रबंधक था। अब वह साधु है - समर्थ का साधु। समर्थ के साधु का अर्थ है - दीनों का सेवक, रोगियों का उपचारक एवं पीड़ितों का मूर्तिमान् आश्वासन, किंतु वह स्वयं आज आर्त हो रहा है। श्रीसमर्थ की प्रतीक्षा कर रहा है वह गत दो महीनों से और आज जब उसके गुरुदेव पधारे हैं, वह उनके श्रीचरणों पर गिर पड़ा है।

'तुम बहुत उद्विग्न दीखते हो!' श्रीसमर्थ ने आसन स्वीकार कर लिया था। अपने को अयोग्य पाता हूँ मैं इस आश्रम के लिए। वह खुलकर रो पड़ा। 'श्रीचरण आज्ञा दें तो एकान्त में कुछ दिन प्रयत्न करुं।'

'कौन-सा प्रयत्न करोगे तुम!' समर्थ स्वामी के मुखपर स्मित आया - अपार वात्सल्यपूर्ण स्मित।

'मन की चंचलता को रोकने का प्रयत्न?' युवक ने उत्तर दिया। 'श्रीचरणों ने ही आदेश किया था कि नैष्कर्म्य की सिद्धि ही आत्मदर्शन का उपाय है।'

'उपाय नहीं - नैष्कर्म्य तथा आत्मदर्शन एक ही बात है।' श्रीसमर्थ ने संशोधन किया। किंतु नैष्कर्म्य का तुम सम्पादन कैसे करोगे? कर्म का त्याग करके?'

'यदि प्रभु आज्ञा दें!' युवक ने अपना मन्तव्य स्पष्ट किया। 'आश्रम में रहकर तो नित्य कार्यव्यग्र रहना ही पड़ता है।'

'एकान्त में जाकर तुम श्वासक्रिया वंद कर दोगे?' समर्थ समझाने के स्वर में बोल रहे थे। 'आहार एवं जल भी तथा शरीरस्थ यन्त्रों की क्रियाओं को भी? यदि यह कर भी लो तो उस पत्थर में और तुममें अंतर क्या होगा?'

'प्रभु!' युवक अपने मार्गद्रष्टा के चरणों पर गिर पड़ा। उसे लगा कि कोई घने अंधकार का पर्दा उसके सम्मुख पड़ा था और अब वह उठने ही जा रहा है।

'आत्मतत्व अक्रिय है। उसकी अनुभूति - समस्त क्रियाशीलता के मूल में जो एक निष्क्रिय सता है, जिसमें क्रिया आरोपितमात्र है, उससे एकत्व का अनुभव।'

सहसा श्रीसमर्थ रुक गये। उन्होंने देखा कि उनका यह अनुगत इस पद्धति को ह्रदयंगम नहीं कर पा रहा है। उन्होंने दिशा बदली - 'क्रिया के संचालक एवं उसके फल के दाता-भोक्ता श्रीरघुवीर हैं। हम-तुम सब उन समर्थ के हाथ के यन्त्र हैं। हमें उनके चरणों में अपने-आपको पूर्णतया अर्पण कर देना है।'

'श्रीचरणों में मैंने अपने को उसी दिन अर्पित कर दिया।' युवक के स्वर में विश्वास था।

'यन्त्र तो नित्य निष्क्रिय है। उसकी क्रिया तो संचालक की क्रिया है।' श्रीसमर्थ ने वह अज्ञान की अन्धयवनिका उठा दी। 'सचमुच तुमने अपने को अर्पित कर दिया है तो नैष्कर्म्य स्वत: प्राप्त है। मन के चांचलय के निग्रह के कर्ता बनने की इच्छा तुम में क्यों आती है?'

'यह अशान्ति - उस आनन्दघन की अनुभूति जो नहीं पा रहा हूँ।' बात सच है। यदि आन्तरिक शान्ति और आनन्द नहीं मिलता तो अवश्य हमसे भूल हो रही है, हमारे साधन में कहीं त्रुटि है।

'अपने को कर्ता मानना छोड़ दिया होता तुमने!' वह त्रुटि जो स्वयं साधक नहीं पकड़ पाता, उसका मार्गद्रष्टा सहज पकड़ लेता है। श्रीसमर्थ से यह त्रुटि छिपी नहीं रह सकती थी। 'कोई पीड़ित नहीं, कोई रोगी नहीं, कोई संतप्त नहीं। तुम न उद्धारक हो, न सहायक। इन रूपों में आनन्दघन श्रीरघुवीर तुम्हारी सेवा लेने आते हैं तुमपर कृपा करके। उनकी सेवा करके तुम कृतार्थ होते हो।'

युवक ने भूमिपर मस्तक रखा और उसके वे गुरुदेव उठ खड़े हुए। उन्हें अब प्रस्थान करना था।
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'तुम जा सकते हो, यदि तुम्हें एकान्त में जाने की आवश्यकता प्रतीत होती हो!' श्रीसमर्थ स्वामी रामदास जब दुसरी बार उस आश्रम पर लौटे, स्वागत-सत्कार समाप्त हो जाने पर अपने चरण के पास बैठे आश्रम के प्रधान की ओर उन्होंने सस्मित देखा।

'मुझसे कोई अपराध हो गया?' प्रधान ने मस्तक रखा श्रीचरणों पर। अन्य आश्रमस्थ साधु सशंक हो उठे। उनके निष्पाप प्रधान ने ऐसा क्या किया कि उन्हें दण्ड प्राप्त हो? किसी अपने चरणाश्रित साधु को समर्थ स्वामी आश्रम से पृथक होकर एकान्त-सेवन का आदेश तभी देते हैं, जब वह कोई अक्षम्य अपराध करता है। यह तो उनका सबसे बड़ा दण्ड है।

'अपराध की बात मैं नहीं कहता!' स्मर्थ स्वामी प्रसन्न थे। 'यह तो तुम्हारी आवश्यकता की बात है। आंतरिक शांति एवं निरपेक्ष आनन्द की उपलब्धि के लिये यदि तुम्हें एकान्त की आवश्यकता प्रतीत होती हो.......।'

'श्रीचरणों को छोड़कर मेरी और कोई आवश्यकता कभी न बने!' आश्रम के प्रधान का स्वर भाव-विह्वल हुआ। 'अज्ञानी आश्रित से त्रुटि होती ही है और दयाधाम शरण्य उसे क्षमा करते हैं। सेवक को सेवा का प्रभु ने सौभाग्य दे रखा है, उसे आनन्द का अभाव कैसे हो सकता है।'

'यही कहने इस बार मैं आया हूँ।' समर्थ रामदास स्वामी ने एक दृष्टि समस्त शिष्यवर्ग पर डाली। 'जो इस विश्व का निर्माता, संचालक एवं संरक्षक है, वह न दुर्बल है न असमर्थ। उसे हमारी सेवा की आवश्यकता नहीं है। यह झूठा अंहकार है कि हम किसी की सेवा करेंगें या हम लोकोपकार करेंगे।'

'तब हमारा यह आश्रम...............।' एक नवीन साधु कुछ कहना चाहता था; किंतु स्वयं उसे अपनी भूल ज्ञात हो गयी। समर्थ स्वामी बोलते जा रहे थे - 'उन प्रभु ने हमें अपनी सेवा प्रदान की, यह उनकी कृपा। प्रत्येक जीव पर उनकी यह अहैतु की कृपा है। सबको उन्होंने एक कार्य देकर यहाँ भेजा है और यदि अपने कार्य का वह ठीक सम्पादन करता है तो सर्वेश की आराधना करता है। इसी आराधना से वह उनकी प्राप्ति करता है।'

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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