Anil Siwach

Anil Siwach Lives in Hisar, Haryana, India

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|| श्री हरि: || सांस्कृतिक कहानियां - 11

।।श्री हरिः।।
12 - स्नेह जलता है

'अच्छा तुम आ गये?' माता के इन शब्दों को आप चाहें तो आशीर्वाद कह सकते हैं; किंतु कोई उत्साह नहीं था इनके उच्चारण में। उसने अपनी पीठ की छोटी गठरी एक ओर रखकर माता के चरण छुये और तब थका हुआ एक ओर भूमि पर ही बैठ गया।

'माँ मुझे देखते ही दौड़ पड़ेगी। दोनों हाथों से पकड़कर हृदय से चिपका लेगी। वह रोयेगी और इतने दिनों तक न आने के लिये उलाहने देगी।' वर्षों से पता नहीं क्या-क्या आशाएँ उमंगें, कल्पनाएँ मन में पाले हुए था वह। 'मैं माँ के पैर छूऊँगा। अपने हाथों उसके नेत्र पोंछूंगा। उसे मनाऊँगा। वह बड़े स्नेह से मेरी एक-एक बात पूछेगी। मेरे लिये दौड़ेगी स्वयं चाय बनाने और मैं उसे मना करूंगा।' जाने कितनी बातें......। लेकिन क्यों वह ऐसी आशा करता था? वह कौन-सी सम्पत्ति लेकर घर लौटा है कि उसका स्वागत हो, उसे स्नेह मिले। वह भड़कीले कपड़ों में आता, सबके लिए सुंदर उपहार लाता, चमकते जूते का मच-मच शब्द करता द्वार में प्रवेश करता - अवश्य उसका स्वागत होता। वह मैले फटे-चिथड़े लपेटे, नंगे पैर, पीला-पीला चेहरा, रोग से दुर्बल शरीर लिए मनहूसी की मूर्ति बना आया है। घर में अन्न नहीं है, इस वर्ष का लगान दिया नहीं गया, बच्चों के शरीर पर भी वस्त्र नहीं और सबकी जिस पर आशा अटकी थी, वही स्वयं भिक्षुक सा बना आ पहुँचा है। घर की समस्याएँ ही क्या कम हैं, अपना ही दुख, अपना ही अभाव क्या छोटा है? और ऐसी अवस्था में जब वह भी एक प्राणी की रोटी का भार बढाने ही अाया है - घरवालों के सारे अभाव, सारे कलेश जैसे आज नये हो उठे हैं। क्षोभ ऐसे बढ गया है, जैसे पके घाव पर ठोकर लग गयी हो। उसका स्वागत? सब गुमसुम हैं, सब नेत्रों एवं चेष्टाओं से ही उपेक्षा व्यक्त करते हैं; कोई घर से निकल जाने को नहीं कहता, यही क्या कम है।

'तुम अपना यह खजाना कहीं ऊपर रख दो।' चाय नहीं, जल नहीं, दो मीठे शब्द तक नहीं। कोई अपरिचित भी घर में आया होता तो उससे पूछा जाता कि वह कहाँ से आया है। यहाँ अपने ही घर वह पूरे दो वर्ष पर लौटा है और कोई उससे कुशल तक नहीं पूछता। उसकी वही स्नेहमयी भाभी झल्लाई, झुंझलाई कह रही है - 'बच्चा आता होगा। कहीं तुम्हारे बहुमूल्य रत्न उठा न ले।'

कितना कष्ट सहकर, कितनी कृपणता से वह भाभी के लिए एक साड़ी लेने को कुछ पैसे बचा सका। बीमारी के पीछे दूध तक तो उसने लिया नहीं। 'भाभी हँसती-दौड़ती आयेंगी और मेरी गठरी उठाकर भाग जायेंगी। मैं उन्हें
रोकूंगा, खीझूंगा और वे मेरी लायी साड़ी पहनकर मेरे लिये जलपान लिए अपनी कोठरी से निकलेगी।' उससे सदा हँसकर बोलनेवाली, अपने पुत्र के समान उसके भोजन-वस्त्रादि की खोज-खबर लेनेवाली भाभी इतनी रूखी हो जायेंगी, इसकी तो कभी स्वप्न में भी उसे आशा नही थी। उसकी मैली छोटी गठरी में एक उजली लाल किनारे की तह की हुई साड़ी है, किसी दुर्बल के मलिन शरीर में छिपे दया एवं सहानुभूति से पूर्ण निर्मल हृदय की भाँति। किस साहस से वह अब उसे निकाले?

'बच्चा आता होगा' - बच्चा मोहन! भाभी की बात कानो में टकराकर सूनी रह गयी। कल्पना ने एक दूसरा चित्र उपस्थित किया। जब चारों ओर रोष, तिरस्कार, उपेक्षा का अन्धड़ चल रहा है, एक शीतल झकोरा आता जान पड़ा। 'मोहन - नन्हा, गोल-मटोल, सुंदर किलकता-सा मोहन!' छि: मनुष्य? भगवान काल क्या तेरी कल्पना के लिए अपने पद रोके खड़े रहेंगे? बच्चा युवक होता है, युवक वृद्ध होता है; किंतु वर्षों पीछे भी तू उसे अपने उसी पुराने रूप में पाने की आशा करता है? मोहन अब वही एक वर्ष का शिशु नहीं, वह तीन वर्ष का हो गया है, यह तुझे क्यों स्मरण नहीं आता?

'मोहन! आओ भैया!' एक नंगा धूलि-भरा दुबला-सा गोरा बालक दौड़ता आया और अपने घर में एक अपरिचित को देखकर सहमा-सा खड़ा हो गया उसी विचित्र मनुष्य को देखता हुआ। 'मैं तुम्हारा चाचा हूँ भैया!' अब भी आशा थी कि बालक पहचान लेगा और समीप आ जायगा; किंतु बालक के नेत्र स्पष्ट कहते हैं - तुम कौन हो? मैं तो किसी चाचा को नहीं जानता। मुझे तुम्हारे पास डर लगता है। क्या पता तुम हौआ या झकौआ। मैं नहीं आऊंगा।'

'देखो, मैं तुम्हारे लिये घोड़ा लाया हूँ।' अब गठरी खोली गयी। लकड़ी का एक छोटा-सा लाल-हरा चमकता घोड़ा - बालक के नेत्र खिलौने पर लग गये। बार-बार पुचकारने पर डरता-डरता धीरे-धीरे आगे बढा वह। हाथ बढाकर खिलौना ले लिया उसने और चाचा ने उसे गोद में खींच लिया। बालक छटपटाने लगा गोद से छूटने के लिए। उसे अपना खिलौना चाहिये। चाचा से उसे कोई मतलब नहीं।

'मां! मां! मेरा घोड़ा!' दौड़ता हुआ बालक अपनी माता के पास पहुँचा।

'चल! घोड़ा ले आये हैं ये - दे दे उनका घोड़ा उन्हें।' माता ने बच्चे के हाथ से छीनकर खिलौना फेंक दिया उसके सामने। पट् से करके वह गिरा और उस लकड़ी के घोड़े का एक कान तथा एक पैर टूट गया। बालक
सन्न हो गया। उसका मुख लटक गया और एक मिनट बाद उसके नेत्रों से अश्रु गिरने लगे। अन्त में हिचकियाँ लेता हुआ वह मां की गोद में ही मुख छिपाने दौड़ा; पर मां ने क्रोध से झटक दिया भूमिपर उसे।

'भाभी!' उसके मुख से और शब्द नहीं निकले। बांयी हथेली पर मस्तक रखकर झुक पड़ा वह। उसे लगता
है कि पूरी पृथ्वी घूम रही है - घूमती जा रही है।

'तुम ऐसे भूमि में क्यों बैठे हों?' बड़े भाई पता नही कब से आकर उसके सामने खड़े हैं। उसने उनके पैरों में सिर रख दिया और बच्चों की भाँति हिचकियाँ लेकर रोने लगा। 'उठो, चटाई पर बैठो! अरे, चाय तो ले आओ।' पत्नी को उन्होंने आज्ञा दी।

'भैया!' उससे बोला नहीं जाता है। उसके नेत्रों की धारा रुकती नहीं है।

'तुम बीमार हो गये थे?' बड़े भाई में स्नेह है या नहीं, कहना कठिन है, किंतु शिष्टाचार तो है ही।

'मैं मरते-मरते बचा हूँ। मर-खपकर जो कुछ बचा पाया था, बीमारी की भेंट हो गया।' उसने भरे कण्ठ से कहा - 'भाग्य में तुम्हारे चरणों के दर्शन थे, इसी से यहाँ पहुँच सका।'

'चलो, अब दो-चार दिन में यहाँ का हवा-पानी स्वस्थ कर देगा तुम्हें।' आश्वासन दिया बड़े भाई ने और साथ ही घर का समाचार भी दिया - 'लगान दो वर्ष का बाकी है पिछले वर्ष खेतों में कुछ हुआ ही नहीं। घर में इस वर्ष कुछ भी नहीं है। उधार के अन्न से कई महीनों से एक समय भोजन करके काम चलाया जा रहा है। पास में दूसरे गाँव के जमींदार एक बाँध बनवा रहे हैं। अच्छी मजदूरी है। मुझे तो खेतों से अवकाश ही नहीं मिलता।'

'मैं कल से ही वहाँ काम पर लग जाऊँगा।' वह और क्या कहे? दो वर्ष पर घर लौटा है, लम्बी बीमारी ने रक्त-मांस चूस लिया है और घर पर दो घूंट चाय मिलने से पहले ही उसे यह सब सूना दिया गया है, बड़ी शिष्टता एवं आत्मीयता से। संसार जब उसकी हड्डियाँ खंखेड़ना ही चाहता है, भागकर कहाँ जायगा वह?
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पहाड़ की तराई में एक छोटा-सा गाँव है। मिट्टी की दीवारें और फूस के छप्पर एक दुसरे से सटे हुए छोटे-छोटे घर हैं चारों ओर कंटीली बाड़ से घिरे हुए। समीप के वन से चीता, शेर, तेंदुआ कभी-कभी रात में इस घेरेबन्दी में भी घुस पड़ते हैं और कोई पशु उठा ले जाते हैं। बकरियाँ, भैंसे और गायें - इनके गोबर से पूरा गांव ही गोष्ठ हो गया है। गाँव के एक ओर तो वन है; किंतु तीन ओर खेत हैं। ऊंची-ऊंची मेड़ें और उनपर सूखे काँटों की बाड़। इतना सब न किया जाय तो क्या सूअर और हिरन खेती बचने देंगे; फसल के दिनों में रात-रात भर जाग कर शशक, सेही, श्रृगाल आदि से रखवाली करनी पड़ती है।

सूखे मुख, दुर्बल देह, फटे मैले वस्त्र - कठोर श्रम करने वाले ये ग्रामवासी किससे कम तपस्या करते हैं? किस तपोवन से घटकर है इनका यह ग्राम? लेकिन कहाँ तपस्वी का निर्लिप्त आनन्दमग्न मानस और कहाँ.....। मनुष्य तो मनुष्य ही है। वह नगरों में रहे या सुदूर वन्य ग्रामों में। वही दौड़-धुप, वही रोटी-कपड़ा, वही घर-खेत, वही स्त्री-बच्चे और चिन्ता लालसा, श्रम - वासना की अशान्तिपूर्ण क्षुधा क्या स्थानभेद से मन्द पड़ना जानती है?

इस छोटे गाँव में एक छोटा-सा घर है। दो भाई, उनकी एक वृद्धा माता, बड़े भाई की स्त्री और उस स्त्री की गोद में एक वर्ष का एक घुंघराले बालों वाला गोलमटोल गोरा सुन्दर शिशु। इतना परिवार है। पहाड़ के पास के खेत वैसे ही बंजर होते हैं और फिर इस ओर वर्षा की कमी प्राय: रहती है। परिवार दरिद्र है; किंतु है स्नेही। सब एक दुसरे से सहानुभूति रखते हैं।

रामनाथ यह पूरा नाम है उसका। माँ और भैया उसे रामू कहते हैं और इसी से गाँववाले भी उसे रामू ही कहते हैं। गठा हुआ पुष्ट शरीर है। नागपञ्चमी को जब एक महीना रह जाता है, गाँव के अखाड़े की उसी से शोभा होती है। गाँव में सभी उसका सम्मान करते हैं।

'बेटा! तू भी कुछ काम किया कर खेत पर।' मां उसे यदा-कदा उपदेश करती है।

'अभी तो वह बच्चा है, उसके खेलने-खाने के दिन हैं।' बड़ा भाई कभी उससे कुछ करने को कहते नहीं। वह स्वयं कुछ करता है तो उसे मनाही करते हैं।

'आज तुमने एक रोटी कम खायी है!' गरीब का घर है। भरपेट भोजन जिस दिन मिले, उम दिन पर्व समझना चाहिये; लेकिन भाभी स्वयं चाहे उपवास कर ले, उसके लिए पूरा भोजन बचा रखती हैं और बैठकर आग्रह करके भोजन कराती हैं उसे।

मोहन - एक वर्षका छोटा-सा मोहन तो अपने चाचा से ही चिपका रहता है। रात को नींद टूटने पर वह 'चाचा, चाचा' कहकर ही रोता है। रामू का सम्पूर्ण सुख तो मोहन ही है।

'मैं रंगून जाऊंगा!' एक दिन अचानक रामू ने घर को अपने प्रस्ताव से चौंका दिया। रंगून से लौटा है विजयपाल। सिर पर अग्रजी ढंग से कटे सुंदर बाल हैं, हाथों में एक सस्ती घड़ी बँधी है, शरीर पर उजले मलमल का कुर्ता है, पैरों में चमचम करता बूट है। रामू विजयपाल से मिल आया है। 'रंगून में रुपये तो जैसे बरसते हैं।' पता नहीं क्या-क्या कहा है विजयपाल ने उससे। अब वह भी रंगून जायगा।

माँ रोती है। भैया कहते हैं - 'तुम यहीं काम करो।' भाभी रोक रही है और साथ ही पूछती भी है - 'मेरे लिए क्या लाओगे?' नन्हें मोहन को कुछ पता नहीं। चाचा उससे कहता है - 'तेरे लिये घोड़ा लाऊंगा, हाथी लाऊँगा, पैरगाड़ी लाऊँगा।' वह हँसता है। उसे क्या पता कि रंगून कोई चिड़िया है, हिरन है या मिठाई है।

'मैं रंगून जा रहा हुँ।' पड़ोस के गाँव में एक लड़की है; छिपकर रामू को उससे यह बात कहनी पड़ी, जब वह अपनी गायें वन में से लौटा रही थी। उसने एक बार मुड़कर देखा रामू की ओर और केवल 'हूँ!' कहा। रामू को लगा कि उसकी आँखें भर आयी हैं। 'मैं जल्दी ही लौट आऊँगा। तेरे लिए बहुत से गहने ओर रेशम की साड़ियाँ लाऊँगा।' रामू ने साथ चलते-चलते कहा। उसने सिर झुका लिया। पैरों की गति बढी या मन्द हुई, कुछ उलझन की बात है। रामू और वह बचपन से साथ खेले हैं। वन में दोनों साथ बकरियाँ चराते थे और झरबेरी एकत्र करते थे। लेकिन अब उसकी रामू के साथ मंगनी हो गयी है। अब बात बदल गयी और संभवत: बदली बात ने गूँगी कर दिया उसे। वह गूँगी हो नहीं गयी है, केवल रामू के पास रहने पर गूँगी हो जाती है।

अंत में विजयपाल के साथ रामू रंगून के लिए चल पड़ा। बड़े भैया उसे स्टेशन तक पहुँचा गये। गाँव से दूर तक तो बहुत-से लोगों ने पहुंचाया था। जब गाड़ी स्टेशन से चल पड़ी, उसके नेत्रों से अश्रु टपक रहे थे। विजयपाल रंगून के किस सुयशका वर्णन कर रहा है, इसका उसे तनिक भी ध्यान नहीं था।
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वह रंगून अपने लिये - अपने सुख के लिये गया? उसका अन्तरात्मा जानता है या फिर घट-घट की जानने वाला जानता है। अपनी जन्मभूमि, अपने संगी-साथी, अपना सौहार्दपूर्ण परिवार छोड़ने में उसे कितनी व्यथा हुई थी, वही जानता है! रंगून पहुँचने पर भी कई दिनों तक उसे घर की स्मृति ही दिन-रात बनी रहती थी। न भोजन अच्छा लगता था, न वस्त्र। किसी से बोलना अखरता था। भरे-भरे नेत्र देखकर आस-पास के लोग समझाते और कभी-कभी परिहास भी करते थे।

घर छोड़कर वह गया था, उसे जाना पडा था कहना ठीक होगा। बड़े भाई दिनभर श्रम करते थे और इतने पर भी दोनों समय पेट भरने को सूखी रोटी जूटती नहीं थी। भाभी की साड़ी में रोज एक पैबन्द बढता जाता था। नन्हें मोहन को पिलाने के बदले बकरी का दूध बेचना पड़ता था। दूध बेचा न जाय तो लगान कहाँ से आवे? वह कब तक यह सब देखता? उससे कोई कुछ कहता नहीं था; किंतु उसके भी तो नेत्र थे।

रंगून का वैभव - वहाँ की चकाचौंध, लेकिन वह सब सच होकर भी उसके लिए स्वप्न था। उसे तो एक छोटी सी गंदी कोठरी, दिन भर हड्डी तोड़ परिश्रम और रुखी रोटी या उबला चावल नमक के साथ मिलता था। सब उसका परिहास करते थे। सब उसे कृपण बतलाते थे। एक-एक कौड़ी दाँत से पकड़ना सीख गया था वह। परिश्रम और पैसा - उसके भाई, उसकी भाभी, उसके भाई का नन्हा पुत्र मोहन - और वह उन सबके लिए ही तो रंगून आया है। वह पैसा जोड़ने में जुट गया है। एक पैसे का साग लेना या सिर में अधेले का तेल डाल लेना उसे बहुत बड़ा अपव्यय जान पड़ता है। वह यहां क्या सुख भोगने आया है?

विजयपाल ने अब उससे मिलना भी बंद कर दिया है। वह स्वस्थ है, देखने में सुंदर है, उसका शरीर सुगठित है। विजयपाल उसे अपने साथ कुछ आशा लेकर ही तो लिवा लाया था। एक अच्छी धनी बर्मी स्त्री उससे विवाह कर लेगी। वह धनी हो जायगा और विजयपाल को भी लाभ होगा। अधिक नहीं तो वह उसके धान के खेतों और बगीचों का प्रबन्धक ही बन जायगा। अधिकांश भारतीय ऐसा करते हैं। बर्मा में विवाह करके रहना और वहाँ से स्वदेश सम्पन्न होकर लौटना - एक कुप्रथा बन गयी है। बर्मी स्त्री-बच्चों को तो साथ लाना नहीं पड़ता, स्वदेश में कौन जानता है कि किसने कहाँ क्या किया था। लेकिन रामनाथ है कि उल्टे सीधा होना जानता ही नहीं। विजयपाल ने सब साँठ-गाँठ बैठा ली है; किंतु रामू तो गाँव की उस बकरी चरानेवाली को प्राण दिये बैठा है। भला, वह कहाँ भागी जाती है! रुपये लेकर जायगा तो उसके पिता नाक रगड़गें इसके पैरों पर, लेकिन इस गवांर को कौन समझाये? यह तो कहता है - 'कोई जाने या न जाने, धर्म तो जानता है। मैं किसी को धोखा दुंगा तो भगवान् मुझे कैसे क्षमा करेंगे? मुझसे यह सब नहीं होगा। अपने पसीने की कमाई ही मुझे लेनी है। पाप और बेईमानी का पैसा मुझे नहीं चाहिये।'

चोरों के समूह में रहकर कोई चोरी न करे तो क्या चैन पायेगा? जब समाज में ही पाप घर कर जाता है, तब सत्पुरुषों को संकट उठाने - तप करने के लिए तत्पर रहना ही चाहिये। रामनाथ जहाँ काम करता है, विजयपाल तथा उसके साथी वहीं से उसका टिकट कटा देने के प्रयत्न में लगे रहते हैं। वह तो अपने परिश्रम और धैर्य से टिका है। उसके संयम एंव कृपणता ने उसके संगी-साथी रहने ही नहीं दिये हैं।

कोई भाग्य को क्या करे? कठोर परिश्रम, रूखा तथा अपर्याप्त भोजन, नन्ही गंदी कोठरी में मुर्गी-सा बन्द रहना, समुद्री नगर का अनभ्यस्त जलवायु - रामनाथ दुर्बल होता गया। बार-बार ज्वर आने लगा उसे गरीबों की शुश्रूषा और चिकित्सा जैसी हो पाती है, संसार जानता है। रामनाथ विदेश में अकेला और उस पर भी अत्यन्त कृपण। जितना वह जोड़ पाता उसका एक बड़ा भाग ज्वर आने पर बहुत काट-कपट करने पर भी व्यय हो जाता। अन्त में वह गिर पड़ा चारपाई पर और पूरे छ: महीने चलने-फिरने योग्य होने में लगे।

'तुम यदि जीना चाहते हो तो अपने घर चले जाओ!' सभी एक ही सलाह देते हैं।

'बड़े भाई, भाभी, मोहन' रामनाथ को जीना तो है। उसके चित्त में स्मृतियों का प्रवाह चल रहा है। अन्त में परिचितों ने एक दिन कलकत्ते जाने वाले जहाज में बैठा दिया उसे।

'तुम्हारे रंगून आने के छ: महीने पीछे चौधरी ने अपनी लड़की की सगाई अन्तू से कर दी! तुम्हारे भाई से खेत के पानी को लेकर लड़ाई हो गयी थी उनकी।' कलकत्ते में गाँव के कई लोग रहते हैं। रामनाथ उनके पास आया तो उसे यह समाचार मिला - 'पिछले वर्ष उसका विवाह भी कर दिया चौधरी ने।'

विपत्ति अकेली नहीं आया करती। इस समाचार का प्रभाव कहिये, समुद्री-यात्रा का कारण कहिये या भोजनादि की मार्ग की गड़बड़ी बताइये, रामू कलकत्ते में ही बीमार हो गया। उसे सरकारी अस्पताल में भरती कराना पड़ा। जब वह एक महीने बाद अस्पताल से निकला, उसकी रही-सही पूंजी भी समाप्त हो गयी थी। उसके कपड़े फट गये थे; किंतु अब उसके पास पैसे कहाँ थे नये कपड़े बनवाने को।

'रामू अस्पताल में बीमार है' रामू के भाई को घर पर यह समाचार मिल गया था। खेत सींचने हैं, बोने हैं, घर की मरम्मत न हो तो वर्षा में टिकेगा ही नहीं वह और कलकत्ता गाँव की सीमा के उस पार तो है नहीं। एक गरीब कृषक को इतनी बड़ी यात्रा करना परलोक की यात्रा प्रतीत होती है, यह बात नित्य रेलों में ही घूमने वाले या हवाई जहाज से फुर्र होने वाले कैसे समझ सकते हैं।

जैसे बीमारी बिना बुलाये आयी थी, विदा करने की प्रतीक्षा किये बिना चली भी गयी। गरीबों का चिकित्सक भाग्य ही होता है, रामू को तो अस्पताल भी मिल गया था। लेकिन वह स्वस्थ होकर प्रसन्न हुआ, यह कहना उसके साथ अन्याय करना होगा।
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'बाबा! अब आप ही मुझे शरण दो।' गाँव से कोसभर दूर वन में एक झरने के पास भगवान का मन्दिर है; एक वैष्णव संत वहां रहते हैं। पास के गाँव से कच्चा अन्न माँग लाते हैं। यह एकान्त बहुत अनुकूल जान पड़ता है भजन के लिये। रामनाथ सायंकाल ग्राम से चलकर मन्दिर पर आया और गिर पड़ा संत के चरणों में। फुट-फुटकर रो रहा था वह। 'मैं यहाँ की सब सेवा करूंगा। आप जो आज्ञा करेंगे, प्राण देकर भी उसे पूरा करूंगा। मुझे अब घर नहीं रहना है।'

आज ही रामनाथ दो वर्ष बाद घर लौटा है और आज ही घर से यह विरक्ति? लेकिन कौन है घर पर जो उसके आने से प्रसन्न हुआ हो? किसे उससे स्नेह है? एक कल्पना - एक भावुकता थी मन में और घर से निकल पड़ा था वह। वह चौधरी की लड़की, उसकी... नहीं, नहीं, अन्तु की स्त्री कुएं से जल लेकर लौट रही थी। रामनाथ को देखकर भी उसने देखना नहीं चाहा। उसके पैरों की गति बढ़ गयी।

'तुम भी मुझे पहचानती नहीं हो?' रामनाथ पास चला गया।

'दुसरे की स्त्री से रास्ते में इस प्रकार बोलते तुम्हें लज्जा नहीं आती?' डाँट दिया उसने - 'तुम गाँव के नाते उनके भाई लगते हो, सो जानती हूँ। दरवाजे पर आओगे तो हुक्का चढ़ाकर दे दुंगी।' रामनाथ के पैर वहीं भूमि में गड़ से गये। वह नहीं देख सका कि किसी ने उसे मुड़कर देखा भी या नहीं देखा। वहाँ से वह सीधे ही मन्दिर के लिए चल पड़ा। अब उसे पूरा संसार सूना जान पड़ता है।

'संसार जिन्हें धक्का देकर निकाल देता है, वे भगवान् की शरण में आते हैं।' संत जैसे अपने-आप से कह रहे थे - 'लेकिन कम ही होते हैं जो फिर संसार के पुकारने पर उधर न दौड़ जायें। बहुधा वे स्वयं दूसरे मार्ग से उसी संसार को बार-बार पकड़ने का प्रयत्न करते हैं। वैराग्य तो उनकी वस्तु है जो संसार को झटककर आते हैं।'

'बाबा! आप मुझे मन्त्र दे दो।' रामनाथ रोते हुए आग्रह कर रहा था - 'मैं अब आपके चरण छोड़नेवाला नहीं हुँ।'

'तुम साधु बनकर क्या करोगे?' संत ने पूछा।

'भगवान का भजन करूंगा और आपकी सेवा करूंगा।' रामनाथ ने बिना किसी संकोच के कहा।

'भगवान का भजन तो ऐसे होता नहीं।' संत समीप ही आसन पर बैठ गये। 'सेवा अवश्य तुम कर सकते हो। इस प्रकार किसी को साधु बनाने का अर्थ बिना मजदूरी दिये एक मजदुर पाने का प्रयत्न करना है।'

'बाबा! भेड़ तो जहां जायेगी, वहीं मुँड़ेगी।' रामनाथ को संत की बात बुरा नहीं लगा। 'मैं घर पर भी मजदूर ही था, आपकी सेवा करूंगा तो पुण्य तो होगा। घर की मजदूरी तो गधे को अन्न खिलाना भी नहीं रही।'

'लेकिन साधु किसी को केवल अपनी सेवा के लिये साधु बनावे, यह बहुत बड़ा पाप है।' संत ने कहा - 'साधु का वेश भजन का वेश है।'

'मैं भजन करने को 'ना' कहाँ कहता हूँ।' रामनाथ ने आग्रह किया।

'अच्छा तुम यहीं बैठो और रात में सोने का समय होने तक 'राम-राम' कहते रहो। रोटियाँ मैं तुम्हें दे दुंगा।' संत ने समझाने का उपाय सोच लिया।

'राम, राम, राम, राम', रामनाथ कब तक 'राम-राम' करता रहे। दो मिनट, चार मिनट, दस मिनट। वह ऊब गया। इधर-उधर देखने लगा। अंत में आधे घंटे में ही उठ खड़ा हुआ। 'आप मुझे कोई सेवा बताओ! इस प्रकार मुझसे बैठे नहीं रहा जायगा।'

'यही मैं कहता था कि भजन इस प्रकार नहीं होता।' संत ने समझाया - ‘भजन करना बहुत उत्तम है; किंतु उसे कायदे से सीखना पड़ता है। जो घर पर भजन नहीं करता, घर छोड़ने पर उससे भजन नहीं हो सकता। तुम मेरी बात मानोगें?'

'अवश्य मानूंगा।' रामनाथ ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाया।

'देखो, प्रदेश में तुम बराबर भाई, भाभी, भतीजे आदि का स्मरण करते थे। उस समय तुम मोहवश उनका स्मरण करते थे।' संत धीरे-धीरे समझा रहे थे। 'अब भी तुम उन्हीं का स्मरण कर रहे हो। अब तुम यह सोच रहे हो कि वे सब कितने निष्ठुर हैं। यदि तुम घर इस समय छोड़ दोगे तो यह स्मरण बना ही रहेगा। यह भी स्नेह का ही फल है और यह तुम्हें जलाता ही रहेगा।'

'पहले भी मैं जलता ही रहा हूँ।' रामनाथ को बड़ा आश्चर्य हुआ। उसे लगा कि साधु ने उसके चित्त की बात जान ली है। उसकी श्रद्धा बढ गयी।

'अरे भाई! दिये में जब तक तेल है, तब तक वह जलेगा ही।' साधु कह रहे थे - 'जब तक चित्त में संसार का स्नेह है, तब तक वह जलता रहेगा। इस स्नेह को निकाल देने का उपाय यह है कि तुम घर लौट जाओ। अब तुमको घर के लोगों के प्रेम का रहस्य ज्ञात हो गया है। अब वे फिर जब तुम्हारा आदर-सत्कार करने लगें, तब भूलना मत कि अपने स्वार्थवश ही वे ऐसा कर रहे हैं। तुम घर पर काम करो। बचपन से अब तक उन लोगों ने तुम्हारा पालन-पोषण किया है, उनकी सेवा करना तुम्हारा कर्तव्य है। उनके पास रहकर उनकी सेवा कर्तव्य समझ कर करते रहो और भगवान के नाम का जप करने का अभ्यास करो। ऐसा करने से भजन होने लगेगा और मन में जो मोहरूपी स्नेह है, वह दूर हो जायगा।'

'आप मुझे घर न भेजें।' रामनाथ कातर हो रहा था। तुम अपने को आज से साधु ही मानो।' संत ने घर के लोगों की सेवा मेरी बात मानकर करो। घर पर ऐसे रहो, जैसे वह तुम्हारा घर नहीं है। तुम वहां अतिथि बन कर रहते हो। घर तो उन लोगों का है। वे जैसा करें, जो चाहें - उनमें तुम उनका अनुमोदन और सहायता करो।'

रामनाथ घर लौट आया। वह गृहस्थ साधु - उसकी शान्ति, उसका आनंद तब तक कैसे जाना जा सकता है, जब तक स्नेह की ज्वाला से मुक्त होकर अपने घर में ही कोई अपने को स्थायी अतिथि नहीं बना लेता।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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