ADARSH SAHU

ADARSH SAHU

" मैं राम लिखता हूं मैं रहीम लिखता हूं वतन के वास्ते हूं मैं वतन की पीर लिखता हूं" दूरभाष नंबर6392888651

  • Popular Stories
  • Latest Stories

"वक्त बीत जाए तो लोग भुला देते हैं बेवजह लोग गलती कि सजा देते हैं जो दिया जलकर रोशनी देता है रात भर सुबह होने पर लोग उसको भी बुझा देते है"

वक्त बीत जाए तो लोग भुला देते हैं
 बेवजह लोग गलती कि सजा देते हैं

जो दिया जलकर रोशनी देता है रात भर
सुबह होने पर लोग उसको भी बुझा देते है

 

46 Love
2 Share

"जीवन संघर्षों की अनमोल निशानी है कांटो पर चलने की अनबोल कहानी है जीता है वही इसको जो हर विश को पीता है चाहे हो कोई मुश्किल बन जाता दवाई है जीवन संघर्षों की अनमोल निशानी है चाहे पीड़ा कितनी हो जीना तो पड़ता है हर ज़हर जमाने का पीना तो पड़ता है वक्त के हर तकाजे की बस इतनी कहानी है जीवन संघर्षों की अनमोल निशानी है"

जीवन संघर्षों की अनमोल निशानी है
कांटो पर चलने की   अनबोल कहानी है

जीता है वही इसको जो  हर विश को पीता है
चाहे हो कोई मुश्किल बन जाता दवाई है
जीवन संघर्षों की अनमोल निशानी है

चाहे पीड़ा कितनी हो जीना तो पड़ता है
हर ज़हर जमाने का पीना तो पड़ता है
वक्त के हर तकाजे की बस इतनी कहानी है
जीवन संघर्षों की अनमोल निशानी है

 

45 Love

"मैं टूटते हुए सपनों से एक ज़िद कर बैठा अपनों से वफा कि मैं उम्मीद कर बैठा जिंदगी का हर सफर जिसमें था अकेला उसमें में किसी के साथ की उम्मीद कर बैठा यहां जिनके हाथ थे सने मेरे खून ही से उनसे खुद को बचाने की उम्मीद कर बैठा अपनों से वफा की उम्मीद कर बैठा"

मैं टूटते हुए सपनों से  एक ज़िद कर बैठा
अपनों से वफा कि मैं उम्मीद कर बैठा

जिंदगी का हर सफर  जिसमें था अकेला
उसमें में किसी के साथ की उम्मीद कर बैठा

 यहां जिनके हाथ थे सने मेरे खून ही से
 उनसे खुद को बचाने की उम्मीद कर बैठा
अपनों से वफा की उम्मीद कर बैठा

 

44 Love
1 Share

"जन्मदिवस है आज आपका ,करें बधाई को स्वीकार। हमें मिठाई अभी चाहिये , ये तो अपना है अधिकार॥ जुग-जुग जीयें हमारे भईया, ईश्वर से करते मनुहार। सदा लुटाते रहें सभी पर,अपना निश्छल लाड़-दुलार॥ पूछा उनसे तो बतलाया ,उमर हुई अब पैंतिस साल॥ किंतु अभी भी बाल हृदय से, देखो इनके रक्तिम गाल॥ घर में सब की क्लास लगाते,कागज पर लिखते हैं गीत। जन – सेवा भी करते रहते , निभा रहे जनता से प्रीत॥ धीरज की तो बात न पूछो , अपना नाम करें साकार। पल भर में अपना कर लेते , ऐसा इनका सद् व्यवहार॥ यही कामना हम करते हैं , आप सदा रहिये खुशहाल। रहे सफलता कदम चूमती,तन मन धन से मालामाल॥"

जन्मदिवस है आज आपका ,करें बधाई को स्वीकार। 
हमें मिठाई अभी चाहिये , ये तो अपना है अधिकार॥
जुग-जुग जीयें हमारे भईया, ईश्वर से करते मनुहार। 
सदा लुटाते रहें सभी पर,अपना निश्छल लाड़-दुलार॥
पूछा उनसे तो बतलाया ,उमर हुई अब पैंतिस साल॥
किंतु अभी भी बाल हृदय से, देखो इनके रक्तिम गाल॥
 घर में सब की क्लास लगाते,कागज पर लिखते हैं गीत। 
जन – सेवा भी करते रहते , निभा रहे जनता से प्रीत॥
धीरज की तो बात न पूछो , अपना नाम करें साकार। 
पल भर में अपना कर लेते , ऐसा इनका सद् व्यवहार॥
यही कामना हम करते हैं , आप सदा रहिये खुशहाल। 
रहे सफलता कदम चूमती,तन मन धन से मालामाल॥

हैप्पी बर्थडे भैया🙏🎂🎂

38 Love
1 Share

""आदमी को स्वयं खल रहा है आदमी" आदमी को स्वयं खल रहा है आदमी। बिन जलाएं स्वयं जल रहा है आदमी॥ चाहु ओर घेरे निराशा पड़ी है। जीवन में आई ये कैसी घड़ी है? सभी को सभी सुख चुभ रहा है। कोई किसी का भी दिखता नहीं है।। हर तरफ दिल में है अब आगजनी़। आदमी को स्वयं खल रहा है आदमी॥ मन में कहीं शांति टिकती नहीं है। भाव संवेदना आज दिखती नहीं है॥ सिसकती गली है कंपाता डगर है। न जाने! किसकी लगी ये नज़र है॥ कहीं दिखती नहीं प्रेम की कोठारी। आदमी को स्वयं खल रहा है आदमी॥ अब समय है विकट गिरती यह लपट। कौन है इसको बुझाए है प्रश्न! यह सबसे विकट॥ सारी मानवता बिखरी जा रही जब। कोई दिखता नहीं जो संभाले इसे अब॥ प्रेम आनंद से भिगोये जो सारी जमीं। आदमी को स्वयं खल रहा है आदमी॥ आओ सब मिल विचारे नया कुछ सवारे। मिटाये जलन अब अपने मन को बुहारें॥ करें प्रेम सबसे और सभी को सवारे। अपना यह जीवन जनहित में वारे॥ तभी मुस्कुराएगा ये शमां और खिल-खिलाएगी जमी। आदमी को स्वयं खल है रहा आदमी॥ बीन जलाए स्वयं जल रहा है आदमी॥"

"आदमी को स्वयं खल रहा है आदमी"

आदमी को स्वयं खल रहा है आदमी।
बिन  जलाएं स्वयं जल रहा है आदमी॥

चाहु ओर घेरे निराशा पड़ी है।
जीवन में आई ये कैसी घड़ी है? 
सभी को सभी सुख चुभ रहा है।
 कोई किसी का भी दिखता नहीं है।।
हर तरफ दिल में है अब  आगजनी़।
आदमी को स्वयं खल रहा है आदमी॥

 मन में कहीं शांति टिकती नहीं है।
भाव संवेदना आज दिखती नहीं है॥
सिसकती गली है कंपाता डगर है।
न जाने!  किसकी लगी ये नज़र है॥
कहीं दिखती नहीं प्रेम की कोठारी।
आदमी को स्वयं खल रहा है आदमी॥

अब समय है विकट गिरती यह लपट।
कौन है इसको बुझाए है प्रश्न!  यह सबसे विकट॥
सारी मानवता बिखरी जा रही जब।
कोई दिखता नहीं जो संभाले इसे अब॥
प्रेम आनंद से  भिगोये जो सारी जमीं।
 आदमी को स्वयं खल रहा है आदमी॥

आओ सब मिल विचारे नया कुछ सवारे।
 मिटाये जलन अब अपने मन को बुहारें॥
करें प्रेम सबसे और सभी को सवारे।
अपना यह जीवन जनहित में वारे॥
तभी मुस्कुराएगा ये शमां और खिल-खिलाएगी जमी।
आदमी को स्वयं खल है रहा आदमी॥
 बीन जलाए स्वयं जल रहा है आदमी॥

आदमी को स्वयं खल रहा है आदमी

36 Love