Darshan Raj

Darshan Raj Lives in Aligarh, Uttar Pradesh, India

#नज़्म-ऐ-बज़्म से कातिल कलम के अल्फाज़✒️....✍️Insta id:-@darshsnsingh8727 📱wp.no..7500497318📞

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"हाथों की लकीरें यकीनन मिटने लगी..! लहू - ए - तहरीरें दफ़तन जलने लगी..!! ख्वाहिश के आईने पर धूल जमने लगी..! कागजों पर लहू की बूंदें भी सूखने लगी..!! जो चला हर दफा मेरे साथ साय की तरह..! इक दौर-ए-मोहब्बत की उम्र घटने लगी..!! बहुत गुमान था इन हाथों की लकीरों पर..! झोली फकीरों की है लकीरें कहने लगी..!! मेरी दहलीज पर रेखाएं सख्त खींची गई..! जबसे हिज़्र नफ़स बनकर साथ रहने लगी..!! दरख़्त से टूटकर महज़ पत्ता हाथ ना लगा..! बाज़ार-ए-जिस्म की आंधियाँ चलने लगी..!! खुद की तस्वीर का अक़्स नजर न आता..! चेहरा-ए-गमज़दा पर लकीरें उभरने लगी..!! ©Darshan Raj"

हाथों  की  लकीरें  यकीनन  मिटने लगी..!
लहू - ए - तहरीरें  दफ़तन  जलने  लगी..!!

ख्वाहिश के आईने पर  धूल जमने लगी..!
कागजों पर लहू की बूंदें भी सूखने लगी..!!

जो चला हर दफा मेरे साथ साय की तरह..!
इक  दौर-ए-मोहब्बत की उम्र घटने लगी..!!

बहुत गुमान था इन हाथों की लकीरों पर..!
झोली फकीरों की है लकीरें कहने  लगी..!!

मेरी दहलीज पर रेखाएं  सख्त खींची गई..!
जबसे हिज़्र नफ़स बनकर साथ रहने लगी..!!

दरख़्त से टूटकर महज़ पत्ता हाथ ना लगा..!
बाज़ार-ए-जिस्म की आंधियाँ चलने लगी..!!

खुद की तस्वीर  का अक़्स  नजर न आता..!
चेहरा-ए-गमज़दा पर लकीरें उभरने लगी..!!

©Darshan Raj

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"माँ तेरा ही प्रेम पवित्र है, और गंगा का पानी..! बाकी तो सब नश्वर है, बस तेरी अमर कहानी..! हर युग - युग नें पहचानी, माँ तेरी प्रेम निशानी..! थोड़ी चंचल थोड़ी सयानी, थोड़ी सी माँ नादानी..! हर घर - घर में नई कहानी, हर घर में खींचातानी..! चलो आओ तुम्हें सुनाता हूं, माँ की अमर कहानी..! द्वापर युग की बात है, श्री कृष्ण की गाथा पुरानी..! जन्म दियो माँ देवकी, पूत बुलावत यशोदा रानी..! ह्रदय पत्थर धर लियो, जननी कुन्ती महारानी..! लोक - लाज़ में त्याग दियो, सूर्य पुत्र वरदानी..! युग - युग में ऐसा वीर नहीं, कर्ण जैसा महादानी..! जन - जन ने नाम रख दियो, राधे पुत्र कर्ण ज्ञानी..! माँ की महिमा अपार है, हर जन को बात बतानी..! सेवा भाव समर्पण रखो, ना बनो वीर अभिमानी..! ब्रह्मा विष्णु महेश भी पूजे, पूजे पंचतत्व हर ज्ञानी..! माँ की ममता का मोल नहीं, जग को बात समझनी..! ©Darshan Raj"

माँ  तेरा  ही प्रेम  पवित्र है, और  गंगा  का  पानी..!
बाकी  तो सब  नश्वर है, बस  तेरी अमर  कहानी..!

हर युग - युग  नें पहचानी, माँ  तेरी प्रेम  निशानी..!
थोड़ी चंचल थोड़ी  सयानी, थोड़ी सी माँ नादानी..!

हर घर - घर में  नई कहानी, हर घर में खींचातानी..!
चलो आओ तुम्हें सुनाता हूं, माँ की  अमर कहानी..!

द्वापर युग की बात है, श्री कृष्ण की  गाथा पुरानी..!
जन्म दियो  माँ देवकी, पूत बुलावत  यशोदा रानी..!

ह्रदय  पत्थर  धर  लियो, जननी  कुन्ती महारानी..!
लोक - लाज़  में  त्याग  दियो, सूर्य  पुत्र  वरदानी..!

युग - युग में ऐसा वीर नहीं, कर्ण  जैसा महादानी..!
जन - जन ने नाम रख दियो, राधे पुत्र कर्ण ज्ञानी..!

माँ की  महिमा  अपार है, हर जन को बात बतानी..!
सेवा भाव  समर्पण रखो, ना बनो  वीर अभिमानी..!

ब्रह्मा विष्णु महेश भी पूजे, पूजे  पंचतत्व हर ज्ञानी..!
माँ की ममता का मोल नहीं, जग को बात समझनी..!

©Darshan Raj

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"नज़रो से तो तुम अनकही बातें हजार कहते हो..! चौधवी के चांद की तरह नशेमन में क्यूं रहते हो..!! तुम से गुफ्तगू की दिल-ए-ख्वाहिश बहुत है मिरी..! मेरी सांसो में हर वक़्त इत्र की तरह क्यूं बहते हो..!! न जाने कितने राज तुमने दफ़्न किए हैं लबों पर..! रुसवाई के डर से दर्द हज़ार फिर क्यूं सहते हो..!! तुम ही बताओ जिंदगी किस तरह बसर करें हम..! कि तुम्हारे बिना क्या है मेरा वजूद क्यूं कहते हो..!! तुमसे बिछड़ जाने का मुकम्मल सबब याद नहीं..! कस्मे वादे भुलाकर फिर तन्हाई से क्यूं डरते हो..!! सरहदें ऊंची-ऊंची बहुत है अब तेरे मेरे दरमियां..! अब हमसे न कहो कि सात पर्दों में क्यूं रहते हो..!! ©Darshan Raj"

नज़रो से तो तुम अनकही  बातें  हजार कहते हो..!
चौधवी के चांद की तरह नशेमन में क्यूं रहते हो..!!

तुम से गुफ्तगू की दिल-ए-ख्वाहिश बहुत है मिरी..!
मेरी सांसो में हर वक़्त इत्र की तरह क्यूं बहते हो..!!

न जाने कितने राज तुमने दफ़्न किए हैं लबों पर..!
रुसवाई के  डर से दर्द  हज़ार फिर क्यूं सहते हो..!!

तुम ही बताओ जिंदगी  किस तरह बसर करें हम..!
कि तुम्हारे बिना क्या है मेरा वजूद क्यूं कहते हो..!!

तुमसे बिछड़ जाने का मुकम्मल सबब याद नहीं..!
कस्मे वादे भुलाकर फिर तन्हाई से क्यूं डरते हो..!!

सरहदें ऊंची-ऊंची  बहुत है अब तेरे मेरे दरमियां..!
अब हमसे न कहो कि सात पर्दों में क्यूं रहते हो..!!

©Darshan Raj

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#JumuatulWidaa
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"#RIPRohitSardana इसी तरह मजदूरों का जीवन भुखमारी में गुजर जाएगा..! सोचा नहीं था दर्द हमारा कि अखबारी में गुजर जाएगा..!! चौराहे पर खड़ा - खड़ा तू बूत बने हुए बिक जाएगा..! किस-किस को दोषी मानेगा तू ग्लानि में गुजर जाएगा..!! चार पैसे और दो वक़्त की रोटी जीने के लिए उम्र छोटी..! बचा - कुचा किस्तों का घऱ नीलामी मे गुज़र जाएगा..!! ना कोई देखेगा बेचारी ना कोई समझेगा तेरी लाचारी..! और तेरा- मेरा जीवन यूं हीं अपमानी में गुजर जाएगा..!! हाथों में पड़ते छाले दो पेट लिए ना मिल सके निवाले..! साहेब तेरा बलिदान यूं ही गुमनामी में गुजर जाएगा..!! जो उठाएगा शमशीर तो खोखले वादों में दब जाएगा..! ये तेरा-मेरा करते-करते खींचातानी में गुजर जाएगा..!! यहां भूखे नंगो की बस्ती में पाँव हैं मोज़ों की कस्ती में..! निश्छल भाव रखते-रखते तीमारदारी में गुजर जाएगा..!! थक हार कर जब आएगा तू अपनों को बेबस पाएगा..! कलम की तरह चीखते हुए चारदीवारी में गुजर जाएगा..! ©Darshan Raj"

#RIPRohitSardana इसी तरह मजदूरों का जीवन भुखमारी में गुजर जाएगा..!
सोचा नहीं था दर्द हमारा कि अखबारी में गुजर जाएगा..!!

चौराहे  पर  खड़ा - खड़ा  तू बूत  बने हुए  बिक जाएगा..!
किस-किस को दोषी मानेगा तू ग्लानि में गुजर जाएगा..!!

चार पैसे और दो वक़्त की रोटी जीने के लिए उम्र छोटी..!
बचा - कुचा किस्तों का घऱ  नीलामी मे गुज़र जाएगा..!!

ना कोई देखेगा बेचारी ना कोई  समझेगा तेरी लाचारी..!
और तेरा- मेरा जीवन यूं हीं अपमानी में गुजर जाएगा..!!

हाथों में पड़ते  छाले दो पेट लिए ना मिल सके निवाले..!
साहेब  तेरा बलिदान यूं  ही गुमनामी में गुजर जाएगा..!!

जो उठाएगा शमशीर तो खोखले वादों में दब जाएगा..!
ये तेरा-मेरा  करते-करते  खींचातानी में गुजर जाएगा..!!

यहां भूखे नंगो की बस्ती में पाँव हैं मोज़ों की कस्ती में..!
निश्छल भाव रखते-रखते तीमारदारी में गुजर जाएगा..!!

थक हार  कर जब आएगा तू अपनों को  बेबस पाएगा..!
कलम की तरह चीखते हुए चारदीवारी में गुजर जाएगा..!

©Darshan Raj

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#Labour_Day
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"#RIPRohitSardana कमाल है कोई शिकवा नहीं शिकायत नहीं..! हुजूर तुम्हारे लहज़े में अब वो रुबायत नहीं..!! तिरा आना मिरे ख़्वाबों में कुछ ऐसा रहा..! तुम्हारी बातों में अब वो हिकायत नहीं..!! अरे वाह! हाल-बेहाल करके हाल पूछते हो..! हमने भी हसकर कह दिया खैरियत नहीं..!! ऐ सितमगर तिरे सितम भी हमें अज़ीज़ हैं..! नज़रें उठाकर देखें तुझे इतनी हैसियत नहीं..!! मेरी हक़ीक़त से सनम तू क्या वाकिफ़ नहीं..! मुसीबत के दौर में भी हम पर इनायत नहीं..!! अब पर्दा-दारी ही तिरे रुख पर अच्छी लगे..! तुझे उस नज़र से देखे "राaj" की नियत नहीं..!! ©Darshan Raj"

#RIPRohitSardana कमाल है कोई शिकवा नहीं शिकायत नहीं..!
हुजूर तुम्हारे लहज़े में अब वो रुबायत नहीं..!!

तिरा  आना मिरे  ख़्वाबों में  कुछ ऐसा रहा..!
तुम्हारी  बातों  में  अब वो  हिकायत  नहीं..!!

अरे वाह! हाल-बेहाल करके हाल पूछते हो..!
हमने भी  हसकर  कह दिया खैरियत नहीं..!!

ऐ सितमगर तिरे  सितम भी  हमें अज़ीज़ हैं..!
नज़रें उठाकर देखें तुझे इतनी हैसियत नहीं..!!

मेरी  हक़ीक़त से सनम तू क्या वाकिफ़ नहीं..!
मुसीबत के दौर  में भी हम पर इनायत नहीं..!!

अब  पर्दा-दारी ही  तिरे  रुख पर अच्छी लगे..!
तुझे उस नज़र से देखे "राaj" की नियत नहीं..!!

©Darshan Raj

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हिकायत =किस्से, कहानियाँ
रुबायत =सदियों से चली आ रही रीति रिवाज़
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