Khan Fahad Rizwan

Khan Fahad Rizwan Lives in New Delhi, Delhi, India

Demented

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वादा-ए-इश्क़ दाइमी है तो फिर
कैसे कह दूं तुझे हयात अपनी?

दाइमी - immortal, अमर
हयात - life, ज़िन्दगी

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तिश्नगी है कि बढ़ती जा रही है
तीरगी अलग ज़ुल्म ढा रही है

मेरे सुतून-ए-हवास को तेरी याद
किसी दीमक की तरह खा रही है

तेरी यादें और उस पर तन्हाई
बारी बारी से खूँ जला रही है

मुझको मुँह भी नही लगाते लोग
और तू है कि दिल लगा रही है

अब भी गर इनमे है तस्वीर मिरी
फिर क्यों नज़रें नही मिला रही है

मैं कहीं पढ़ न लूँ उसे यूँ भी
वो इतने क़हक़हे लगा रही है

अलविदा कह के आ गया हूँ मगर
ज़बान अब भी लड़खड़ा रही है

मिल गयी इश्क़ को निजात 'फ़हद'
वो मेरे सारे ख़त जला रही है

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दिन में मुस्कान और रातों में ज़हर रखते हैं
अमाँ ! ये साँप हैं, दाँतों  में  ज़हर रखते  हैं
बड़े शीरीं सुख़न होते हैं सियाह क़ल्ब अक्सर
जो साफ दिल हैं वो  बातों में ज़हर रखते हैं  #gif

#thesecondthought

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मेरे हमनशीं बता दे
यूं ज़ुबाँ से कुछ ना कहना यूं तेरा नज़र झुकाना
मेरे हमनशीं बता दे क्या ये रस्म-ए-आशिक़ी है
कभी तुझको पा के खोना कभी खो के तुझको पाना
मेरे हमनशीं बता दे क्या ये रस्म-ए-आशिक़ी है

तेरे शोख़ सुर्ख़ आरिज़, मेरे इन लबों की ज़द में
यूँ हया से कांप जाना फिर सिमट के अपनी हद में
तेरा बात कहते कहते वो ज़रा सहम सा जाना
मेरे हमनशीं बता दे क्या ये रस्म-ए-आशिक़ी है

तेरा डर, कि मैं ना जाऊँ, कभी दूर तुझ से हो कर
कोई दर्द ही ना पालूं किसी रोज़ तुझको खो कर
बाहों में मुझको भर कर 'तुम मेरे हो' ये बताना
मेरे हमनशीं बता दे क्या ये रस्म-ए-आशिक़ी है

वो वस्ल की उम्मीदें वो उम्र भर के वादे
वो आने वाले कल की दिन रात करना बातें
वो ख़्वाब की हदों तक जा जा के लौट आना
मेरे हमनशीं बता दे क्या ये रस्म-ए-आशिक़ी है

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सुबह की धूप के जैसी सुनहरी शाम सी लड़की
बड़ी ही ख़ास लगती है सुनो वो आम सी लड़की

वो हँसती है तो उसके संग मौसम खिलखिलाते हैं
जो ज़ुल्फें उसकी खुल जाएं तो घिर के अब्र आते हैं
है ज़हन-ओ-दिल पे तारी वो ख़ुमार-ए-जाम सी लड़की
बड़ी ही ख़ास लगती है सुनो वो आम सी लड़की

वो तन्हाई में ख़ुद से ख़ुद ही ऐसे बात करती है
जैसे सरगोशियाँ तितली गुलों के साथ करती है
कली सी शोख़ चंचल सी वफ़ा के नाम सी लड़की
बड़ी ही ख़ास लगती है सुनो वो आम सी लड़की

उसी पर रश्क करते हैं क़मर भी और सितारे भी
कि उसके हुस्न के आगे हैं फीके सब नज़ारे भी
परी सी या फ़रिश्ते सी वो एक गुमनाम सी लड़की
बड़ी ही ख़ास लगती है सुनो वो आम सी लड़की

सुबह की धूप के जैसी सुनहरी शाम सी लड़की...

वो आम सी लड़की

#thesecondthought

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