डॉ.अजय मिश्र

डॉ.अजय मिश्र Lives in Gorakhpur, Uttar Pradesh, India

असिस्टेंट-प्रोफेसर । उत्तर-प्रदेश (डेस्क प्रभारी) क्रेडिट न्यूज़-मासिक न्यूज़ पत्रिका। सँयुक्त-मंत्री(सिद्धार्थ विश्वविद्यालय शिक्षक संघ) वास्तु-सलाहकार(वास्तु-सदन) नई दिल्ली। मंडल-प्रभारी(गोरखपुर-बस्ती मंडल) केसरिया हिंदुस्थान निर्माण संघ।

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"आना हो तो कुछ पल के लिए मेरे महफ़िल में आ जाना। हमारे महफ़िल में लोगों की आदत है प्यार लुटाना। हम तो टूट चुके हैं,फूलों में रहने वाले काँटो के चुभन से। लेकिन अभी भूले नही हैं, हम गैरों के पैरों तले फूल बिछाना। आना हो तो कुछ पल के लिए आ जाना;मेरे गरीबखाने में यहाँ भी है;सुकून का खजाना।"

आना हो तो कुछ पल के लिए मेरे महफ़िल में आ जाना।
 हमारे महफ़िल में लोगों की आदत है प्यार लुटाना।
हम तो टूट चुके हैं,फूलों में रहने वाले काँटो के चुभन से।
लेकिन अभी भूले नही हैं, हम गैरों के पैरों  तले फूल बिछाना।
आना हो तो कुछ पल के लिए आ जाना;मेरे गरीबखाने में यहाँ भी है;सुकून का खजाना।

आना हो तो आ जाना!

135 Love

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"चलो एक आशियाना उनके लिए भी बनाएं,जो धूप,वर्षा,शीत खुले आसमां में बिताएँ! चलो दो शब्द उनके लिए भी गुनगुनाएं; जो मूक बधिर बनकर ध्वनियों से घबराएँ! चलो दो पाठ उन्हें भी पढ़ाएं;जो बिन ज्ञान जंगल में जीवन बिताएँ। चलो एक ऐसा समुदाय बनाएँ;जो बिन राग द्वेष के हमारा देश चलाएं! चलो एक ऐसा देश बनाएँ;जहाँ राम-राज्य पुनः हो जाए!"

चलो एक आशियाना उनके लिए भी बनाएं,जो धूप,वर्षा,शीत खुले आसमां में बिताएँ!
चलो दो शब्द उनके लिए भी गुनगुनाएं; जो मूक बधिर बनकर ध्वनियों से घबराएँ!
चलो दो पाठ उन्हें भी पढ़ाएं;जो बिन ज्ञान जंगल में जीवन बिताएँ।
चलो एक ऐसा समुदाय बनाएँ;जो बिन राग द्वेष के हमारा देश चलाएं!
चलो एक ऐसा देश बनाएँ;जहाँ राम-राज्य पुनः हो जाए!

राम राज्य पुनः हो जाए!

132 Love

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"दया भाव से धरा वृक्ष का सिंचन खुद से करती है। जीवों के जीवन में प्राणवायु नित भरती है। आज वृक्ष के कटने से भूधर भी गुस्साएं हैं;हिम-शिला के खण्डों को अब तो वों पिघलाएं हैं। अम्बर दुःख से;अनियंत्रित वर्षा ऋतु ले आये हैं। सागर की लहरों को देखो वो तूफ़ान मचाएँ हैं। लौट रहें सब गाँवो में शहरों ने धुन्ध बिछाएं हैं। देखों सब वृक्षों को काट-काट कितना उत्पात मचाएँ हैं।"

दया भाव से धरा वृक्ष का सिंचन खुद से करती है।
जीवों के जीवन में प्राणवायु नित भरती है।
आज वृक्ष के कटने से भूधर भी गुस्साएं हैं;हिम-शिला के खण्डों को अब तो वों पिघलाएं हैं।
अम्बर दुःख से;अनियंत्रित वर्षा ऋतु ले आये हैं।
सागर की लहरों को देखो वो तूफ़ान मचाएँ हैं।
लौट रहें सब गाँवो में शहरों ने धुन्ध बिछाएं हैं।
देखों सब वृक्षों को काट-काट कितना उत्पात मचाएँ हैं।

वृक्ष क्यों लगाएँ??

122 Love

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"शाम से खड़ा हूँ तुम्हारें खिड़कियों पर पूनम का चाँद बन कर। छोड़ दो अलसाई निद्रा,अब न लेटो,भ्रमरों की दुल्हन बनकर। आज नही आयेंगे भ्रमर तुम्हें;रसपान करने तुम्हारें प्रेमी बनकर। आज आसमां में छाए हैं मेघ,सूरज की किरणों को रोक कर। चलो अब तो तोड़ो निद्रा कर लो हमसे भी थोड़ा सा प्यार अजनवी बनकर। मैं साम से खड़ा हूँ,तुम्हारें खिड़कियों पर,तुम्हारा चाँद बनकर।"

शाम से खड़ा हूँ तुम्हारें खिड़कियों पर पूनम का चाँद बन कर।
 छोड़ दो अलसाई निद्रा,अब न लेटो,भ्रमरों की दुल्हन बनकर।
आज नही आयेंगे भ्रमर तुम्हें;रसपान करने तुम्हारें प्रेमी बनकर।
आज आसमां में छाए हैं मेघ,सूरज की किरणों को रोक कर। 
चलो अब तो तोड़ो निद्रा कर लो हमसे भी थोड़ा सा प्यार अजनवी बनकर।
मैं साम से खड़ा हूँ,तुम्हारें खिड़कियों पर,तुम्हारा चाँद बनकर।

साम से खड़ा हूँ तुम्हारें खिड़कियों पर!!

113 Love

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"संसार एक मेला है, उसमें बहुत झमेला है। शुभ-रात्रि की बेला है। चलो नींद में चलतें हैं। स्वप्न सुधा से मिलते हैं। दिल के ख़ाली अरमानों को, स्वप्न में पूरा करते है। चलो अकेले चलते हैं।"

संसार एक मेला है,
         उसमें बहुत झमेला है।
                     शुभ-रात्रि की बेला है।
                              चलो नींद में चलतें हैं।
                                    स्वप्न सुधा से मिलते हैं।

दिल के ख़ाली अरमानों को,
               स्वप्न में पूरा करते है।
                                  चलो अकेले चलते हैं।

शुभ-रात्रि की बेला है।

111 Love