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I am not good with numbers but
every number dives into 90 degrees
when it comes to you. you're
Andromeda to my earth and I've
to travel

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"Gay😜 G-Gauko A-Auta Y-Youth😂"

Gay😜




  G-Gauko 
A-Auta  
     Y-Youth😂

Hero

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"Dear Life, Jiwnu ko lagi k grnu prne,,2020 ma chai auta list banai dewla,, 😝😝"

Dear Life, Jiwnu ko lagi k grnu prne,,2020 ma chai auta list banai dewla,,
😝😝

Life

3 Love

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"Dear Life, Jiwnu ko lagi k grnu prne,,2020 ma chai auta list banai dewla,, 😝😝"

Dear Life, Jiwnu ko lagi k grnu prne,,2020 ma chai auta list banai dewla,,
😝😝

Life

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"Today One years completed on Nojoto with 9.5K love 10.2K views 800 follwers 480 story"

Today One years completed 
on Nojoto with 
9.5K love 
10.2K views
800 follwers
480 story

#thanksnojoto

17 Love

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"timro jibn sagr ma m auta tuteko nau trino sokino tra gohirai ma xu ma 😌😌"

timro jibn sagr ma m auta tuteko nau 
 trino sokino tra gohirai ma xu ma 
😌😌

😌
#Star

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"Post #480 मेरा सारा टायम टेबल बदल देती है.. उसकी मीठी मीठी सी दो बातों.. #Teremerejazbaat Harpinder Singh"

Post #480

मेरा सारा टायम टेबल बदल देती है.. 

उसकी मीठी मीठी सी दो बातों..

#Teremerejazbaat



                                             Harpinder Singh

#dawn

10 Love

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"'' "I just want to hug you, but your are 480 some miles away, what I wouldn't do for a hug." '' #mr_bond"

'' "I just want to hug you, but your are 480 some miles away, what I wouldn't do for a hug." ''  






#mr_bond

#mohabbat #Mr_bond
I just want
@Mudassir Hussain @sona singh @Mohsin Ansari @@zain_single @Sana Shaikh

19 Love

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"you're 29th February inserted in calender after a gap of 4 years, and I've to wait for 1462 days and 33, 684, 480 breathes to integrate with you again ."

you're 29th February inserted in 
calender after a gap of 4 years, 
and I've to wait for 1462 days and 
33, 684, 480 breathes to integrate 
with you again .

I am not good with numbers but
every number dives into 90 degrees
when it comes to you. you're
Andromeda to my earth and I've
to travel

55 Love
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"Timro 👉akhama👀akha👁judai vannu🗣xa auta☝kura timi👉bina adha xu mo👨timro👉👸sath 💑paye hunxu pura👫💖"

Timro 👉akhama👀akha👁judai
vannu🗣xa auta☝kura
timi👉bina adha xu mo👨timro👉👸sath 💑paye hunxu pura👫💖

Nepali sairy

6 Love

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"me jaan puspa kuvar aaj me puri doniya ko kerahu ki vo meri patni he aur auske gar valo ko kerahu puspa kar ko me 20 din aus gar se auta kar lekar jahuga kis me takat rokar dika dena"

me jaan puspa kuvar aaj me puri doniya ko kerahu ki vo meri patni he aur auske gar valo ko kerahu puspa kar ko me 20 din aus gar se auta kar lekar jahuga kis me takat rokar dika dena

 

3 Love
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"AutA NeHeD Sa HoNe LaGe HamaD LikNa BatA SaRa LafaZ Ta QuRaMat SeeDi BatT DamaG itNa Chala MaTT ( JJ ) Tuja MardaGe TeRi NaDamAt ( JJ ) BaNaWaT Khakhee SajAwaT PuRe RaTT zaYa aB HaTo ko HilA MTT"

AutA NeHeD Sa HoNe LaGe HamaD 
LikNa BatA SaRa LafaZ Ta QuRaMat
SeeDi BatT DamaG itNa Chala MaTT
( JJ ) Tuja MardaGe TeRi NaDamAt
( JJ ) BaNaWaT Khakhee SajAwaT
PuRe RaTT zaYa aB HaTo ko HilA MTT

#MAYA007

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"I love you i love you i love you janu Timi bina mo bachnu kasari timi bina ko jiban sakne chuina suchna timi ni mero jiban ko sahara hou timi nai mero auta kinara hou I love my baby manju"

I love you i love you i love you janu Timi bina mo  bachnu  kasari timi bina  ko  jiban  sakne chuina  suchna  timi ni  mero  jiban  ko  sahara  hou timi nai  mero  auta  kinara  hou  I love my baby manju

hi guys

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"सैय्यदउल मुरसलीन कासिम ए रिज्कअल्लाह आकाओं मौला हुज़ूर रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो तबारक वा ताआला अलैहि वसल्लमﷺ और सैय्यदना हजरतें ईसा अलैहिस्सलाम बरोज यौमे क़यामत एक ही क़बर मुबारका से बाहर तशरीफ लाएंगे। {हवाला:मिशकात शरीफ जिल्द:02 सफाह: 480} {हवाला:अल तहकीक ए ग़ज़ाली मुस्ताफाई} ❖┈═══════════┈❖"

सैय्यदउल मुरसलीन कासिम ए रिज्कअल्लाह आकाओं मौला हुज़ूर रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो तबारक वा ताआला अलैहि वसल्लमﷺ और सैय्यदना हजरतें ईसा अलैहिस्सलाम बरोज यौमे क़यामत एक ही क़बर मुबारका से बाहर तशरीफ लाएंगे।

{हवाला:मिशकात शरीफ जिल्द:02 सफाह: 480}
{हवाला:अल तहकीक ए ग़ज़ाली मुस्ताफाई}
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10 Love

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"कहानी :-  16(14) हिन्दी ✍️ रोशन कुमार झा 🇮🇳 कहानी :- 1(01) हिन्दी ✍️ रोशन कुमार झा 🇮🇳 सुरेन्द्रनाथ इवनिंग कॉलेज , कोलकाता  02-05-2020 शनिवार 19:15 मो:-6290640716 রোশন কুমার ঝা, Roshan Kumar Jha यह हमारे द्वारा हम पर लिखी हुई प्रथम कहानी है ! नाटक भी 2 तारीख को ही लिखें रहें 02-10-2018 मंगलवार :- 8(01) -: ग़लत नहीं, ग़लत होने की कारण !:- बात है कुमारपाड़ापुर की झील रोड की , बंगाराम, तोताराम,अंतिमराम, तीनों भाई में से बंगाराम बड़े थे, तीनों संग- संग स्कूल आया-जाया करते थे, बंगाराम आठवीं , तोताराम सातवीं और अंतिमराम दूसरी कक्षा में पढ़ते थे, बंगाराम बड़े शांत स्वभाव के थे , जब बंगाराम आठवीं कक्षा पास कर लिए, तब बंगाराम के सामने एक संकट छा गया, बंगाराम जिस नेहरू जी के स्कूल में पढ़ते थे ,वह विद्यालय आठवीं तक ही था ,बंगाराम नौवीं कक्षा में नामांकन करवाने के काफी कोशिश किया ,पर सब व्यर्थ गया, कोई भी स्कूल के नवीं कक्षा में सीट ही नहीं थी , या और कारण रहा होगा, इसके नामांकन के लिए मात-पिता भी परेशान रहते थे , अंत में पिता किसी से कह सुनकर नामांकन नवीं में न करवाकर पुनः आठवीं में हावड़ा हिन्दी हाई स्कूल में करवां दिये, वह विद्यालय बारहवीं तक रहा, पर फिर से आठवीं में नामांकन करवाने के कारण बंगाराम गलत रास्ते पर चलने लगते हैं, वह दिन- रात सोचने लगता है , सोचता है पढ़ाई लिखाई करूं , या न करूं ,बंगाराम धार्मिक,विक्रम बजरंगी हनुमान व मां सरस्वती जी के पूजा पाठ बचपना से ही करते थे ,अंत में वे ईश्वर से प्रार्थना किये , हे ! भगवान तूने ये क्या किया, मेरे साथ पढ़े सहपाठी आगे हम फिर से आठवीं में पढ़ूं हमसे नहीं होगा , वह यह निर्णय लेकर ग़लत रास्ते पर चलने लगा , वह घर से निकलता विद्यालय के लिए पर विद्यालय जाता नहीं, वह ट्रेन से इधर-उधर घूमने लगा था, कैसे न घूमता , विद्यार्थियों का तो रेल का टिकट लगता ही नहीं था, इसके बारे में उसके माता-पिता को पता भी नहीं चलता था, क्योंकि वह स्कूल के समयानुसार ही आया-जाया करता था ,पर एक दिन उसका गांव का प्रकाश- रोशन भईया देख लिया, रेलवे स्टेशन पर ! , पर उससे कुछ न कहा, वह सीधे उसके पिता के पास फोन किया, बोला चाचा बंगाराम को आज घूमते हुए देखें है स्टेशन पर, फिर क्या रात में पिता के दफ़्तर से आते ही , पिता से पहले ही सारी बातें बता दिया, क्योंकि अपने गांव वाला को स्टेशन पर वह भी देखा रहा , और कहा पापा हम पांच महीने में सिर्फ पन्द्रह ही दिन स्कूल गये होंगे, पिताजी अब हममें हिम्मत नहीं है कि फिर से आठवीं की पढ़ाई करूं, तब ही मां बोली बेटा तुम तो जानते ही हो तुम भी और पिता भी तुम्हारे नौवीं कक्षा में नामांकन करवाने के लिए भरपूर कोशिश किया ,पर हुआ नहीं न, क्या करोगें बेटा एक साल की बात है पांच महीने बीत ही गये अच्छा से पढ़ाई कर लो मजबूत हो जाओगे ! उसी वक्त बंगाराम बोलने लगा , मां आप समझती नहीं हों , आप एक साल कह दिये , यहां लोग एक दिन ज़्यादा या कम होने के कारण सरकारी नौकरी के फॉर्म नहीं भर पाते हैं और आप एक साल कहती हैं , पापा - पापा मेरे पास एक सुझाव है, यदि आप चाहें तो मेरा नामांकन नौवीं कक्षा में हो जायेगा, पिता वह कैसे अभी तो सितंबर हो गया, अभी नामांकन होता है क्या , कहां होता है कहो मैं जरूर पूरा करूंगा ! पापा एक स्कूल हैं , जिसमें मेरा नामांकन नौवीं में हो जायेगा , पर वह प्राईवेट है , तब ही पिता कहा कहो बेटा हम कैसे तुम्हें प्राईवेट में पढ़ा सकते , प्राईवेट स्कूल की फीस हर महीने सात-आठ सौ रुपया कहां से दें पायेंगे, बोलो बेटा पापा सिर्फ एक बार आप कष्ट करिए, सिर्फ एडमिशन के लिए पच्चीस सौ रुपये दे दीजिए, उसके बाद आप जो हमें ट्यूशन पढ़ाते हैं , अब से ट्यूशन नहीं पढ़ेंगे और उसी ट्यूशन के पैसों से स्कूल के फीस भरेंगे, इस प्राईवेट स्कूल की ज्यादा फीस नहीं है , जैसा कहें पापा आप ,फिर क्या पिता ब्याज पर लाकर पैसे दे दिया , और बंगाराम का नामांकन नौवीं कक्षा में हो गया ,जब बंगाराम के बारे में ट्यूशन के सर को पता चला , तो बंगाराम को बुलाया और कहें तुम ट्यूशन पढ़ने आओगे , और चाहो तो तुम्हें हम अपने ट्यूशन के कुछ बच्चों को पढ़ाने के लिए देते हैं, जिससे तुम अपने विद्यालय के फीस भर पाओगे ! इस तरह फिर बंगाराम सही रास्ते पर आ गया, दिन-रात मेहनत करने लगा, और अपने मंजिल के तरफ बढ़ने लगा ! शिक्षा :- कोई इंसान ग़लत नहीं होता हैं , ग़लत बनने का कुछ न कुछ कारण होता है, और वही कारण उसे गलत दिशा में ले जाकर गलत बना देता है ! अतः बिना जाने किसी को ग़लत कहना उचित नहीं है ! पहले कारण जानना चाहिए वह कैसे ग़लत हुआ , हुआ तो उसे कैसे सही रास्ते पर लाया जाये ! 🙏 धन्यवाद ! 💐🌹 ® ✍️ रोशन कुमार झा 🇮🇳 सुरेन्द्रनाथ इवनिंग कॉलेज , कोलकाता  02-05-2020 शनिवार 19:15 मो:-6290640716 রোশন কুমার ঝা, Roshan Kumar Jha यह हमारे द्वारा हम पर लिखी हुई प्रथम कहानी है ! नाटक भी 2 तारीख को ही लिखें रहें 02-10-2018 मंगलवार :- 8(01) http://roshanjha9997.blogspot.com/2020/05/1613.html कलम लाइव पत्रिका में भेजें ! :-15(04) रचनाकार, :-14(87) सृजन में  Hi Roshan Kumar Jha, Thank you for registering for "बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा कोविड़ 19 के जागरूकता हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम". Please submit any questions to: munnagkp01@rediffmail.com Date Time: May 2, 2020 12:00 PM India Join from a PC, Mac, iPad, iPhone or Android device: Click Here to Join Note: This link should not be shared with others; it is unique to you. Password: 020520 Add to Calendar   Add to Google Calendar   Add to Yahoo Calendar Or iPhone one-tap : India: +911164802722,,98113139253# or +912248798004,,98113139253# Or Telephone: Dial(for higher quality, dial a number based on your current location):      India: +91 116 480 2722 or +91 22 48 798 004 or +91 224 879 8012 or +91 226 480 2722 or +91 22 71 279 525 or +91 406 480 2722 or +91 446 480 2722 or +91 806 480 2722 or +91 80 71 279 440 or 000 800 050 5050 (Toll Free) or 000 800 040 1530 (Toll Free) US: +1 346 248 7799 or +1 646 558 8656 or +1 669 900 6833 or +1 253 215 8782 or +1 301 715 8592 or +1 312 626 6799 or 888 788 0099 (Toll Free) or 877 853 5247 (Toll Free) Webinar ID: 981 1313 9253 International numbers available: https://unicef.zoom.us/u/acFBoWc7Nv Or an H.323/SIP room system:H.323: 162.255.37.11 (US West) 162.255.36.11 (US East) 221.122.88.195 (China) 115.114.131.7 (India Mumbai) 115.114.115.7 (India Hyderabad) 213.19.144.110 (EMEA) 103.122.166.55 (Australia) 209.9.211.110 (Hong Kong China) 64.211.144.160 (Brazil) 69.174.57.160 (Canada) 207.226.132.110 (Japan) Meeting ID: 981 1313 9253 Password: 020520 SIP: 98113139253@zoomcrc.com Password: 020520 कविता :-  16(13) हिन्दी ✍️ रोशन कुमार झा 🇮🇳 http://roshanjha9997.blogspot.com/2020/05/1504.html -: चाह रहा फूल की, कली भी मिला नहीं !:- 02-05-2020 शनिवार 00:01 मो:-6290640716 दोहा :-कलम लाइव पत्रिका http://roshanjha9997.blogspot.com/2020/04/blog-post_29.html  http://roshanjha9997.blogspot.com/2020/04/1609_29.html  https://kalamlive.blogspot.com/2020/04/blog-post_87.html https://kalamlive.blogspot.com/2020/04/roshan-kumar-jha-jivan-prichay.html  रोशन कुमार झा (1) https://allpoetry.com/Roshan_Kumar_jha (2) रचनाकार :- https://www.rachanakar.org/2020/04/blog-post_476.html (3) अमर उजाला :- https://www.amarujala.com/kavya/mere-alfaz/roshan-kumar-come-here-krishna-poem-written-by-roshan-kumar-jha (4) https://kalamlive.blogspot.com/2020/04/corona-ke-khilaaf-desh-ki-janata.html (5) भोजपुरी https://kalamlive.blogspot.com/2020/04/blog-post_87.html (6) जीवनी :- https://kalamlive.blogspot.com/2020/04/roshan-kumar-jha-jivan-prichay.html (7) नाटक :- https://kalamlive.blogspot.com/2020/05/blog-post.html दोहा :- https://kalamlive.blogspot.com/2020/05/corona-sambndhit-doha.html http://roshanjha9997.blogspot.com/2020/05/1614-101.html"

कहानी :-  16(14) हिन्दी ✍️ रोशन कुमार झा 🇮🇳
कहानी :- 1(01) हिन्दी 

 ✍️ रोशन कुमार झा 🇮🇳
सुरेन्द्रनाथ इवनिंग कॉलेज , कोलकाता 
02-05-2020 शनिवार 19:15 मो:-6290640716
রোশন কুমার ঝা, Roshan Kumar Jha
यह हमारे द्वारा हम पर लिखी हुई प्रथम कहानी है !
नाटक भी 2 तारीख को ही लिखें रहें 
02-10-2018 मंगलवार :- 8(01)

-:  ग़लत नहीं, ग़लत होने की कारण !:-

बात है कुमारपाड़ापुर की झील रोड की ,
बंगाराम, तोताराम,अंतिमराम, तीनों
भाई में से बंगाराम बड़े थे, तीनों संग- संग स्कूल 
आया-जाया करते थे, बंगाराम आठवीं , 
तोताराम सातवीं और अंतिमराम दूसरी कक्षा में 
पढ़ते थे, बंगाराम बड़े शांत स्वभाव के थे ,
जब बंगाराम आठवीं कक्षा पास कर लिए, तब 
बंगाराम के सामने एक संकट छा गया, बंगाराम 
जिस नेहरू जी के स्कूल में पढ़ते थे ,वह विद्यालय 
आठवीं तक ही था ,बंगाराम नौवीं कक्षा में नामांकन 
करवाने के काफी कोशिश किया ,पर सब व्यर्थ गया, 
कोई भी स्कूल के नवीं कक्षा में सीट ही नहीं थी , या 
और कारण रहा होगा, इसके नामांकन के लिए 
मात-पिता भी परेशान रहते थे , अंत में पिता किसी 
से कह सुनकर नामांकन नवीं में न करवाकर पुनः 
आठवीं में हावड़ा हिन्दी हाई स्कूल में 
करवां दिये, वह विद्यालय बारहवीं तक रहा,
पर फिर से आठवीं में नामांकन करवाने के कारण
बंगाराम गलत रास्ते पर चलने लगते हैं, वह दिन- रात 
सोचने लगता है , सोचता है पढ़ाई लिखाई करूं , 
या न करूं ,बंगाराम धार्मिक,विक्रम बजरंगी 
हनुमान व मां सरस्वती जी के पूजा पाठ बचपना 
से ही करते थे ,अंत में वे ईश्वर से प्रार्थना किये ,
हे ! भगवान तूने ये क्या किया, मेरे साथ पढ़े सहपाठी 
आगे हम फिर से आठवीं में पढ़ूं हमसे नहीं होगा , 
वह यह निर्णय लेकर ग़लत रास्ते पर चलने लगा ,
वह घर से  निकलता विद्यालय के लिए पर विद्यालय 
जाता नहीं, वह ट्रेन से इधर-उधर घूमने लगा था,
कैसे न घूमता , विद्यार्थियों का तो रेल का टिकट 
लगता ही नहीं था, इसके बारे में उसके माता-पिता 
को पता भी नहीं चलता था, क्योंकि वह स्कूल 
के समयानुसार ही आया-जाया करता था ,पर एक 
दिन उसका गांव का प्रकाश- रोशन भईया देख लिया, 
रेलवे स्टेशन पर ! , पर उससे कुछ न कहा,
वह सीधे उसके पिता के पास फोन किया, बोला 
चाचा बंगाराम को आज घूमते हुए देखें है स्टेशन पर, 
फिर क्या रात में पिता के दफ़्तर से आते ही , पिता से 
पहले ही सारी बातें बता दिया, क्योंकि अपने गांव 
वाला को स्टेशन पर वह भी देखा रहा , और कहा 
पापा हम पांच महीने में सिर्फ पन्द्रह ही दिन स्कूल 
गये होंगे, पिताजी अब हममें हिम्मत नहीं है कि 
फिर से आठवीं की पढ़ाई करूं, तब ही मां बोली 
बेटा तुम तो जानते ही हो तुम भी और पिता भी 
तुम्हारे नौवीं कक्षा में नामांकन करवाने के लिए 
भरपूर कोशिश किया ,पर हुआ नहीं न,
क्या करोगें बेटा एक साल की बात है पांच 
महीने बीत ही गये अच्छा से पढ़ाई कर लो मजबूत हो जाओगे ! उसी वक्त बंगाराम बोलने लगा , मां 
आप समझती नहीं हों , आप एक साल कह दिये , 
यहां लोग एक दिन ज़्यादा या कम होने के कारण 
सरकारी नौकरी के फॉर्म नहीं भर पाते हैं और आप 
एक साल कहती हैं , पापा - पापा मेरे पास एक 
सुझाव है, यदि आप चाहें तो मेरा नामांकन नौवीं 
कक्षा में हो जायेगा,
पिता वह कैसे अभी तो सितंबर हो गया, अभी 
नामांकन होता है क्या , कहां होता है कहो मैं जरूर 
पूरा करूंगा ! पापा एक स्कूल हैं , जिसमें मेरा 
नामांकन नौवीं में हो जायेगा , पर वह प्राईवेट है ,
तब ही पिता कहा कहो बेटा हम कैसे तुम्हें प्राईवेट 
में पढ़ा सकते , प्राईवेट स्कूल की फीस हर महीने 
सात-आठ सौ रुपया कहां से दें पायेंगे,  बोलो बेटा 
पापा सिर्फ एक बार आप कष्ट करिए, सिर्फ एडमिशन 
के लिए पच्चीस सौ रुपये दे दीजिए, उसके बाद आप 
जो हमें ट्यूशन पढ़ाते हैं , अब से  ट्यूशन नहीं पढ़ेंगे 
और उसी ट्यूशन के पैसों से स्कूल के फीस भरेंगे, 
इस प्राईवेट स्कूल की ज्यादा फीस नहीं है , जैसा 
कहें पापा आप ,फिर क्या पिता ब्याज पर लाकर 
पैसे दे दिया , और बंगाराम का नामांकन नौवीं कक्षा 
में हो गया ,जब बंगाराम के बारे में ट्यूशन के सर 
को पता चला , तो बंगाराम को बुलाया और कहें 
तुम ट्यूशन पढ़ने आओगे , और चाहो तो तुम्हें हम 
अपने  ट्यूशन के कुछ बच्चों को पढ़ाने के लिए देते हैं,
जिससे तुम अपने विद्यालय के फीस भर पाओगे !
इस तरह फिर बंगाराम सही रास्ते पर आ गया, 
दिन-रात मेहनत करने लगा, और अपने मंजिल
के तरफ बढ़ने लगा !

शिक्षा :- कोई इंसान ग़लत नहीं होता हैं , ग़लत बनने 
का कुछ न कुछ कारण होता है, और वही कारण 
उसे गलत दिशा में ले जाकर गलत बना देता है !
अतः बिना जाने किसी को ग़लत कहना उचित नहीं है !
पहले कारण जानना चाहिए वह कैसे ग़लत हुआ ,
हुआ तो उसे कैसे सही रास्ते पर लाया जाये !

                  🙏 धन्यवाद ! 💐🌹

® ✍️ रोशन कुमार झा 🇮🇳
सुरेन्द्रनाथ इवनिंग कॉलेज , कोलकाता 
02-05-2020 शनिवार 19:15 मो:-6290640716
রোশন কুমার ঝা, Roshan Kumar Jha
यह हमारे द्वारा हम पर लिखी हुई प्रथम कहानी है !
नाटक भी 2 तारीख को ही लिखें रहें 
02-10-2018 मंगलवार :- 8(01)
http://roshanjha9997.blogspot.com/2020/05/1613.html
कलम लाइव पत्रिका में भेजें ! 
:-15(04) रचनाकार, :-14(87) सृजन में 
 Hi Roshan Kumar Jha,
Thank you for registering for "बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा कोविड़ 19 के जागरूकता हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम".
Please submit any questions to: munnagkp01@rediffmail.com
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Webinar ID: 981 1313 9253
International numbers available: https://unicef.zoom.us/u/acFBoWc7Nv
Or an H.323/SIP room system:H.323:
162.255.37.11 (US West)
162.255.36.11 (US East)
221.122.88.195 (China)
115.114.131.7 (India Mumbai)
115.114.115.7 (India Hyderabad)
213.19.144.110 (EMEA)
103.122.166.55 (Australia)
209.9.211.110 (Hong Kong China)
64.211.144.160 (Brazil)
69.174.57.160 (Canada)
207.226.132.110 (Japan)
Meeting ID: 981 1313 9253
Password: 020520
SIP: 98113139253@zoomcrc.com
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कविता  :-  16(13) हिन्दी ✍️ रोशन कुमार झा 🇮🇳
http://roshanjha9997.blogspot.com/2020/05/1504.html
-:  चाह रहा फूल की, कली भी मिला नहीं  !:-
02-05-2020 शनिवार 00:01 मो:-6290640716
दोहा :-कलम लाइव पत्रिका
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रोशन कुमार झा 
(1) 
https://allpoetry.com/Roshan_Kumar_jha
(2) रचनाकार :-
https://www.rachanakar.org/2020/04/blog-post_476.html 
(3) अमर उजाला :-
https://www.amarujala.com/kavya/mere-alfaz/roshan-kumar-come-here-krishna-poem-written-by-roshan-kumar-jha


(4) 
https://kalamlive.blogspot.com/2020/04/corona-ke-khilaaf-desh-ki-janata.html 
(5) भोजपुरी 
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(6) जीवनी :-
https://kalamlive.blogspot.com/2020/04/roshan-kumar-jha-jivan-prichay.html 
(7)
नाटक :- https://kalamlive.blogspot.com/2020/05/blog-post.html
दोहा :-
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#Morning

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#टोडाभीम (नरेन्द्र कुमार जांगिड) टोडाभीम कस्बे के नया बस स्टैंड स्थित आदर्श विद्या मंदिर में सुभाष जयंती पर पथ संचलन का आयोजन किया गया l वि

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"चौदह वर्ष के वनवास के दौरान श्रीराम कहाँ कहाँ रहे? प्रभु श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम ने कई ऋषि-मुनियों से शिक्षा और विद्या ग्रहण की, संपूर्ण भारत को उन्होंने एक ही विचारधारा के सूत्र में बांधा, लेकिन इस दौरान उनके साथ कुछ ऐसा भी घटा जिसने उनके जीवन को बदल कर रख दिया। जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं, जहां श्रीराम और सीता रुके या रहे थे। वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदि स्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की। आओ जानते हैं कुछ प्रमुख स्थानों के बारे में; 1. श्रृंगवेरपुर: - राम को जब वनवास हुआ तो वाल्मीकि रामायण और शोधकर्ताओं के अनुसार वे सबसे पहले तमसा नदी पहुंचे, जो अयोध्या से 20 किमी दूर है। इसके बाद उन्होंने गोमती नदी पार की और प्रयागराज (इलाहाबाद) से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था। 2. सिंगरौर: - इलाहाबाद से लगभग 35.2 किमी उत्तर-पश्चिम की ओर स्थित ‘सिंगरौर’ नामक स्थान ही प्राचीन समय में श्रृंगवेरपुर नाम से परिज्ञात था। रामायण में इस नगर का उल्लेख आता है। यह नगर गंगा घाटी के तट पर स्थित था। महाभारत में इसे ‘तीर्थस्थल’ कहा गया है। 3. कुरई: - इलाहाबाद जिले में ही कुरई नामक एक स्थान है, जो सिंगरौर के निकट गंगा नदी के तट पर स्थित है। गंगा के उस पार सिंगरौर तो इस पार कुरई। सिंगरौर में गंगा पार करने के पश्चात श्रीराम इसी स्थान पर उतरे थे। इस ग्राम में एक छोटा-सा मंदिर है, जो स्थानीय लोकश्रुति के अनुसार उसी स्थान पर है, जहां गंगा को पार करने के पश्चात राम, लक्ष्मण और सीताजी ने कुछ देर विश्राम किया था। 4. चित्रकूट के घाट पर: - कुरई से आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे। प्रयाग को वर्तमान में इलाहाबाद कहा जाता है। यहां गंगा-जमुना का संगम स्थल है। हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा तीर्थस्थान है। प्रभु श्रीराम ने संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। यहां स्थित स्मारकों में शामिल हैं, वाल्मीकि आश्रम, मांडव्य आश्रम, भरतकूप इत्यादि। चित्रकूट में श्रीराम के दुर्लभ प्रमाण,,चित्रकूट वह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं। तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं। 5. अत्रि ऋषि का आश्रम: - चित्रकूट के पास ही सतना मध्यप्रदेश स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। वहां श्रीराम ने कुछ वक्त बिताया। अत्रि के आश्रम के आस-पास राक्षसों का समूह रहता था। अत्रि, उनके भक्तगण व माता अनुसूइया उन राक्षसों से भयभीत रहते थे। भगवान श्रीराम ने उन राक्षसों का वध किया। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में इसका वर्णन मिलता है। प्रातःकाल जब राम आश्रम से विदा होने लगे तो अत्रि ऋषि उन्हें विदा करते हुए बोले, ‘हे राघव! इन वनों में भयंकर राक्षस तथा सर्प निवास करते हैं, जो मनुष्यों को नाना प्रकार के कष्ट देते हैं। इनके कारण अनेक तपस्वियों को असमय ही काल का ग्रास बनना पड़ा है। मैं चाहता हूं, तुम इनका विनाश करके तपस्वियों की रक्षा करो।’ राम ने महर्षि की आज्ञा को शिरोधार्य कर उपद्रवी राक्षसों तथा मनुष्य का प्राणांत करने वाले भयानक सर्पों को नष्ट करने का वचन देखर सीता तथा लक्ष्मण के साथ आगे के लिए प्रस्थान किया। 6. दंडकारण्य: - अत्रि ऋषि के आश्रम में कुछ दिन रुकने के बाद श्रीराम ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों को अपना आश्रय स्थल बनाया। यह जंगल क्षेत्र था दंडकारण्य। ‘अत्रि-आश्रम’ से ‘दंडकारण्य’ आरंभ हो जाता है। छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों पर राम के नाना और कुछ पर बाणासुर का राज्य था। यहां के नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवं गुफाओं में राम के रहने के सबूतों की भरमार है। यहीं पर राम ने अपना वनवास काटा था। यहां वे लगभग 10 वर्षों से भी अधिक समय तक रहे थे। ‘अत्रि-आश्रम’ से भगवान राम मध्यप्रदेश के सतना पहुंचे, जहां ‘रामवन’ हैं। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्रों में नर्मदा व महानदी नदियों के किनारे 10 वर्षों तक उन्होंने कई ऋषि आश्रमों का भ्रमण किया। दंडकारण्य क्षेत्र तथा सतना के आगे वे विराध सरभंग एवं सुतीक्ष्ण मुनि आश्रमों में गए। बाद में सतीक्ष्ण आश्रम वापस आए। पन्ना, रायपुर, बस्तर और जगदलपुर में कई स्मारक विद्यमान हैं। उदाहरणत: मांडव्य आश्रम, श्रृंगी आश्रम, राम-लक्ष्मण मंदिर आदि। शहडोल (अमरकंटक): - राम वहां से आधुनिक जबलपुर, शहडोल (अमरकंटक) गए होंगे। शहडोल से पूर्वोत्तर की ओर सरगुजा क्षेत्र है। यहां एक पर्वत का नाम ‘रामगढ़’ है। 30 फीट की ऊंचाई से एक झरना जिस कुंड में गिरता है, उसे ‘सीता कुंड’ कहा जाता है। यहां वशिष्ठ गुफा है। दो गुफाओं के नाम ‘लक्ष्मण बोंगरा’ और ‘सीता बोंगरा’ हैं। शहडोल से दक्षिण-पूर्व की ओर बिलासपुर के आसपास छत्तीसगढ़ है। वर्तमान में करीब 92,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस इलाके के पश्चिम में अबूझमाड़ पहाड़ियां तथा पूर्व में इसकी सीमा पर पूर्वी घाट शामिल हैं। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के हिस्से शामिल हैं। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक करीब 320 किमी तथा पूर्व से पश्चिम तक लगभग 480 किलोमीटर है। यह क्षेत्र आजकल दंतेवाड़ा के नाम से जाना जाता है। यहां वर्तमान में गोंड जाति निवास करती है तथा समूचा दंडकारण्य अब नक्सलवाद की चपेट में है। इसी दंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदी के तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे। स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि दुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है। दंडकारण्य क्षे‍त्र की चर्चा पुराणों में विस्तार से मिलती है। इस क्षेत्र की उत्पत्ति कथा महर्षि अगस्त्य मुनि से जुड़ी हुई है। यहीं पर उनका महाराष्ट्र के नासिक के अलावा एक आश्रम था। 7. पंचवटी, नासिक: - दण्डकारण्य में मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम कई नदियों, तालाबों, पर्वतों और वनों को पार करने के पश्चात नासिक में अगस्त्य मुनि के आश्रम गए। मुनि का आश्रम नासिक के पंचवटी क्षेत्र में था। त्रेतायुग में लक्ष्मण व सीता सहित श्रीरामजी ने वनवास का कुछ समय यहां बिताया। उस काल में पंचवटी जनस्थान या दंडक वन के अंतर्गत आता था। पंचवटी या नासिक से गोदावरी का उद्गम स्थान त्र्यंम्बकेश्वर लगभग 32 किमी दूर है। वर्तमान में पंचवटी भारत के महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के किनारे स्थित विख्यात धार्मिक तीर्थस्थान है। अगस्त्य मुनि ने श्रीराम को अग्निशाला में बनाए गए शस्त्र भेंट किए। नासिक में श्रीराम पंचवटी में रहे और गोदावरी के तट पर स्नान-ध्यान किया। नासिक में गोदावरी के तट पर पांच वृक्षों का स्थान पंचवटी कहा जाता है। ये पांच वृक्ष थे- पीपल, बरगद, आंवला, बेल तथा अशोक वट। यहीं पर सीता माता की गुफा के पास पांच प्राचीन वृक्ष हैं जिन्हें पंचवट के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इन वृक्षों को राम-सीमा और लक्ष्मण ने अपने हाथों से लगाया था। यहीं पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। राम-लक्ष्मण ने खर व दूषण के साथ युद्ध किया था। यहां पर मारीच वध स्थल का स्मारक भी अस्तित्व में है। नासिक क्षेत्र स्मारकों से भरा पड़ा है, जैसे कि सीता सरोवर, राम कुंड, त्र्यम्बकेश्वर आदि। यहां श्रीराम का बनाया हुआ एक मंदिर खंडहर रूप में विद्यमान है। मरीच का वध पंचवटी के निकट ही मृगव्याधेश्वर में हुआ था। गिद्धराज जटायु से श्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड में पंचवटी का मनोहर वर्णन मिलता है। 8. सीताहरण का स्थान सर्वतीर्थ: - नासिक क्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण ने सीता का हरण किया और जटायु का भी वध किया जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूर ताकेड गांव में ‘सर्वतीर्थ’ नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है। जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पर हुई, जो नासिक जिले के इगतपुरी तहसील के ताकेड गांव में मौजूद है। इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया, क्योंकि यहीं पर मरणासन्न जटायु ने सीता माता के बारे में बताया। रामजी ने यहां जटायु का अंतिम संस्कार करके पिता और जटायु का श्राद्ध-तर्पण किया था। इसी तीर्थ पर लक्ष्मण रेखा थी। 9.पर्णशाला, भद्राचलम: - पर्णशाला आंध्रप्रदेश में खम्माम जिले के भद्राचलम में स्थित है। रामालय से लगभग 1 घंटे की दूरी पर स्थित पर्णशाला को ‘पनशाला’ या ‘पनसाला’ भी कहते हैं। हिन्दुओं के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से यह एक है। पर्णशाला गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां से सीताजी का हरण हुआ था। हालांकि कुछ मानते हैं कि इस स्थान पर रावण ने अपना विमान उतारा था। इस स्थल से ही रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बिठाया था यानी सीताजी ने धरती यहां छोड़ी थी। इसी से वास्तविक हरण का स्थल यह माना जाता है। यहां पर राम-सीता का प्राचीन मंदिर है। 10. सीता की खोज तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र: - सर्वतीर्थ जहां जटायु का वध हुआ था, वह स्थान सीता की खोज का प्रथम स्थान था। उसके बाद श्रीराम-लक्ष्मण तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंच गए। तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वे सीता की खोज में गए। 11. शबरी का आश्रम पम्पा सरोवर: - तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्‍मण चले सीता की खोज में। जटायु और कबंध से मिलने के पश्‍चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकल केरल में स्थित है। पम्पा नदी भारत के केरल राज्य की तीसरी सबसे बड़ी नदी है। इसे ‘पम्बा’ नाम से भी जाना जाता है। ‘पम्पा’ तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। श्रावणकौर रजवाड़े की सबसे लंबी नदी है। इसी नदी के किनारे पर हम्पी बसा हुआ है। यह स्थान बेर के वृक्षों के लिए आज भी प्रसिद्ध है। पौराणिक ग्रंथ ‘रामायण’ में भी हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधा की राजधानी के तौर पर किया गया है। 12. हनुमान से भेंट: - मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा और श्रीराम ने बाली का वध किया। ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था। इसी पर्वत पर श्रीराम की हनुमान से भेंट हुई थी। बाद में हनुमान ने राम और सुग्रीव की भेंट करवाई, जो एक अटूट मित्रता बन गई। जब महाबली बाली अपने भाई सुग्रीव को मारकर किष्किंधा से भागा तो वह ऋष्यमूक पर्वत पर ही आकर छिपकर रहने लगा था। ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है। विरुपाक्ष मंदिर के पास से ऋष्यमूक पर्वत तक के लिए मार्ग जाता है। यहां तुंगभद्रा नदी (पम्पा) धनुष के आकार में बहती है। तुंगभद्रा नदी में पौराणिक चक्रतीर्थ माना गया है। पास ही पहाड़ी के नीचे श्रीराम मंदिर है। पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ माना जाता है। इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था। 13. कोडीकरई: - हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े। मलय पर्वत, चंदन वन, अनेक नदियों, झरनों तथा वन-वाटिकाओं को पार करके राम और उनकी सेना ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया। श्रीराम ने पहले अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित किया। तमिलनाडु की एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्‍तारित है। कोडीकरई समुद्र तट वेलांकनी के दक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में पाल्‍क स्‍ट्रेट से घिरा हुआ है। लेकिन राम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र को पार नहीं किया जा सकता और यह स्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तब श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया। 14.रामेश्‍वरम: - रामेश्‍वरम समुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंग के लिए आदर्श है। रामेश्‍वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है। 15.धनुषकोडी: : - वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करने का फैसला लिया। छेदुकराई तथा रामेश्वरम के इर्द-गिर्द इस घटना से संबंधित अनेक स्मृतिचिह्न अभी भी मौजूद हैं। नाविक रामेश्वरम में धनुषकोडी नामक स्थान से यात्रियों को रामसेतु के अवशेषों को दिखाने ले जाते हैं। धनुषकोडी भारत के तमिलनाडु राज्‍य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्‍नार से करीब 18 मील पश्‍चिम में है। इसका नाम धनुषकोडी इसलिए है कि यहां से श्रीलंका तक वानर सेना के माध्यम से नल और नील ने जो पुल (रामसेतु) बनाया था उसका आकार मार्ग धनुष के समान ही है। इन पूरे इलाकों को मन्नार समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है। धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्‍थलीय सीमा है, जहां समुद्र नदी की गहराई जितना है जिसमें कहीं-कहीं भूमि नजर आती है। दरअसल, यहां एक पुल डूबा पड़ा है। 1860 में इसकी स्पष्ट पहचान हुई और इसे हटाने के कई प्रयास किए गए। अंग्रेज इसे एडम ब्रिज कहने लगे तो स्थानीय लोगों में भी यह नाम प्रचलित हो गया। अंग्रेजों ने कभी इस पुल को क्षतिग्रस्त नहीं किया लेकिन आजाद भारत में पहले रेल ट्रैक निर्माण के चक्कर में बाद में बंदरगाह बनाने के चलते इस पुल को क्षतिग्रस्त किया गया। 30मील लंबा और सवा मील चौड़ा यह रामसेतु 5 से 30 फुट तक पानी में डूबा है। श्रीलंका सरकार इस डूबे हुए पुल (पम्बन से मन्नार) के ऊपर भू-मार्ग का निर्माण कराना चाहती है जबकि भारत सरकार नौवहन हेतु उसे तोड़ना चाहती है। इस कार्य को भारत सरकार ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट का नाम दिया है। श्रीलंका के ऊर्जा मंत्री श्रीजयसूर्या ने इस डूबे हुए रामसेतु पर भारत और श्रीलंका के बीच भू-मार्ग का निर्माण कराने का प्रस्ताव रखा था। 16.’नुवारा एलिया’ पर्वत श्रृंखला: --वाल्मिकी रामायण अनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवारा एलिया’ पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है। श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती है। आजकल भी इन स्थानों की भौगोलिक विशेषताएं, जीव, वनसतथा स्मारक आदि बिलकु हैं जैसे कि रामायण में वर्णित किए गए है... साभार 🙏🙏"

चौदह वर्ष के वनवास के दौरान श्रीराम कहाँ कहाँ रहे?

प्रभु श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम ने कई ऋषि-मुनियों से शिक्षा और विद्या ग्रहण की, संपूर्ण भारत को उन्होंने एक ही विचारधारा के सूत्र में बांधा, लेकिन इस दौरान उनके साथ कुछ ऐसा भी घटा जिसने उनके जीवन को बदल कर रख दिया।

जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं, जहां श्रीराम और सीता रुके या रहे थे। वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदि स्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की। आओ जानते हैं कुछ प्रमुख स्थानों के बारे में;

1. श्रृंगवेरपुर: - राम को जब वनवास हुआ तो वाल्मीकि रामायण और शोधकर्ताओं के अनुसार वे सबसे पहले तमसा नदी पहुंचे, जो अयोध्या से 20 किमी दूर है। इसके बाद उन्होंने गोमती नदी पार की और प्रयागराज (इलाहाबाद) से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था।

2. सिंगरौर: - इलाहाबाद से लगभग 35.2 किमी उत्तर-पश्चिम की ओर स्थित ‘सिंगरौर’ नामक स्थान ही प्राचीन समय में श्रृंगवेरपुर नाम से परिज्ञात था। रामायण में इस नगर का उल्लेख आता है। यह नगर गंगा घाटी के तट पर स्थित था। महाभारत में इसे ‘तीर्थस्थल’ कहा गया है।

3. कुरई: - इलाहाबाद जिले में ही कुरई नामक एक स्थान है, जो सिंगरौर के निकट गंगा नदी के तट पर स्थित है। गंगा के उस पार सिंगरौर तो इस पार कुरई। सिंगरौर में गंगा पार करने के पश्चात श्रीराम इसी स्थान पर उतरे थे।

इस ग्राम में एक छोटा-सा मंदिर है, जो स्थानीय लोकश्रुति के अनुसार उसी स्थान पर है, जहां गंगा को पार करने के पश्चात राम, लक्ष्मण और सीताजी ने कुछ देर विश्राम किया था।

4. चित्रकूट के घाट पर: - कुरई से आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे। प्रयाग को वर्तमान में इलाहाबाद कहा जाता है। यहां गंगा-जमुना का संगम स्थल है। हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा तीर्थस्थान है। प्रभु श्रीराम ने संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। यहां स्थित स्मारकों में शामिल हैं, वाल्मीकि आश्रम, मांडव्य आश्रम, भरतकूप इत्यादि।

चित्रकूट में श्रीराम के दुर्लभ प्रमाण,,चित्रकूट वह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं। तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं।

5. अत्रि ऋषि का आश्रम: - चित्रकूट के पास ही सतना मध्यप्रदेश स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। वहां श्रीराम ने कुछ वक्त बिताया।

अत्रि के आश्रम के आस-पास राक्षसों का समूह रहता था। अत्रि, उनके भक्तगण व माता अनुसूइया उन राक्षसों से भयभीत रहते थे। भगवान श्रीराम ने उन राक्षसों का वध किया। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में इसका वर्णन मिलता है।

प्रातःकाल जब राम आश्रम से विदा होने लगे तो अत्रि ऋषि उन्हें विदा करते हुए बोले, ‘हे राघव! इन वनों में भयंकर राक्षस तथा सर्प निवास करते हैं, जो मनुष्यों को नाना प्रकार के कष्ट देते हैं। इनके कारण अनेक तपस्वियों को असमय ही काल का ग्रास बनना पड़ा है। मैं चाहता हूं, तुम इनका विनाश करके तपस्वियों की रक्षा करो।’

राम ने महर्षि की आज्ञा को शिरोधार्य कर उपद्रवी राक्षसों तथा मनुष्य का प्राणांत करने वाले भयानक सर्पों को नष्ट करने का वचन देखर सीता तथा लक्ष्मण के साथ आगे के लिए प्रस्थान किया।

6. दंडकारण्य: - अत्रि ऋषि के आश्रम में कुछ दिन रुकने के बाद श्रीराम ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों को अपना आश्रय स्थल बनाया। यह जंगल क्षेत्र था दंडकारण्य। ‘अत्रि-आश्रम’ से ‘दंडकारण्य’ आरंभ हो जाता है। छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों पर राम के नाना और कुछ पर बाणासुर का राज्य था। यहां के नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवं गुफाओं में राम के रहने के सबूतों की भरमार है। यहीं पर राम ने अपना वनवास काटा था। यहां वे लगभग 10 वर्षों से भी अधिक समय तक रहे थे।

‘अत्रि-आश्रम’ से भगवान राम मध्यप्रदेश के सतना पहुंचे, जहां ‘रामवन’ हैं। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्रों में नर्मदा व महानदी नदियों के किनारे 10 वर्षों तक उन्होंने कई ऋषि आश्रमों का भ्रमण किया। दंडकारण्य क्षेत्र तथा सतना के आगे वे विराध सरभंग एवं सुतीक्ष्ण मुनि आश्रमों में गए। बाद में सतीक्ष्ण आश्रम वापस आए। पन्ना, रायपुर, बस्तर और जगदलपुर में कई स्मारक विद्यमान हैं। उदाहरणत: मांडव्य आश्रम, श्रृंगी आश्रम, राम-लक्ष्मण मंदिर आदि।

शहडोल (अमरकंटक): - राम वहां से आधुनिक जबलपुर, शहडोल (अमरकंटक) गए होंगे। शहडोल से पूर्वोत्तर की ओर सरगुजा क्षेत्र है। यहां एक पर्वत का नाम ‘रामगढ़’ है। 30 फीट की ऊंचाई से एक झरना जिस कुंड में गिरता है, उसे ‘सीता कुंड’ कहा जाता है। यहां वशिष्ठ गुफा है। दो गुफाओं के नाम ‘लक्ष्मण बोंगरा’ और ‘सीता बोंगरा’ हैं। शहडोल से दक्षिण-पूर्व की ओर बिलासपुर के आसपास छत्तीसगढ़ है।

वर्तमान में करीब 92,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस इलाके के पश्चिम में अबूझमाड़ पहाड़ियां तथा पूर्व में इसकी सीमा पर पूर्वी घाट शामिल हैं। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के हिस्से शामिल हैं। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक करीब 320 किमी तथा पूर्व से पश्चिम तक लगभग 480 किलोमीटर है।

यह क्षेत्र आजकल दंतेवाड़ा के नाम से जाना जाता है। यहां वर्तमान में गोंड जाति निवास करती है तथा समूचा दंडकारण्य अब नक्सलवाद की चपेट में है।

इसी दंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदी के तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे।

स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि दुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है।

दंडकारण्य क्षे‍त्र की चर्चा पुराणों में विस्तार से मिलती है। इस क्षेत्र की उत्पत्ति कथा महर्षि अगस्त्य मुनि से जुड़ी हुई है। यहीं पर उनका महाराष्ट्र के नासिक के अलावा एक आश्रम था।

7. पंचवटी, नासिक: - दण्डकारण्य में मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम कई नदियों, तालाबों, पर्वतों और वनों को पार करने के पश्चात नासिक में अगस्त्य मुनि के आश्रम गए। मुनि का आश्रम नासिक के पंचवटी क्षेत्र में था। त्रेतायुग में लक्ष्मण व सीता सहित श्रीरामजी ने वनवास का कुछ समय यहां बिताया।

उस काल में पंचवटी जनस्थान या दंडक वन के अंतर्गत आता था। पंचवटी या नासिक से गोदावरी का उद्गम स्थान त्र्यंम्बकेश्वर लगभग 32 किमी दूर है। वर्तमान में पंचवटी भारत के महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के किनारे स्थित विख्यात धार्मिक तीर्थस्थान है।

अगस्त्य मुनि ने श्रीराम को अग्निशाला में बनाए गए शस्त्र भेंट किए। नासिक में श्रीराम पंचवटी में रहे और गोदावरी के तट पर स्नान-ध्यान किया। नासिक में गोदावरी के तट पर पांच वृक्षों का स्थान पंचवटी कहा जाता है। ये पांच वृक्ष थे- पीपल, बरगद, आंवला, बेल तथा अशोक वट। यहीं पर सीता माता की गुफा के पास पांच प्राचीन वृक्ष हैं जिन्हें पंचवट के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इन वृक्षों को राम-सीमा और लक्ष्मण ने अपने हाथों से लगाया था।

यहीं पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। राम-लक्ष्मण ने खर व दूषण के साथ युद्ध किया था। यहां पर मारीच वध स्थल का स्मारक भी अस्तित्व में है। नासिक क्षेत्र स्मारकों से भरा पड़ा है, जैसे कि सीता सरोवर, राम कुंड, त्र्यम्बकेश्वर आदि। यहां श्रीराम का बनाया हुआ एक मंदिर खंडहर रूप में विद्यमान है।

मरीच का वध पंचवटी के निकट ही मृगव्याधेश्वर में हुआ था। गिद्धराज जटायु से श्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड में पंचवटी का मनोहर वर्णन मिलता है।

8. सीताहरण का स्थान सर्वतीर्थ: - नासिक क्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण ने सीता का हरण किया और जटायु का भी वध किया जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूर ताकेड गांव में ‘सर्वतीर्थ’ नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है।

जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पर हुई, जो नासिक जिले के इगतपुरी तहसील के ताकेड गांव में मौजूद है। इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया, क्योंकि यहीं पर मरणासन्न जटायु ने सीता माता के बारे में बताया। रामजी ने यहां जटायु का अंतिम संस्कार करके पिता और जटायु का श्राद्ध-तर्पण किया था। इसी तीर्थ पर लक्ष्मण रेखा थी।

9.पर्णशाला, भद्राचलम: - पर्णशाला आंध्रप्रदेश में खम्माम जिले के भद्राचलम में स्थित है। रामालय से लगभग 1 घंटे की दूरी पर स्थित पर्णशाला को ‘पनशाला’ या ‘पनसाला’ भी कहते हैं। हिन्दुओं के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से यह एक है। पर्णशाला गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां से सीताजी का हरण हुआ था। हालांकि कुछ मानते हैं कि इस स्थान पर रावण ने अपना विमान उतारा था।

इस स्थल से ही रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बिठाया था यानी सीताजी ने धरती यहां छोड़ी थी। इसी से वास्तविक हरण का स्थल यह माना जाता है। यहां पर राम-सीता का प्राचीन मंदिर है।

10. सीता की खोज तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र: - सर्वतीर्थ जहां जटायु का वध हुआ था, वह स्थान सीता की खोज का प्रथम स्थान था। उसके बाद श्रीराम-लक्ष्मण तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंच गए। तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वे सीता की खोज में गए।

11. शबरी का आश्रम पम्पा सरोवर: - तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्‍मण चले सीता की खोज में। जटायु और कबंध से मिलने के पश्‍चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकल केरल में स्थित है।

पम्पा नदी भारत के केरल राज्य की तीसरी सबसे बड़ी नदी है। इसे ‘पम्बा’ नाम से भी जाना जाता है। ‘पम्पा’ तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। श्रावणकौर रजवाड़े की सबसे लंबी नदी है। इसी नदी के किनारे पर हम्पी बसा हुआ है। यह स्थान बेर के वृक्षों के लिए आज भी प्रसिद्ध है। पौराणिक ग्रंथ ‘रामायण’ में भी हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधा की राजधानी के तौर पर किया गया है।

12. हनुमान से भेंट: - मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा और श्रीराम ने बाली का वध किया।

ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था। इसी पर्वत पर श्रीराम की हनुमान से भेंट हुई थी। बाद में हनुमान ने राम और सुग्रीव की भेंट करवाई, जो एक अटूट मित्रता बन गई। जब महाबली बाली अपने भाई सुग्रीव को मारकर किष्किंधा से भागा तो वह ऋष्यमूक पर्वत पर ही आकर छिपकर रहने लगा था।

ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है। विरुपाक्ष मंदिर के पास से ऋष्यमूक पर्वत तक के लिए मार्ग जाता है। यहां तुंगभद्रा नदी (पम्पा) धनुष के आकार में बहती है। तुंगभद्रा नदी में पौराणिक चक्रतीर्थ माना गया है। पास ही पहाड़ी के नीचे श्रीराम मंदिर है। पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ माना जाता है। इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था।

13. कोडीकरई: - हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े। मलय पर्वत, चंदन वन, अनेक नदियों, झरनों तथा वन-वाटिकाओं को पार करके राम और उनकी सेना ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया। श्रीराम ने पहले अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित किया।

तमिलनाडु की एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्‍तारित है। कोडीकरई समुद्र तट वेलांकनी के दक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में पाल्‍क स्‍ट्रेट से घिरा हुआ है।

लेकिन राम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र को पार नहीं किया जा सकता और यह स्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तब श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया।

14.रामेश्‍वरम: - रामेश्‍वरम समुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंग के लिए आदर्श है। रामेश्‍वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है।

15.धनुषकोडी: : - वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करने का फैसला लिया।

छेदुकराई तथा रामेश्वरम के इर्द-गिर्द इस घटना से संबंधित अनेक स्मृतिचिह्न अभी भी मौजूद हैं। नाविक रामेश्वरम में धनुषकोडी नामक स्थान से यात्रियों को रामसेतु के अवशेषों को दिखाने ले जाते हैं।

धनुषकोडी भारत के तमिलनाडु राज्‍य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्‍नार से करीब 18 मील पश्‍चिम में है।

इसका नाम धनुषकोडी इसलिए है कि यहां से श्रीलंका तक वानर सेना के माध्यम से नल और नील ने जो पुल (रामसेतु) बनाया था उसका आकार मार्ग धनुष के समान ही है। इन पूरे इलाकों को मन्नार समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है। धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्‍थलीय सीमा है, जहां समुद्र नदी की गहराई जितना है जिसमें कहीं-कहीं भूमि नजर आती है।

दरअसल, यहां एक पुल डूबा पड़ा है। 1860 में इसकी स्पष्ट पहचान हुई और इसे हटाने के कई प्रयास किए गए। अंग्रेज इसे एडम ब्रिज कहने लगे तो स्थानीय लोगों में भी यह नाम प्रचलित हो गया। अंग्रेजों ने कभी इस पुल को क्षतिग्रस्त नहीं किया लेकिन आजाद भारत में पहले रेल ट्रैक निर्माण के चक्कर में बाद में बंदरगाह बनाने के चलते इस पुल को क्षतिग्रस्त किया गया।

30मील लंबा और सवा मील चौड़ा यह रामसेतु 5 से 30 फुट तक पानी में डूबा है। श्रीलंका सरकार इस डूबे हुए पुल (पम्बन से मन्नार) के ऊपर भू-मार्ग का निर्माण कराना चाहती है जबकि भारत सरकार नौवहन हेतु उसे तोड़ना चाहती है। इस कार्य को भारत सरकार ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट का नाम दिया है। श्रीलंका के ऊर्जा मंत्री श्रीजयसूर्या ने इस डूबे हुए रामसेतु पर भारत और श्रीलंका के बीच भू-मार्ग का निर्माण कराने का प्रस्ताव रखा था।

16.’नुवारा एलिया’ पर्वत श्रृंखला: --वाल्मिकी रामायण अनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवारा एलिया’ पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है।

श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती है। आजकल भी इन स्थानों की भौगोलिक विशेषताएं, जीव, वनसतथा स्मारक आदि बिलकु हैं जैसे कि रामायण में वर्णित किए गए है...

साभार 🙏🙏

#alone

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I am not good with numbers but
every number dives into 90 degrees
when it comes to you. you're
Andromeda to my earth and I've
to travel

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51 y

 

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"Gay😜 G-Gauko A-Auta Y-Youth😂"

Gay😜




  G-Gauko 
A-Auta  
     Y-Youth😂

Hero

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"Dear Life, Jiwnu ko lagi k grnu prne,,2020 ma chai auta list banai dewla,, 😝😝"

Dear Life, Jiwnu ko lagi k grnu prne,,2020 ma chai auta list banai dewla,,
😝😝

Life

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"Dear Life, Jiwnu ko lagi k grnu prne,,2020 ma chai auta list banai dewla,, 😝😝"

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Life

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"Today One years completed on Nojoto with 9.5K love 10.2K views 800 follwers 480 story"

Today One years completed 
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9.5K love 
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#thanksnojoto

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"timro jibn sagr ma m auta tuteko nau trino sokino tra gohirai ma xu ma 😌😌"

timro jibn sagr ma m auta tuteko nau 
 trino sokino tra gohirai ma xu ma 
😌😌

😌
#Star

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"Post #480 मेरा सारा टायम टेबल बदल देती है.. उसकी मीठी मीठी सी दो बातों.. #Teremerejazbaat Harpinder Singh"

Post #480

मेरा सारा टायम टेबल बदल देती है.. 

उसकी मीठी मीठी सी दो बातों..

#Teremerejazbaat



                                             Harpinder Singh

#dawn

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"'' "I just want to hug you, but your are 480 some miles away, what I wouldn't do for a hug." '' #mr_bond"

'' "I just want to hug you, but your are 480 some miles away, what I wouldn't do for a hug." ''  






#mr_bond

#mohabbat #Mr_bond
I just want
@Mudassir Hussain @sona singh @Mohsin Ansari @@zain_single @Sana Shaikh

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"you're 29th February inserted in calender after a gap of 4 years, and I've to wait for 1462 days and 33, 684, 480 breathes to integrate with you again ."

you're 29th February inserted in 
calender after a gap of 4 years, 
and I've to wait for 1462 days and 
33, 684, 480 breathes to integrate 
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I am not good with numbers but
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when it comes to you. you're
Andromeda to my earth and I've
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"Timro 👉akhama👀akha👁judai vannu🗣xa auta☝kura timi👉bina adha xu mo👨timro👉👸sath 💑paye hunxu pura👫💖"

Timro 👉akhama👀akha👁judai
vannu🗣xa auta☝kura
timi👉bina adha xu mo👨timro👉👸sath 💑paye hunxu pura👫💖

Nepali sairy

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"me jaan puspa kuvar aaj me puri doniya ko kerahu ki vo meri patni he aur auske gar valo ko kerahu puspa kar ko me 20 din aus gar se auta kar lekar jahuga kis me takat rokar dika dena"

me jaan puspa kuvar aaj me puri doniya ko kerahu ki vo meri patni he aur auske gar valo ko kerahu puspa kar ko me 20 din aus gar se auta kar lekar jahuga kis me takat rokar dika dena

 

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"AutA NeHeD Sa HoNe LaGe HamaD LikNa BatA SaRa LafaZ Ta QuRaMat SeeDi BatT DamaG itNa Chala MaTT ( JJ ) Tuja MardaGe TeRi NaDamAt ( JJ ) BaNaWaT Khakhee SajAwaT PuRe RaTT zaYa aB HaTo ko HilA MTT"

AutA NeHeD Sa HoNe LaGe HamaD 
LikNa BatA SaRa LafaZ Ta QuRaMat
SeeDi BatT DamaG itNa Chala MaTT
( JJ ) Tuja MardaGe TeRi NaDamAt
( JJ ) BaNaWaT Khakhee SajAwaT
PuRe RaTT zaYa aB HaTo ko HilA MTT

#MAYA007

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"I love you i love you i love you janu Timi bina mo bachnu kasari timi bina ko jiban sakne chuina suchna timi ni mero jiban ko sahara hou timi nai mero auta kinara hou I love my baby manju"

I love you i love you i love you janu Timi bina mo  bachnu  kasari timi bina  ko  jiban  sakne chuina  suchna  timi ni  mero  jiban  ko  sahara  hou timi nai  mero  auta  kinara  hou  I love my baby manju

hi guys

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"सैय्यदउल मुरसलीन कासिम ए रिज्कअल्लाह आकाओं मौला हुज़ूर रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो तबारक वा ताआला अलैहि वसल्लमﷺ और सैय्यदना हजरतें ईसा अलैहिस्सलाम बरोज यौमे क़यामत एक ही क़बर मुबारका से बाहर तशरीफ लाएंगे। {हवाला:मिशकात शरीफ जिल्द:02 सफाह: 480} {हवाला:अल तहकीक ए ग़ज़ाली मुस्ताफाई} ❖┈═══════════┈❖"

सैय्यदउल मुरसलीन कासिम ए रिज्कअल्लाह आकाओं मौला हुज़ूर रसूलअल्लाह सल्लल्लाहो तबारक वा ताआला अलैहि वसल्लमﷺ और सैय्यदना हजरतें ईसा अलैहिस्सलाम बरोज यौमे क़यामत एक ही क़बर मुबारका से बाहर तशरीफ लाएंगे।

{हवाला:मिशकात शरीफ जिल्द:02 सफाह: 480}
{हवाला:अल तहकीक ए ग़ज़ाली मुस्ताफाई}
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"कहानी :-  16(14) हिन्दी ✍️ रोशन कुमार झा 🇮🇳 कहानी :- 1(01) हिन्दी ✍️ रोशन कुमार झा 🇮🇳 सुरेन्द्रनाथ इवनिंग कॉलेज , कोलकाता  02-05-2020 शनिवार 19:15 मो:-6290640716 রোশন কুমার ঝা, Roshan Kumar Jha यह हमारे द्वारा हम पर लिखी हुई प्रथम कहानी है ! नाटक भी 2 तारीख को ही लिखें रहें 02-10-2018 मंगलवार :- 8(01) -: ग़लत नहीं, ग़लत होने की कारण !:- बात है कुमारपाड़ापुर की झील रोड की , बंगाराम, तोताराम,अंतिमराम, तीनों भाई में से बंगाराम बड़े थे, तीनों संग- संग स्कूल आया-जाया करते थे, बंगाराम आठवीं , तोताराम सातवीं और अंतिमराम दूसरी कक्षा में पढ़ते थे, बंगाराम बड़े शांत स्वभाव के थे , जब बंगाराम आठवीं कक्षा पास कर लिए, तब बंगाराम के सामने एक संकट छा गया, बंगाराम जिस नेहरू जी के स्कूल में पढ़ते थे ,वह विद्यालय आठवीं तक ही था ,बंगाराम नौवीं कक्षा में नामांकन करवाने के काफी कोशिश किया ,पर सब व्यर्थ गया, कोई भी स्कूल के नवीं कक्षा में सीट ही नहीं थी , या और कारण रहा होगा, इसके नामांकन के लिए मात-पिता भी परेशान रहते थे , अंत में पिता किसी से कह सुनकर नामांकन नवीं में न करवाकर पुनः आठवीं में हावड़ा हिन्दी हाई स्कूल में करवां दिये, वह विद्यालय बारहवीं तक रहा, पर फिर से आठवीं में नामांकन करवाने के कारण बंगाराम गलत रास्ते पर चलने लगते हैं, वह दिन- रात सोचने लगता है , सोचता है पढ़ाई लिखाई करूं , या न करूं ,बंगाराम धार्मिक,विक्रम बजरंगी हनुमान व मां सरस्वती जी के पूजा पाठ बचपना से ही करते थे ,अंत में वे ईश्वर से प्रार्थना किये , हे ! भगवान तूने ये क्या किया, मेरे साथ पढ़े सहपाठी आगे हम फिर से आठवीं में पढ़ूं हमसे नहीं होगा , वह यह निर्णय लेकर ग़लत रास्ते पर चलने लगा , वह घर से निकलता विद्यालय के लिए पर विद्यालय जाता नहीं, वह ट्रेन से इधर-उधर घूमने लगा था, कैसे न घूमता , विद्यार्थियों का तो रेल का टिकट लगता ही नहीं था, इसके बारे में उसके माता-पिता को पता भी नहीं चलता था, क्योंकि वह स्कूल के समयानुसार ही आया-जाया करता था ,पर एक दिन उसका गांव का प्रकाश- रोशन भईया देख लिया, रेलवे स्टेशन पर ! , पर उससे कुछ न कहा, वह सीधे उसके पिता के पास फोन किया, बोला चाचा बंगाराम को आज घूमते हुए देखें है स्टेशन पर, फिर क्या रात में पिता के दफ़्तर से आते ही , पिता से पहले ही सारी बातें बता दिया, क्योंकि अपने गांव वाला को स्टेशन पर वह भी देखा रहा , और कहा पापा हम पांच महीने में सिर्फ पन्द्रह ही दिन स्कूल गये होंगे, पिताजी अब हममें हिम्मत नहीं है कि फिर से आठवीं की पढ़ाई करूं, तब ही मां बोली बेटा तुम तो जानते ही हो तुम भी और पिता भी तुम्हारे नौवीं कक्षा में नामांकन करवाने के लिए भरपूर कोशिश किया ,पर हुआ नहीं न, क्या करोगें बेटा एक साल की बात है पांच महीने बीत ही गये अच्छा से पढ़ाई कर लो मजबूत हो जाओगे ! उसी वक्त बंगाराम बोलने लगा , मां आप समझती नहीं हों , आप एक साल कह दिये , यहां लोग एक दिन ज़्यादा या कम होने के कारण सरकारी नौकरी के फॉर्म नहीं भर पाते हैं और आप एक साल कहती हैं , पापा - पापा मेरे पास एक सुझाव है, यदि आप चाहें तो मेरा नामांकन नौवीं कक्षा में हो जायेगा, पिता वह कैसे अभी तो सितंबर हो गया, अभी नामांकन होता है क्या , कहां होता है कहो मैं जरूर पूरा करूंगा ! पापा एक स्कूल हैं , जिसमें मेरा नामांकन नौवीं में हो जायेगा , पर वह प्राईवेट है , तब ही पिता कहा कहो बेटा हम कैसे तुम्हें प्राईवेट में पढ़ा सकते , प्राईवेट स्कूल की फीस हर महीने सात-आठ सौ रुपया कहां से दें पायेंगे, बोलो बेटा पापा सिर्फ एक बार आप कष्ट करिए, सिर्फ एडमिशन के लिए पच्चीस सौ रुपये दे दीजिए, उसके बाद आप जो हमें ट्यूशन पढ़ाते हैं , अब से ट्यूशन नहीं पढ़ेंगे और उसी ट्यूशन के पैसों से स्कूल के फीस भरेंगे, इस प्राईवेट स्कूल की ज्यादा फीस नहीं है , जैसा कहें पापा आप ,फिर क्या पिता ब्याज पर लाकर पैसे दे दिया , और बंगाराम का नामांकन नौवीं कक्षा में हो गया ,जब बंगाराम के बारे में ट्यूशन के सर को पता चला , तो बंगाराम को बुलाया और कहें तुम ट्यूशन पढ़ने आओगे , और चाहो तो तुम्हें हम अपने ट्यूशन के कुछ बच्चों को पढ़ाने के लिए देते हैं, जिससे तुम अपने विद्यालय के फीस भर पाओगे ! इस तरह फिर बंगाराम सही रास्ते पर आ गया, दिन-रात मेहनत करने लगा, और अपने मंजिल के तरफ बढ़ने लगा ! शिक्षा :- कोई इंसान ग़लत नहीं होता हैं , ग़लत बनने का कुछ न कुछ कारण होता है, और वही कारण उसे गलत दिशा में ले जाकर गलत बना देता है ! अतः बिना जाने किसी को ग़लत कहना उचित नहीं है ! पहले कारण जानना चाहिए वह कैसे ग़लत हुआ , हुआ तो उसे कैसे सही रास्ते पर लाया जाये ! 🙏 धन्यवाद ! 💐🌹 ® ✍️ रोशन कुमार झा 🇮🇳 सुरेन्द्रनाथ इवनिंग कॉलेज , कोलकाता  02-05-2020 शनिवार 19:15 मो:-6290640716 রোশন কুমার ঝা, Roshan Kumar Jha यह हमारे द्वारा हम पर लिखी हुई प्रथम कहानी है ! नाटक भी 2 तारीख को ही लिखें रहें 02-10-2018 मंगलवार :- 8(01) http://roshanjha9997.blogspot.com/2020/05/1613.html कलम लाइव पत्रिका में भेजें ! :-15(04) रचनाकार, :-14(87) सृजन में  Hi Roshan Kumar Jha, Thank you for registering for "बुंदेलखंड विश्वविद्यालय की राष्ट्रीय सेवा योजना द्वारा कोविड़ 19 के जागरूकता हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम". Please submit any questions to: munnagkp01@rediffmail.com Date Time: May 2, 2020 12:00 PM India Join from a PC, Mac, iPad, iPhone or Android device: Click Here to Join Note: This link should not be shared with others; it is unique to you. 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कहानी :-  16(14) हिन्दी ✍️ रोशन कुमार झा 🇮🇳
कहानी :- 1(01) हिन्दी 

 ✍️ रोशन कुमार झा 🇮🇳
सुरेन्द्रनाथ इवनिंग कॉलेज , कोलकाता 
02-05-2020 शनिवार 19:15 मो:-6290640716
রোশন কুমার ঝা, Roshan Kumar Jha
यह हमारे द्वारा हम पर लिखी हुई प्रथम कहानी है !
नाटक भी 2 तारीख को ही लिखें रहें 
02-10-2018 मंगलवार :- 8(01)

-:  ग़लत नहीं, ग़लत होने की कारण !:-

बात है कुमारपाड़ापुर की झील रोड की ,
बंगाराम, तोताराम,अंतिमराम, तीनों
भाई में से बंगाराम बड़े थे, तीनों संग- संग स्कूल 
आया-जाया करते थे, बंगाराम आठवीं , 
तोताराम सातवीं और अंतिमराम दूसरी कक्षा में 
पढ़ते थे, बंगाराम बड़े शांत स्वभाव के थे ,
जब बंगाराम आठवीं कक्षा पास कर लिए, तब 
बंगाराम के सामने एक संकट छा गया, बंगाराम 
जिस नेहरू जी के स्कूल में पढ़ते थे ,वह विद्यालय 
आठवीं तक ही था ,बंगाराम नौवीं कक्षा में नामांकन 
करवाने के काफी कोशिश किया ,पर सब व्यर्थ गया, 
कोई भी स्कूल के नवीं कक्षा में सीट ही नहीं थी , या 
और कारण रहा होगा, इसके नामांकन के लिए 
मात-पिता भी परेशान रहते थे , अंत में पिता किसी 
से कह सुनकर नामांकन नवीं में न करवाकर पुनः 
आठवीं में हावड़ा हिन्दी हाई स्कूल में 
करवां दिये, वह विद्यालय बारहवीं तक रहा,
पर फिर से आठवीं में नामांकन करवाने के कारण
बंगाराम गलत रास्ते पर चलने लगते हैं, वह दिन- रात 
सोचने लगता है , सोचता है पढ़ाई लिखाई करूं , 
या न करूं ,बंगाराम धार्मिक,विक्रम बजरंगी 
हनुमान व मां सरस्वती जी के पूजा पाठ बचपना 
से ही करते थे ,अंत में वे ईश्वर से प्रार्थना किये ,
हे ! भगवान तूने ये क्या किया, मेरे साथ पढ़े सहपाठी 
आगे हम फिर से आठवीं में पढ़ूं हमसे नहीं होगा , 
वह यह निर्णय लेकर ग़लत रास्ते पर चलने लगा ,
वह घर से  निकलता विद्यालय के लिए पर विद्यालय 
जाता नहीं, वह ट्रेन से इधर-उधर घूमने लगा था,
कैसे न घूमता , विद्यार्थियों का तो रेल का टिकट 
लगता ही नहीं था, इसके बारे में उसके माता-पिता 
को पता भी नहीं चलता था, क्योंकि वह स्कूल 
के समयानुसार ही आया-जाया करता था ,पर एक 
दिन उसका गांव का प्रकाश- रोशन भईया देख लिया, 
रेलवे स्टेशन पर ! , पर उससे कुछ न कहा,
वह सीधे उसके पिता के पास फोन किया, बोला 
चाचा बंगाराम को आज घूमते हुए देखें है स्टेशन पर, 
फिर क्या रात में पिता के दफ़्तर से आते ही , पिता से 
पहले ही सारी बातें बता दिया, क्योंकि अपने गांव 
वाला को स्टेशन पर वह भी देखा रहा , और कहा 
पापा हम पांच महीने में सिर्फ पन्द्रह ही दिन स्कूल 
गये होंगे, पिताजी अब हममें हिम्मत नहीं है कि 
फिर से आठवीं की पढ़ाई करूं, तब ही मां बोली 
बेटा तुम तो जानते ही हो तुम भी और पिता भी 
तुम्हारे नौवीं कक्षा में नामांकन करवाने के लिए 
भरपूर कोशिश किया ,पर हुआ नहीं न,
क्या करोगें बेटा एक साल की बात है पांच 
महीने बीत ही गये अच्छा से पढ़ाई कर लो मजबूत हो जाओगे ! उसी वक्त बंगाराम बोलने लगा , मां 
आप समझती नहीं हों , आप एक साल कह दिये , 
यहां लोग एक दिन ज़्यादा या कम होने के कारण 
सरकारी नौकरी के फॉर्म नहीं भर पाते हैं और आप 
एक साल कहती हैं , पापा - पापा मेरे पास एक 
सुझाव है, यदि आप चाहें तो मेरा नामांकन नौवीं 
कक्षा में हो जायेगा,
पिता वह कैसे अभी तो सितंबर हो गया, अभी 
नामांकन होता है क्या , कहां होता है कहो मैं जरूर 
पूरा करूंगा ! पापा एक स्कूल हैं , जिसमें मेरा 
नामांकन नौवीं में हो जायेगा , पर वह प्राईवेट है ,
तब ही पिता कहा कहो बेटा हम कैसे तुम्हें प्राईवेट 
में पढ़ा सकते , प्राईवेट स्कूल की फीस हर महीने 
सात-आठ सौ रुपया कहां से दें पायेंगे,  बोलो बेटा 
पापा सिर्फ एक बार आप कष्ट करिए, सिर्फ एडमिशन 
के लिए पच्चीस सौ रुपये दे दीजिए, उसके बाद आप 
जो हमें ट्यूशन पढ़ाते हैं , अब से  ट्यूशन नहीं पढ़ेंगे 
और उसी ट्यूशन के पैसों से स्कूल के फीस भरेंगे, 
इस प्राईवेट स्कूल की ज्यादा फीस नहीं है , जैसा 
कहें पापा आप ,फिर क्या पिता ब्याज पर लाकर 
पैसे दे दिया , और बंगाराम का नामांकन नौवीं कक्षा 
में हो गया ,जब बंगाराम के बारे में ट्यूशन के सर 
को पता चला , तो बंगाराम को बुलाया और कहें 
तुम ट्यूशन पढ़ने आओगे , और चाहो तो तुम्हें हम 
अपने  ट्यूशन के कुछ बच्चों को पढ़ाने के लिए देते हैं,
जिससे तुम अपने विद्यालय के फीस भर पाओगे !
इस तरह फिर बंगाराम सही रास्ते पर आ गया, 
दिन-रात मेहनत करने लगा, और अपने मंजिल
के तरफ बढ़ने लगा !

शिक्षा :- कोई इंसान ग़लत नहीं होता हैं , ग़लत बनने 
का कुछ न कुछ कारण होता है, और वही कारण 
उसे गलत दिशा में ले जाकर गलत बना देता है !
अतः बिना जाने किसी को ग़लत कहना उचित नहीं है !
पहले कारण जानना चाहिए वह कैसे ग़लत हुआ ,
हुआ तो उसे कैसे सही रास्ते पर लाया जाये !

                  🙏 धन्यवाद ! 💐🌹

® ✍️ रोशन कुमार झा 🇮🇳
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রোশন কুমার ঝা, Roshan Kumar Jha
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नाटक भी 2 तारीख को ही लिखें रहें 
02-10-2018 मंगलवार :- 8(01)
http://roshanjha9997.blogspot.com/2020/05/1613.html
कलम लाइव पत्रिका में भेजें ! 
:-15(04) रचनाकार, :-14(87) सृजन में 
 Hi Roshan Kumar Jha,
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Webinar ID: 981 1313 9253
International numbers available: https://unicef.zoom.us/u/acFBoWc7Nv
Or an H.323/SIP room system:H.323:
162.255.37.11 (US West)
162.255.36.11 (US East)
221.122.88.195 (China)
115.114.131.7 (India Mumbai)
115.114.115.7 (India Hyderabad)
213.19.144.110 (EMEA)
103.122.166.55 (Australia)
209.9.211.110 (Hong Kong China)
64.211.144.160 (Brazil)
69.174.57.160 (Canada)
207.226.132.110 (Japan)
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-:  चाह रहा फूल की, कली भी मिला नहीं  !:-
02-05-2020 शनिवार 00:01 मो:-6290640716
दोहा :-कलम लाइव पत्रिका
http://roshanjha9997.blogspot.com/2020/04/blog-post_29.html 
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रोशन कुमार झा 
(1) 
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(2) रचनाकार :-
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(3) अमर उजाला :-
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(5) भोजपुरी 
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(6) जीवनी :-
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(7)
नाटक :- https://kalamlive.blogspot.com/2020/05/blog-post.html
दोहा :-
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#टोडाभीम (नरेन्द्र कुमार जांगिड) टोडाभीम कस्बे के नया बस स्टैंड स्थित आदर्श विद्या मंदिर में सुभाष जयंती पर पथ संचलन का आयोजन किया गया l वि

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"चौदह वर्ष के वनवास के दौरान श्रीराम कहाँ कहाँ रहे? प्रभु श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम ने कई ऋषि-मुनियों से शिक्षा और विद्या ग्रहण की, संपूर्ण भारत को उन्होंने एक ही विचारधारा के सूत्र में बांधा, लेकिन इस दौरान उनके साथ कुछ ऐसा भी घटा जिसने उनके जीवन को बदल कर रख दिया। जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं, जहां श्रीराम और सीता रुके या रहे थे। वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदि स्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की। आओ जानते हैं कुछ प्रमुख स्थानों के बारे में; 1. श्रृंगवेरपुर: - राम को जब वनवास हुआ तो वाल्मीकि रामायण और शोधकर्ताओं के अनुसार वे सबसे पहले तमसा नदी पहुंचे, जो अयोध्या से 20 किमी दूर है। इसके बाद उन्होंने गोमती नदी पार की और प्रयागराज (इलाहाबाद) से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था। 2. सिंगरौर: - इलाहाबाद से लगभग 35.2 किमी उत्तर-पश्चिम की ओर स्थित ‘सिंगरौर’ नामक स्थान ही प्राचीन समय में श्रृंगवेरपुर नाम से परिज्ञात था। रामायण में इस नगर का उल्लेख आता है। यह नगर गंगा घाटी के तट पर स्थित था। महाभारत में इसे ‘तीर्थस्थल’ कहा गया है। 3. कुरई: - इलाहाबाद जिले में ही कुरई नामक एक स्थान है, जो सिंगरौर के निकट गंगा नदी के तट पर स्थित है। गंगा के उस पार सिंगरौर तो इस पार कुरई। सिंगरौर में गंगा पार करने के पश्चात श्रीराम इसी स्थान पर उतरे थे। इस ग्राम में एक छोटा-सा मंदिर है, जो स्थानीय लोकश्रुति के अनुसार उसी स्थान पर है, जहां गंगा को पार करने के पश्चात राम, लक्ष्मण और सीताजी ने कुछ देर विश्राम किया था। 4. चित्रकूट के घाट पर: - कुरई से आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे। प्रयाग को वर्तमान में इलाहाबाद कहा जाता है। यहां गंगा-जमुना का संगम स्थल है। हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा तीर्थस्थान है। प्रभु श्रीराम ने संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। यहां स्थित स्मारकों में शामिल हैं, वाल्मीकि आश्रम, मांडव्य आश्रम, भरतकूप इत्यादि। चित्रकूट में श्रीराम के दुर्लभ प्रमाण,,चित्रकूट वह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं। तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं। 5. अत्रि ऋषि का आश्रम: - चित्रकूट के पास ही सतना मध्यप्रदेश स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। वहां श्रीराम ने कुछ वक्त बिताया। अत्रि के आश्रम के आस-पास राक्षसों का समूह रहता था। अत्रि, उनके भक्तगण व माता अनुसूइया उन राक्षसों से भयभीत रहते थे। भगवान श्रीराम ने उन राक्षसों का वध किया। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में इसका वर्णन मिलता है। प्रातःकाल जब राम आश्रम से विदा होने लगे तो अत्रि ऋषि उन्हें विदा करते हुए बोले, ‘हे राघव! इन वनों में भयंकर राक्षस तथा सर्प निवास करते हैं, जो मनुष्यों को नाना प्रकार के कष्ट देते हैं। इनके कारण अनेक तपस्वियों को असमय ही काल का ग्रास बनना पड़ा है। मैं चाहता हूं, तुम इनका विनाश करके तपस्वियों की रक्षा करो।’ राम ने महर्षि की आज्ञा को शिरोधार्य कर उपद्रवी राक्षसों तथा मनुष्य का प्राणांत करने वाले भयानक सर्पों को नष्ट करने का वचन देखर सीता तथा लक्ष्मण के साथ आगे के लिए प्रस्थान किया। 6. दंडकारण्य: - अत्रि ऋषि के आश्रम में कुछ दिन रुकने के बाद श्रीराम ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों को अपना आश्रय स्थल बनाया। यह जंगल क्षेत्र था दंडकारण्य। ‘अत्रि-आश्रम’ से ‘दंडकारण्य’ आरंभ हो जाता है। छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों पर राम के नाना और कुछ पर बाणासुर का राज्य था। यहां के नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवं गुफाओं में राम के रहने के सबूतों की भरमार है। यहीं पर राम ने अपना वनवास काटा था। यहां वे लगभग 10 वर्षों से भी अधिक समय तक रहे थे। ‘अत्रि-आश्रम’ से भगवान राम मध्यप्रदेश के सतना पहुंचे, जहां ‘रामवन’ हैं। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्रों में नर्मदा व महानदी नदियों के किनारे 10 वर्षों तक उन्होंने कई ऋषि आश्रमों का भ्रमण किया। दंडकारण्य क्षेत्र तथा सतना के आगे वे विराध सरभंग एवं सुतीक्ष्ण मुनि आश्रमों में गए। बाद में सतीक्ष्ण आश्रम वापस आए। पन्ना, रायपुर, बस्तर और जगदलपुर में कई स्मारक विद्यमान हैं। उदाहरणत: मांडव्य आश्रम, श्रृंगी आश्रम, राम-लक्ष्मण मंदिर आदि। शहडोल (अमरकंटक): - राम वहां से आधुनिक जबलपुर, शहडोल (अमरकंटक) गए होंगे। शहडोल से पूर्वोत्तर की ओर सरगुजा क्षेत्र है। यहां एक पर्वत का नाम ‘रामगढ़’ है। 30 फीट की ऊंचाई से एक झरना जिस कुंड में गिरता है, उसे ‘सीता कुंड’ कहा जाता है। यहां वशिष्ठ गुफा है। दो गुफाओं के नाम ‘लक्ष्मण बोंगरा’ और ‘सीता बोंगरा’ हैं। शहडोल से दक्षिण-पूर्व की ओर बिलासपुर के आसपास छत्तीसगढ़ है। वर्तमान में करीब 92,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस इलाके के पश्चिम में अबूझमाड़ पहाड़ियां तथा पूर्व में इसकी सीमा पर पूर्वी घाट शामिल हैं। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के हिस्से शामिल हैं। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक करीब 320 किमी तथा पूर्व से पश्चिम तक लगभग 480 किलोमीटर है। यह क्षेत्र आजकल दंतेवाड़ा के नाम से जाना जाता है। यहां वर्तमान में गोंड जाति निवास करती है तथा समूचा दंडकारण्य अब नक्सलवाद की चपेट में है। इसी दंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदी के तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे। स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि दुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है। दंडकारण्य क्षे‍त्र की चर्चा पुराणों में विस्तार से मिलती है। इस क्षेत्र की उत्पत्ति कथा महर्षि अगस्त्य मुनि से जुड़ी हुई है। यहीं पर उनका महाराष्ट्र के नासिक के अलावा एक आश्रम था। 7. पंचवटी, नासिक: - दण्डकारण्य में मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम कई नदियों, तालाबों, पर्वतों और वनों को पार करने के पश्चात नासिक में अगस्त्य मुनि के आश्रम गए। मुनि का आश्रम नासिक के पंचवटी क्षेत्र में था। त्रेतायुग में लक्ष्मण व सीता सहित श्रीरामजी ने वनवास का कुछ समय यहां बिताया। उस काल में पंचवटी जनस्थान या दंडक वन के अंतर्गत आता था। पंचवटी या नासिक से गोदावरी का उद्गम स्थान त्र्यंम्बकेश्वर लगभग 32 किमी दूर है। वर्तमान में पंचवटी भारत के महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के किनारे स्थित विख्यात धार्मिक तीर्थस्थान है। अगस्त्य मुनि ने श्रीराम को अग्निशाला में बनाए गए शस्त्र भेंट किए। नासिक में श्रीराम पंचवटी में रहे और गोदावरी के तट पर स्नान-ध्यान किया। नासिक में गोदावरी के तट पर पांच वृक्षों का स्थान पंचवटी कहा जाता है। ये पांच वृक्ष थे- पीपल, बरगद, आंवला, बेल तथा अशोक वट। यहीं पर सीता माता की गुफा के पास पांच प्राचीन वृक्ष हैं जिन्हें पंचवट के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इन वृक्षों को राम-सीमा और लक्ष्मण ने अपने हाथों से लगाया था। यहीं पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। राम-लक्ष्मण ने खर व दूषण के साथ युद्ध किया था। यहां पर मारीच वध स्थल का स्मारक भी अस्तित्व में है। नासिक क्षेत्र स्मारकों से भरा पड़ा है, जैसे कि सीता सरोवर, राम कुंड, त्र्यम्बकेश्वर आदि। यहां श्रीराम का बनाया हुआ एक मंदिर खंडहर रूप में विद्यमान है। मरीच का वध पंचवटी के निकट ही मृगव्याधेश्वर में हुआ था। गिद्धराज जटायु से श्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड में पंचवटी का मनोहर वर्णन मिलता है। 8. सीताहरण का स्थान सर्वतीर्थ: - नासिक क्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण ने सीता का हरण किया और जटायु का भी वध किया जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूर ताकेड गांव में ‘सर्वतीर्थ’ नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है। जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पर हुई, जो नासिक जिले के इगतपुरी तहसील के ताकेड गांव में मौजूद है। इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया, क्योंकि यहीं पर मरणासन्न जटायु ने सीता माता के बारे में बताया। रामजी ने यहां जटायु का अंतिम संस्कार करके पिता और जटायु का श्राद्ध-तर्पण किया था। इसी तीर्थ पर लक्ष्मण रेखा थी। 9.पर्णशाला, भद्राचलम: - पर्णशाला आंध्रप्रदेश में खम्माम जिले के भद्राचलम में स्थित है। रामालय से लगभग 1 घंटे की दूरी पर स्थित पर्णशाला को ‘पनशाला’ या ‘पनसाला’ भी कहते हैं। हिन्दुओं के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से यह एक है। पर्णशाला गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां से सीताजी का हरण हुआ था। हालांकि कुछ मानते हैं कि इस स्थान पर रावण ने अपना विमान उतारा था। इस स्थल से ही रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बिठाया था यानी सीताजी ने धरती यहां छोड़ी थी। इसी से वास्तविक हरण का स्थल यह माना जाता है। यहां पर राम-सीता का प्राचीन मंदिर है। 10. सीता की खोज तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र: - सर्वतीर्थ जहां जटायु का वध हुआ था, वह स्थान सीता की खोज का प्रथम स्थान था। उसके बाद श्रीराम-लक्ष्मण तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंच गए। तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वे सीता की खोज में गए। 11. शबरी का आश्रम पम्पा सरोवर: - तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्‍मण चले सीता की खोज में। जटायु और कबंध से मिलने के पश्‍चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकल केरल में स्थित है। पम्पा नदी भारत के केरल राज्य की तीसरी सबसे बड़ी नदी है। इसे ‘पम्बा’ नाम से भी जाना जाता है। ‘पम्पा’ तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। श्रावणकौर रजवाड़े की सबसे लंबी नदी है। इसी नदी के किनारे पर हम्पी बसा हुआ है। यह स्थान बेर के वृक्षों के लिए आज भी प्रसिद्ध है। पौराणिक ग्रंथ ‘रामायण’ में भी हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधा की राजधानी के तौर पर किया गया है। 12. हनुमान से भेंट: - मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा और श्रीराम ने बाली का वध किया। ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था। इसी पर्वत पर श्रीराम की हनुमान से भेंट हुई थी। बाद में हनुमान ने राम और सुग्रीव की भेंट करवाई, जो एक अटूट मित्रता बन गई। जब महाबली बाली अपने भाई सुग्रीव को मारकर किष्किंधा से भागा तो वह ऋष्यमूक पर्वत पर ही आकर छिपकर रहने लगा था। ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है। विरुपाक्ष मंदिर के पास से ऋष्यमूक पर्वत तक के लिए मार्ग जाता है। यहां तुंगभद्रा नदी (पम्पा) धनुष के आकार में बहती है। तुंगभद्रा नदी में पौराणिक चक्रतीर्थ माना गया है। पास ही पहाड़ी के नीचे श्रीराम मंदिर है। पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ माना जाता है। इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था। 13. कोडीकरई: - हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े। मलय पर्वत, चंदन वन, अनेक नदियों, झरनों तथा वन-वाटिकाओं को पार करके राम और उनकी सेना ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया। श्रीराम ने पहले अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित किया। तमिलनाडु की एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्‍तारित है। कोडीकरई समुद्र तट वेलांकनी के दक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में पाल्‍क स्‍ट्रेट से घिरा हुआ है। लेकिन राम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र को पार नहीं किया जा सकता और यह स्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तब श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया। 14.रामेश्‍वरम: - रामेश्‍वरम समुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंग के लिए आदर्श है। रामेश्‍वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है। 15.धनुषकोडी: : - वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करने का फैसला लिया। छेदुकराई तथा रामेश्वरम के इर्द-गिर्द इस घटना से संबंधित अनेक स्मृतिचिह्न अभी भी मौजूद हैं। नाविक रामेश्वरम में धनुषकोडी नामक स्थान से यात्रियों को रामसेतु के अवशेषों को दिखाने ले जाते हैं। धनुषकोडी भारत के तमिलनाडु राज्‍य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्‍नार से करीब 18 मील पश्‍चिम में है। इसका नाम धनुषकोडी इसलिए है कि यहां से श्रीलंका तक वानर सेना के माध्यम से नल और नील ने जो पुल (रामसेतु) बनाया था उसका आकार मार्ग धनुष के समान ही है। इन पूरे इलाकों को मन्नार समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है। धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्‍थलीय सीमा है, जहां समुद्र नदी की गहराई जितना है जिसमें कहीं-कहीं भूमि नजर आती है। दरअसल, यहां एक पुल डूबा पड़ा है। 1860 में इसकी स्पष्ट पहचान हुई और इसे हटाने के कई प्रयास किए गए। अंग्रेज इसे एडम ब्रिज कहने लगे तो स्थानीय लोगों में भी यह नाम प्रचलित हो गया। अंग्रेजों ने कभी इस पुल को क्षतिग्रस्त नहीं किया लेकिन आजाद भारत में पहले रेल ट्रैक निर्माण के चक्कर में बाद में बंदरगाह बनाने के चलते इस पुल को क्षतिग्रस्त किया गया। 30मील लंबा और सवा मील चौड़ा यह रामसेतु 5 से 30 फुट तक पानी में डूबा है। श्रीलंका सरकार इस डूबे हुए पुल (पम्बन से मन्नार) के ऊपर भू-मार्ग का निर्माण कराना चाहती है जबकि भारत सरकार नौवहन हेतु उसे तोड़ना चाहती है। इस कार्य को भारत सरकार ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट का नाम दिया है। श्रीलंका के ऊर्जा मंत्री श्रीजयसूर्या ने इस डूबे हुए रामसेतु पर भारत और श्रीलंका के बीच भू-मार्ग का निर्माण कराने का प्रस्ताव रखा था। 16.’नुवारा एलिया’ पर्वत श्रृंखला: --वाल्मिकी रामायण अनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवारा एलिया’ पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है। श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती है। आजकल भी इन स्थानों की भौगोलिक विशेषताएं, जीव, वनसतथा स्मारक आदि बिलकु हैं जैसे कि रामायण में वर्णित किए गए है... साभार 🙏🙏"

चौदह वर्ष के वनवास के दौरान श्रीराम कहाँ कहाँ रहे?

प्रभु श्रीराम को 14 वर्ष का वनवास हुआ। इस वनवास काल में श्रीराम ने कई ऋषि-मुनियों से शिक्षा और विद्या ग्रहण की, संपूर्ण भारत को उन्होंने एक ही विचारधारा के सूत्र में बांधा, लेकिन इस दौरान उनके साथ कुछ ऐसा भी घटा जिसने उनके जीवन को बदल कर रख दिया।

जाने-माने इतिहासकार और पुरातत्वशास्त्री अनुसंधानकर्ता डॉ. राम अवतार ने श्रीराम और सीता के जीवन की घटनाओं से जुड़े ऐसे 200 से भी अधिक स्थानों का पता लगाया है, जहां आज भी तत्संबंधी स्मारक स्थल विद्यमान हैं, जहां श्रीराम और सीता रुके या रहे थे। वहां के स्मारकों, भित्तिचित्रों, गुफाओं आदि स्थानों के समय-काल की जांच-पड़ताल वैज्ञानिक तरीकों से की। आओ जानते हैं कुछ प्रमुख स्थानों के बारे में;

1. श्रृंगवेरपुर: - राम को जब वनवास हुआ तो वाल्मीकि रामायण और शोधकर्ताओं के अनुसार वे सबसे पहले तमसा नदी पहुंचे, जो अयोध्या से 20 किमी दूर है। इसके बाद उन्होंने गोमती नदी पार की और प्रयागराज (इलाहाबाद) से 20-22 किलोमीटर दूर वे श्रृंगवेरपुर पहुंचे, जो निषादराज गुह का राज्य था। यहीं पर गंगा के तट पर उन्होंने केवट से गंगा पार करने को कहा था।

2. सिंगरौर: - इलाहाबाद से लगभग 35.2 किमी उत्तर-पश्चिम की ओर स्थित ‘सिंगरौर’ नामक स्थान ही प्राचीन समय में श्रृंगवेरपुर नाम से परिज्ञात था। रामायण में इस नगर का उल्लेख आता है। यह नगर गंगा घाटी के तट पर स्थित था। महाभारत में इसे ‘तीर्थस्थल’ कहा गया है।

3. कुरई: - इलाहाबाद जिले में ही कुरई नामक एक स्थान है, जो सिंगरौर के निकट गंगा नदी के तट पर स्थित है। गंगा के उस पार सिंगरौर तो इस पार कुरई। सिंगरौर में गंगा पार करने के पश्चात श्रीराम इसी स्थान पर उतरे थे।

इस ग्राम में एक छोटा-सा मंदिर है, जो स्थानीय लोकश्रुति के अनुसार उसी स्थान पर है, जहां गंगा को पार करने के पश्चात राम, लक्ष्मण और सीताजी ने कुछ देर विश्राम किया था।

4. चित्रकूट के घाट पर: - कुरई से आगे चलकर श्रीराम अपने भाई लक्ष्मण और पत्नी सहित प्रयाग पहुंचे थे। प्रयाग को वर्तमान में इलाहाबाद कहा जाता है। यहां गंगा-जमुना का संगम स्थल है। हिन्दुओं का यह सबसे बड़ा तीर्थस्थान है। प्रभु श्रीराम ने संगम के समीप यमुना नदी को पार किया और फिर पहुंच गए चित्रकूट। यहां स्थित स्मारकों में शामिल हैं, वाल्मीकि आश्रम, मांडव्य आश्रम, भरतकूप इत्यादि।

चित्रकूट में श्रीराम के दुर्लभ प्रमाण,,चित्रकूट वह स्थान है, जहां राम को मनाने के लिए भरत अपनी सेना के साथ पहुंचते हैं। तब जब दशरथ का देहांत हो जाता है। भारत यहां से राम की चरण पादुका ले जाकर उनकी चरण पादुका रखकर राज्य करते हैं।

5. अत्रि ऋषि का आश्रम: - चित्रकूट के पास ही सतना मध्यप्रदेश स्थित अत्रि ऋषि का आश्रम था। महर्षि अत्रि चित्रकूट के तपोवन में रहा करते थे। वहां श्रीराम ने कुछ वक्त बिताया।

अत्रि के आश्रम के आस-पास राक्षसों का समूह रहता था। अत्रि, उनके भक्तगण व माता अनुसूइया उन राक्षसों से भयभीत रहते थे। भगवान श्रीराम ने उन राक्षसों का वध किया। वाल्मीकि रामायण के अयोध्या कांड में इसका वर्णन मिलता है।

प्रातःकाल जब राम आश्रम से विदा होने लगे तो अत्रि ऋषि उन्हें विदा करते हुए बोले, ‘हे राघव! इन वनों में भयंकर राक्षस तथा सर्प निवास करते हैं, जो मनुष्यों को नाना प्रकार के कष्ट देते हैं। इनके कारण अनेक तपस्वियों को असमय ही काल का ग्रास बनना पड़ा है। मैं चाहता हूं, तुम इनका विनाश करके तपस्वियों की रक्षा करो।’

राम ने महर्षि की आज्ञा को शिरोधार्य कर उपद्रवी राक्षसों तथा मनुष्य का प्राणांत करने वाले भयानक सर्पों को नष्ट करने का वचन देखर सीता तथा लक्ष्मण के साथ आगे के लिए प्रस्थान किया।

6. दंडकारण्य: - अत्रि ऋषि के आश्रम में कुछ दिन रुकने के बाद श्रीराम ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों को अपना आश्रय स्थल बनाया। यह जंगल क्षेत्र था दंडकारण्य। ‘अत्रि-आश्रम’ से ‘दंडकारण्य’ आरंभ हो जाता है। छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों पर राम के नाना और कुछ पर बाणासुर का राज्य था। यहां के नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवं गुफाओं में राम के रहने के सबूतों की भरमार है। यहीं पर राम ने अपना वनवास काटा था। यहां वे लगभग 10 वर्षों से भी अधिक समय तक रहे थे।

‘अत्रि-आश्रम’ से भगवान राम मध्यप्रदेश के सतना पहुंचे, जहां ‘रामवन’ हैं। मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्रों में नर्मदा व महानदी नदियों के किनारे 10 वर्षों तक उन्होंने कई ऋषि आश्रमों का भ्रमण किया। दंडकारण्य क्षेत्र तथा सतना के आगे वे विराध सरभंग एवं सुतीक्ष्ण मुनि आश्रमों में गए। बाद में सतीक्ष्ण आश्रम वापस आए। पन्ना, रायपुर, बस्तर और जगदलपुर में कई स्मारक विद्यमान हैं। उदाहरणत: मांडव्य आश्रम, श्रृंगी आश्रम, राम-लक्ष्मण मंदिर आदि।

शहडोल (अमरकंटक): - राम वहां से आधुनिक जबलपुर, शहडोल (अमरकंटक) गए होंगे। शहडोल से पूर्वोत्तर की ओर सरगुजा क्षेत्र है। यहां एक पर्वत का नाम ‘रामगढ़’ है। 30 फीट की ऊंचाई से एक झरना जिस कुंड में गिरता है, उसे ‘सीता कुंड’ कहा जाता है। यहां वशिष्ठ गुफा है। दो गुफाओं के नाम ‘लक्ष्मण बोंगरा’ और ‘सीता बोंगरा’ हैं। शहडोल से दक्षिण-पूर्व की ओर बिलासपुर के आसपास छत्तीसगढ़ है।

वर्तमान में करीब 92,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस इलाके के पश्चिम में अबूझमाड़ पहाड़ियां तथा पूर्व में इसकी सीमा पर पूर्वी घाट शामिल हैं। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं आंध्रप्रदेश राज्यों के हिस्से शामिल हैं। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक करीब 320 किमी तथा पूर्व से पश्चिम तक लगभग 480 किलोमीटर है।

यह क्षेत्र आजकल दंतेवाड़ा के नाम से जाना जाता है। यहां वर्तमान में गोंड जाति निवास करती है तथा समूचा दंडकारण्य अब नक्सलवाद की चपेट में है।

इसी दंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदी के तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे।

स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि दुनियाभर में सिर्फ यहीं पर जटायु का एकमात्र मंदिर है।

दंडकारण्य क्षे‍त्र की चर्चा पुराणों में विस्तार से मिलती है। इस क्षेत्र की उत्पत्ति कथा महर्षि अगस्त्य मुनि से जुड़ी हुई है। यहीं पर उनका महाराष्ट्र के नासिक के अलावा एक आश्रम था।

7. पंचवटी, नासिक: - दण्डकारण्य में मुनियों के आश्रमों में रहने के बाद श्रीराम कई नदियों, तालाबों, पर्वतों और वनों को पार करने के पश्चात नासिक में अगस्त्य मुनि के आश्रम गए। मुनि का आश्रम नासिक के पंचवटी क्षेत्र में था। त्रेतायुग में लक्ष्मण व सीता सहित श्रीरामजी ने वनवास का कुछ समय यहां बिताया।

उस काल में पंचवटी जनस्थान या दंडक वन के अंतर्गत आता था। पंचवटी या नासिक से गोदावरी का उद्गम स्थान त्र्यंम्बकेश्वर लगभग 32 किमी दूर है। वर्तमान में पंचवटी भारत के महाराष्ट्र के नासिक में गोदावरी नदी के किनारे स्थित विख्यात धार्मिक तीर्थस्थान है।

अगस्त्य मुनि ने श्रीराम को अग्निशाला में बनाए गए शस्त्र भेंट किए। नासिक में श्रीराम पंचवटी में रहे और गोदावरी के तट पर स्नान-ध्यान किया। नासिक में गोदावरी के तट पर पांच वृक्षों का स्थान पंचवटी कहा जाता है। ये पांच वृक्ष थे- पीपल, बरगद, आंवला, बेल तथा अशोक वट। यहीं पर सीता माता की गुफा के पास पांच प्राचीन वृक्ष हैं जिन्हें पंचवट के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि इन वृक्षों को राम-सीमा और लक्ष्मण ने अपने हाथों से लगाया था।

यहीं पर लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काटी थी। राम-लक्ष्मण ने खर व दूषण के साथ युद्ध किया था। यहां पर मारीच वध स्थल का स्मारक भी अस्तित्व में है। नासिक क्षेत्र स्मारकों से भरा पड़ा है, जैसे कि सीता सरोवर, राम कुंड, त्र्यम्बकेश्वर आदि। यहां श्रीराम का बनाया हुआ एक मंदिर खंडहर रूप में विद्यमान है।

मरीच का वध पंचवटी के निकट ही मृगव्याधेश्वर में हुआ था। गिद्धराज जटायु से श्रीराम की मैत्री भी यहीं हुई थी। वाल्मीकि रामायण, अरण्यकांड में पंचवटी का मनोहर वर्णन मिलता है।

8. सीताहरण का स्थान सर्वतीर्थ: - नासिक क्षेत्र में शूर्पणखा, मारीच और खर व दूषण के वध के बाद ही रावण ने सीता का हरण किया और जटायु का भी वध किया जिसकी स्मृति नासिक से 56 किमी दूर ताकेड गांव में ‘सर्वतीर्थ’ नामक स्थान पर आज भी संरक्षित है।

जटायु की मृत्यु सर्वतीर्थ नाम के स्थान पर हुई, जो नासिक जिले के इगतपुरी तहसील के ताकेड गांव में मौजूद है। इस स्थान को सर्वतीर्थ इसलिए कहा गया, क्योंकि यहीं पर मरणासन्न जटायु ने सीता माता के बारे में बताया। रामजी ने यहां जटायु का अंतिम संस्कार करके पिता और जटायु का श्राद्ध-तर्पण किया था। इसी तीर्थ पर लक्ष्मण रेखा थी।

9.पर्णशाला, भद्राचलम: - पर्णशाला आंध्रप्रदेश में खम्माम जिले के भद्राचलम में स्थित है। रामालय से लगभग 1 घंटे की दूरी पर स्थित पर्णशाला को ‘पनशाला’ या ‘पनसाला’ भी कहते हैं। हिन्दुओं के प्रमुख धार्मिक स्थलों में से यह एक है। पर्णशाला गोदावरी नदी के तट पर स्थित है। मान्यता है कि यही वह स्थान है, जहां से सीताजी का हरण हुआ था। हालांकि कुछ मानते हैं कि इस स्थान पर रावण ने अपना विमान उतारा था।

इस स्थल से ही रावण ने सीता को पुष्पक विमान में बिठाया था यानी सीताजी ने धरती यहां छोड़ी थी। इसी से वास्तविक हरण का स्थल यह माना जाता है। यहां पर राम-सीता का प्राचीन मंदिर है।

10. सीता की खोज तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र: - सर्वतीर्थ जहां जटायु का वध हुआ था, वह स्थान सीता की खोज का प्रथम स्थान था। उसके बाद श्रीराम-लक्ष्मण तुंगभद्रा तथा कावेरी नदियों के क्षेत्र में पहुंच गए। तुंगभद्रा एवं कावेरी नदी क्षेत्रों के अनेक स्थलों पर वे सीता की खोज में गए।

11. शबरी का आश्रम पम्पा सरोवर: - तुंगभद्रा और कावेरी नदी को पार करते हुए राम और लक्ष्‍मण चले सीता की खोज में। जटायु और कबंध से मिलने के पश्‍चात वे ऋष्यमूक पर्वत पहुंचे। रास्ते में वे पम्पा नदी के पास शबरी आश्रम भी गए, जो आजकल केरल में स्थित है।

पम्पा नदी भारत के केरल राज्य की तीसरी सबसे बड़ी नदी है। इसे ‘पम्बा’ नाम से भी जाना जाता है। ‘पम्पा’ तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। श्रावणकौर रजवाड़े की सबसे लंबी नदी है। इसी नदी के किनारे पर हम्पी बसा हुआ है। यह स्थान बेर के वृक्षों के लिए आज भी प्रसिद्ध है। पौराणिक ग्रंथ ‘रामायण’ में भी हम्पी का उल्लेख वानर राज्य किष्किंधा की राजधानी के तौर पर किया गया है।

12. हनुमान से भेंट: - मलय पर्वत और चंदन वनों को पार करते हुए वे ऋष्यमूक पर्वत की ओर बढ़े। यहां उन्होंने हनुमान और सुग्रीव से भेंट की, सीता के आभूषणों को देखा और श्रीराम ने बाली का वध किया।

ऋष्यमूक पर्वत वाल्मीकि रामायण में वर्णित वानरों की राजधानी किष्किंधा के निकट स्थित था। इसी पर्वत पर श्रीराम की हनुमान से भेंट हुई थी। बाद में हनुमान ने राम और सुग्रीव की भेंट करवाई, जो एक अटूट मित्रता बन गई। जब महाबली बाली अपने भाई सुग्रीव को मारकर किष्किंधा से भागा तो वह ऋष्यमूक पर्वत पर ही आकर छिपकर रहने लगा था।

ऋष्यमूक पर्वत तथा किष्किंधा नगर कर्नाटक के हम्पी, जिला बेल्लारी में स्थित है। विरुपाक्ष मंदिर के पास से ऋष्यमूक पर्वत तक के लिए मार्ग जाता है। यहां तुंगभद्रा नदी (पम्पा) धनुष के आकार में बहती है। तुंगभद्रा नदी में पौराणिक चक्रतीर्थ माना गया है। पास ही पहाड़ी के नीचे श्रीराम मंदिर है। पास की पहाड़ी को ‘मतंग पर्वत’ माना जाता है। इसी पर्वत पर मतंग ऋषि का आश्रम था।

13. कोडीकरई: - हनुमान और सुग्रीव से मिलने के बाद श्रीराम ने अपनी सेना का गठन किया और लंका की ओर चल पड़े। मलय पर्वत, चंदन वन, अनेक नदियों, झरनों तथा वन-वाटिकाओं को पार करके राम और उनकी सेना ने समुद्र की ओर प्रस्थान किया। श्रीराम ने पहले अपनी सेना को कोडीकरई में एकत्रित किया।

तमिलनाडु की एक लंबी तटरेखा है, जो लगभग 1,000 किमी तक विस्‍तारित है। कोडीकरई समुद्र तट वेलांकनी के दक्षिण में स्थित है, जो पूर्व में बंगाल की खाड़ी और दक्षिण में पाल्‍क स्‍ट्रेट से घिरा हुआ है।

लेकिन राम की सेना ने उस स्थान के सर्वेक्षण के बाद जाना कि यहां से समुद्र को पार नहीं किया जा सकता और यह स्थान पुल बनाने के लिए उचित भी नहीं है, तब श्रीराम की सेना ने रामेश्वरम की ओर कूच किया।

14.रामेश्‍वरम: - रामेश्‍वरम समुद्र तट एक शांत समुद्र तट है और यहां का छिछला पानी तैरने और सन बेदिंग के लिए आदर्श है। रामेश्‍वरम प्रसिद्ध हिन्दू तीर्थ केंद्र है।

15.धनुषकोडी: : - वाल्मीकि के अनुसार तीन दिन की खोजबीन के बाद श्रीराम ने रामेश्वरम के आगे समुद्र में वह स्थान ढूंढ़ निकाला, जहां से आसानी से श्रीलंका पहुंचा जा सकता हो। उन्होंने नल और नील की मदद से उक्त स्थान से लंका तक का पुनर्निर्माण करने का फैसला लिया।

छेदुकराई तथा रामेश्वरम के इर्द-गिर्द इस घटना से संबंधित अनेक स्मृतिचिह्न अभी भी मौजूद हैं। नाविक रामेश्वरम में धनुषकोडी नामक स्थान से यात्रियों को रामसेतु के अवशेषों को दिखाने ले जाते हैं।

धनुषकोडी भारत के तमिलनाडु राज्‍य के पूर्वी तट पर रामेश्वरम द्वीप के दक्षिणी किनारे पर स्थित एक गांव है। धनुषकोडी पंबन के दक्षिण-पूर्व में स्थित है। धनुषकोडी श्रीलंका में तलैमन्‍नार से करीब 18 मील पश्‍चिम में है।

इसका नाम धनुषकोडी इसलिए है कि यहां से श्रीलंका तक वानर सेना के माध्यम से नल और नील ने जो पुल (रामसेतु) बनाया था उसका आकार मार्ग धनुष के समान ही है। इन पूरे इलाकों को मन्नार समुद्री क्षेत्र के अंतर्गत माना जाता है। धनुषकोडी ही भारत और श्रीलंका के बीच एकमात्र स्‍थलीय सीमा है, जहां समुद्र नदी की गहराई जितना है जिसमें कहीं-कहीं भूमि नजर आती है।

दरअसल, यहां एक पुल डूबा पड़ा है। 1860 में इसकी स्पष्ट पहचान हुई और इसे हटाने के कई प्रयास किए गए। अंग्रेज इसे एडम ब्रिज कहने लगे तो स्थानीय लोगों में भी यह नाम प्रचलित हो गया। अंग्रेजों ने कभी इस पुल को क्षतिग्रस्त नहीं किया लेकिन आजाद भारत में पहले रेल ट्रैक निर्माण के चक्कर में बाद में बंदरगाह बनाने के चलते इस पुल को क्षतिग्रस्त किया गया।

30मील लंबा और सवा मील चौड़ा यह रामसेतु 5 से 30 फुट तक पानी में डूबा है। श्रीलंका सरकार इस डूबे हुए पुल (पम्बन से मन्नार) के ऊपर भू-मार्ग का निर्माण कराना चाहती है जबकि भारत सरकार नौवहन हेतु उसे तोड़ना चाहती है। इस कार्य को भारत सरकार ने सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट का नाम दिया है। श्रीलंका के ऊर्जा मंत्री श्रीजयसूर्या ने इस डूबे हुए रामसेतु पर भारत और श्रीलंका के बीच भू-मार्ग का निर्माण कराने का प्रस्ताव रखा था।

16.’नुवारा एलिया’ पर्वत श्रृंखला: --वाल्मिकी रामायण अनुसार श्रीलंका के मध्य में रावण का महल था। ‘नुवारा एलिया’ पहाड़ियों से लगभग 90 किलोमीटर दूर बांद्रवेला की तरफ मध्य लंका की ऊंची पहाड़ियों के बीचोबीच सुरंगों तथा गुफाओं के भंवरजाल मिलते हैं। यहां ऐसे कई पुरातात्विक अवशेष मिलते हैं जिनकी कार्बन डेटिंग से इनका काल निकाला गया है।

श्रीलंका में नुआरा एलिया पहाड़ियों के आसपास स्थित रावण फॉल, रावण गुफाएं, अशोक वाटिका, खंडहर हो चुके विभीषण के महल आदि की पुरातात्विक जांच से इनके रामायण काल के होने की पुष्टि होती है। आजकल भी इन स्थानों की भौगोलिक विशेषताएं, जीव, वनसतथा स्मारक आदि बिलकु हैं जैसे कि रामायण में वर्णित किए गए है...

साभार 🙏🙏

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