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तन्मय

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10 months ago

।।श्री हरिः।।
1 - तन्मय
यह कन्हाई अद्भुत है, जहाँ लगेगा, जिससे लगेगा, उसी में तन्मय हो जायगा और उसे अपने में तन्मय कर लेगा ।

श्रुति कहती है-

'रूपं-रूपं है प्रतिरूपो बभूव।'

वह परमात्मा ही जड़-चेतन, पानी-पत्थर, पेड़-पौधे, अग्नि-वायु-आकाश पशु-पक्षी, कीड़े-पतंगे, सूर्य, चन्द्र-तारे सब बन गया है, किन्तु मैं उस किसी अलक्ष्य, अगोचर, अचिन्त्य परमात्मा की बात नहीं करता हूँ। मैं करता हूँ इस अपने नटखट नन्हें नन्द-नन्दन की बात। यह केवल स्वयं तन्मय नहीं हो जाता, दूसरेको भी अपने में तन्मय कर लेता है।

ऐसा नहीं है कि यह केवल श्रीकीर्तिकुमारी या दाऊ दादा में तन्मय-एकरूप हो जाता हो। यह क्या अपनी वंशी अधरों पर रखता है तो स्वर कम एकाकार होता है? अथवा किसी गाय, बछडे-बछडी को दुलराने-पुचकारने लगता है तो इसे अपनी कोई सुध-बुध रहती है। यह सखाओं से ही नहीं, मयूर-मैढ़क-कपि शशक से भी खेल में लगता हो तो तन्मय। गाने में, नाचने में, कुदने में ही नहीं, चिढाने में भी लगता है तो तन्मय ही होकर लगता है। इसे आधे मन से कोई काम जैसे करना ही नहीं आता है।

रही, दूसरों की बात, सो मैया यशोदा का लाड़ला सामने हो तो क्या किसी को अपने शरीर का स्मरण रह सकता है? यह तो आता ही सबको अपने में खींचता, अपने से एक करता है, अन्ततः कृष्ण है न।

अब आज की ही बात है, कन्हाई यमुना तट पर अकेला बैठा गीली रेत से कुछ बनाने में लगा था। बार-बार नन्हें करों से रेत उठाता था और तनिक-तनिक बहुत सम्हाल कर धरता था! पता नहीं कैसी रेत है कि टिकती ही नहीं। गिर-गिर पड़ती हैं रेत, किन्तु कन्हाई कहीं ऐसे हारने वाला है, वह लगा है अपने महानिर्माण में। लगा है - तन्मय है।

पता नहीं सखा कब चले गये। दाऊ दादा भी चला गया। सबने पुकारा, बुलाया, कहा; किन्तु जब यह सुनता ही नहीं तो सब खीझ कर चले गये कि अकेला पडेगा तो स्वयं दौडा आवेगा; किन्तु इसे तो यह भी पता नहीं कि आसपास कोई सखा नहीं है, यह अकेला है।

मैया पुकारती रही, पुकारती रही और अन्त में समीप आ गयी यह देखने कि उसका लाल कर क्या रहा है। क्यों सुनता नहीं। अन्तत: अब आतप में कुछ प्रखरता आने लगी है। इस धूप में तो इस सूकुमार को नहीं रहने दिया जा सकता।

कटि में केवल रत्नमेखला और कटिसूत्र है। कछनी तो इसे उत्पात लगती है उसे आते ही खोलकर फेंक दिया था। कुछ पीछे रेत पर पड़ी है वह पीतकौशेय कछनी। बार-बार ढीली होने वाली कछनी को यह कब तक सम्हालता?

चरणों में मणि-नुपूर हैं। करों में कंकण हैं। भुजाओं में अंगद हैं। कण्ठ में छोटे मुक्ताओं के मध्य व्याघ्रनख हैं। कौस्तुभ है गले में। भाल पर बिखरी अलकों के मध्य कज्जल बिन्दु है। थोड़ी अलकों को समेट कर उनमें मैया ने एक मयूर पिच्छ लगा दिया है। बड़े-बड़े लोचन अंजन-मण्डित हैं।

दोनों करों में गीली रेत लगी है। दोनों चरण आगे अर्ध कुंचित किये बैठा है। पूरे पदों पर, नितम्ब पर गीली रेत चिपकी है। स्थान स्थान और वक्ष पर, कपोल पर भी रेत के कण लगे हैं।

पुलिन पर बहुत से बालकों के पद-चिन्ह हैं। गीली रेत पर - सूखी रेत में भी शतशः बालकों के खेलने के चिन्ह हैं। रेत कहीं एकत्र है, कहीं का पदों से फैलायी अथवा बिखेरी गयी है। गीली रेत पर कहीं छोटे गड्ढे हैं अथवा रेत की ढेरियां हैं। मैया इनके मध्य से ही चलती आयी है। उसने समीप जाकर कन्धे पर कर रखकर पूछा है - 'तू अकेला यहाँ क्या कर रहा है?'

'मैं?' चौंककर कन्हाई ने मुख उठाया - नेत्र हर्ष से चमक उठे - 'अरे, यह तो मैया है!'

मुख धूप से कुछ अरुणाभ हो उठा है। भाल पर, कपोलों पर नन्हें स्वेद कण झलमला उठे हैं। मैया को देखकर यह झटपट उठ खड़ा हुआ है।

'तू अकेला यहाँ कर क्या रहा है?' मैया किंचित स्मित के साथ पूछती है।

'अकेला?' श्याम एक बार सिर घुमाकर आसपास देखता है। उसे अब पता लगता है कि वह अकेला है। ये सब सखा - दाऊ दादा भी उसे छोड़कर चले गये? अकेला यह कैसे रह सकता है; किंतु अब तो मैया समीप आ गयी है। दोनों भुजाएँ मैया की गोद में जाने को उठा देता है।

'तू कर क्या रहा था?' मैया हंसती है। कन्हार्ह को अब कहाँ स्मरण है कि वह क्या बना रहा था। एक बार मुख झुकाकर गीली रेत की उस नन्हीं ढेरी को देखता है और फिर मैया के मुख की ओर देखता है दोनों भुजाएँ फैलाये।

श्याम के नेत्रों में उलाहना है, खीझ है - 'तू कैसी मैया है कि स्वयं समझ नहीं लेती कि उसका लाल क्या बना रहा था। जब वह इतनी तन्मयता से इस महानिर्माण में लगा था तो दुर्ग-ग्राम, गाय-बैल, कपि-गज कुछ तो बना ही रहा था। अब उसे तो स्मरण नहीं। उसे तो मैया की गोद में चढ़ना है और मैया हँसती है। हंसती है और पूछती है।

यह भी कोई बात है कि मैया उसे गोद में नहीं लेती और पूछती है। अब यह खीझने वाला है। अपनी ही भावना में तन्मय, अब तो मैया की गोद और सम्भवतः उसका अमृतपय ही इसे स्मरण है।

लेखक : सुदर्शन सिंह 'चक्र'

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