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"पथरीले रास्ते पर गुजरना तो मुश्किल है, मगर मंजिल तक पहुंचना इतनी भी कठिन नहीं हैं, रोज की सामान्य जिंदगी जीना तो तुझ बिन सीख ली है। धन्यवाद, तुझे मेरी राह को आसान बनाया दिया तुमने, बस एक वादा करना खास वजह बनके लौट मत आना मिलने।। © ragi's pen"

पथरीले रास्ते पर  गुजरना तो मुश्किल है, 
मगर मंजिल तक पहुंचना इतनी भी कठिन नहीं हैं, 
रोज की सामान्य जिंदगी जीना तो तुझ बिन सीख ली है। 

धन्यवाद, तुझे मेरी राह को आसान बनाया  दिया तुमने, 
बस एक वादा करना खास वजह बनके लौट मत आना मिलने।। 

©  ragi's pen

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"SMILE is the best makeup you can wear! Promise.. And you will be the best makeup expert in the whole world.. © ragi's pen"

SMILE is the best makeup you can wear!
Promise..
 And you will be the best makeup expert in the whole world.. 
© ragi's pen

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"कागज़ कागज़ इस रंग बिरंगी दुनिया में फरेब के कितने पहलू निकले। माँ-बाप,भाई-बहन,पति-पत्नी, राजा -रंक, ईश्वर-भक्तजन। सभी के दिलोंमें थे शूल चुभे। जो बीज हमने बोये अपने आँगन में उनके वृक्षों की शाखाओं पर जो खिले। वो कागज के फूल निकले।। पारुल शर्मा"

कागज़ 
कागज़ इस रंग बिरंगी दुनिया में फरेब के कितने पहलू निकले।
माँ-बाप,भाई-बहन,पति-पत्नी, राजा -रंक, ईश्वर-भक्तजन।
सभी के दिलोंमें थे शूल चुभे।
जो बीज हमने बोये अपने आँगन में
उनके वृक्षों की शाखाओं पर जो खिले।
वो कागज के फूल निकले।।
पारुल शर्मा

इस रंग बिरंगी #दुनिया में #फरेब के कितने #पहलू निकले।
माँ-बाप,भाई-बहन,पति-पत्नी, राजा -रंक, ईश्वर-भक्तजन।
सभी के दिलोंमें थे #शूल चुभे।
जो #बीज हमने बोये अपने आँगन में
उनके वृक्षों की शाखाओं पर जो खिले।
वो कागज के #फूल निकले।
पारुल शर्मा
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"कागज़ मैंने कलम को विराम दिया था कि कुछ बेहतर लिख सकूँ Nojoto ने विचारों के साथ कलम भी चलवा दी। अव यह न मूल्यांकन करती है न आँकलन करती बस कागज घिसे जा रही है बेधड़क। दिल इसका दीवाना है। मेरी सुनता नहीं। पारुल शर्मा"

कागज़ 
मैंने कलम को विराम दिया था कि 
कुछ बेहतर लिख सकूँ 
Nojoto ने विचारों के साथ 
कलम भी चलवा दी।
अव यह न मूल्यांकन करती है 
न आँकलन करती
बस कागज घिसे जा रही है बेधड़क।
दिल इसका दीवाना है।
मेरी सुनता नहीं।
पारुल शर्मा

मैंने #कलम को #विराम दिया था कि
कुछ बेहतर लिख सकूँ
Nojoto ने विचारों के साथ
कलम भी चलवा दी।
अव यह न मूल्यांकन करती है
न आँकलन करती
बस #कागज घिसे जा रही है बेधड़क।
#दिल इसका #दीवाना है।

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"किस मंजिल की मुसाफिर हूँ चुन लिया मैंने पर सफर से बेखबर राह से अनजान हूँ । तो क्या रुक जाऊँ या बैठ जाऊँ हाथ पर हाथ धरे सोचकर ये कि...... होगा वही जो लिखा है,जो लिखा है भाग्य में मेरे नहीं ये ठीक नहीं है। नहीं ये न्याय नही है। क्योंकि चलना जिंदगी है थमना बुज्दिली है। बैठी थी अब तक फूलों सी सेज पे खोयी थी रंगीन सपनों में आगे जाने काँटों भरी अंधकारमयी डगर हो और शोलों से तपते पथ हों तो क्या रुक जाऊँ या बैठ जाऊँ हाथ पर हाथ धरे सोचकर ये कि...... होगा वही जो लिखा है,जो लिखा है भाग्य में मेरे चलूँ न तब तक कि कोई साथ न चले नहीं वक्त रुकता नहीं पीछे लौटता नहीं जीवन के सफर में कोई साथ चलता नहीं और कोई साथ देता नहीं है तो क्या रुक जाऊँ या बैठ जाऊँ हाथ पर हाथ धरे सोचकर ये कि...... होगा वही जो लिखा है,जो लिखा है भाग्य में मेरे। नहीं ये न्याय संगत नहीं ये, ये तर्क संगत नहीं है भाग्य के विचार से, अर्कमण्डय से आलम में रह जाऊँगी मैं सबसे पीछे और अकेले कैसे काट पाऊँगी वो पल जिन्दगी के। चलना मुझे अकेले,बढ़ना मुझे अकेले जाना सबसे आगे छितिज पे दमकूँ मैं वहाँ सूरज बनके। पारुल शर्मा"

किस मंजिल की मुसाफिर हूँ चुन लिया मैंने 
पर सफर से बेखबर राह से अनजान हूँ ।
तो क्या रुक जाऊँ या बैठ जाऊँ हाथ पर हाथ धरे
  सोचकर ये कि......
होगा वही जो लिखा है,जो लिखा है भाग्य में मेरे
          नहीं ये ठीक नहीं है। 
          नहीं  ये न्याय नही है।
क्योंकि चलना जिंदगी है थमना बुज्दिली है।
बैठी थी अब तक फूलों सी सेज पे
खोयी थी रंगीन सपनों में 
आगे जाने काँटों भरी अंधकारमयी डगर हो
और शोलों से तपते पथ हों
   तो क्या रुक जाऊँ या बैठ जाऊँ हाथ पर हाथ धरे
  सोचकर ये कि......
 होगा वही जो लिखा है,जो लिखा है भाग्य में मेरे
            चलूँ न तब तक कि कोई साथ न चले
            नहीं  वक्त रुकता नहीं पीछे लौटता नहीं 
          जीवन के सफर में कोई साथ चलता नहीं 
         और कोई साथ देता नहीं है 
तो क्या रुक जाऊँ या बैठ जाऊँ हाथ पर हाथ धरे
  सोचकर ये कि......
होगा वही जो लिखा है,जो लिखा है भाग्य में मेरे।
   नहीं ये न्याय संगत नहीं ये, ये तर्क संगत नहीं है 
भाग्य के विचार से, अर्कमण्डय से आलम में 
रह जाऊँगी मैं  सबसे पीछे और अकेले 
कैसे काट पाऊँगी वो पल जिन्दगी के।
      चलना मुझे अकेले,बढ़ना मुझे अकेले 
      जाना सबसे आगे छितिज पे
                 दमकूँ मैं वहाँ 
                 सूरज बनके।
                पारुल शर्मा

किस मंजिल की मुसाफिर हूँ चुन लिया मैंने
पर सफर से बेखबर राह से अनजान हूँ ।
तो क्या रुक जाऊँ या बैठ जाऊँ हाथ पर हाथ धरे
सोचकर ये कि......
होगा वही जो लिखा है,जो लिखा है भाग्य में मेरे
नहीं ये ठीक नहीं है।
नहीं ये न्याय नही है।
क्योंकि चलना जिंदगी है थमना बुज्दिली है।

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