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Best sukoon_ka_shahar Shayari, Status, Quotes, Stories, Poem

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"स्कूल के रास्ते में एक छोटी सी गुफ़ा थी मैंढक के मुहँ सरीखी और उस गुफ़ा में हवा हमेशा ठंडी रहती थी स्कूल आते जाते बच्चे, अक्सर उसमें मुँह डाल कर ठंडक सोखा करते थे जेठ का मौसम तो ठीक था, मगर सावन के पेशतर भी ये सिलसिला जारी रहता और पाले से ज़मी नवंबर की सुबह भी अक्सर बच्चे उस गुफ़ा में मुहँ पिरोए मिल जाते इस बार लौटा तो सोच की बुझा जाए कि उस गुफ़ा में क्या गूढ़ छिपा है मेरी उम्र पक चुकी कलमें सुफै़द हैं और चेहरे पर झुर्रियाँ तो शायद समझ सकूँ कि माज़रा क्या है गुफ़ा में चेहरा डाला तो ना जाने, ठंड सीने में क्यूँ लगी मिट्टी की मुकद्दस खुशबु रूह तक उतरती चली गई साँसों में इफरात घुल गई रगों में सुकून जब चेहरे बाहर निकल मेरा मज़मून बदल चुका था आज भी मैं बरसाती उतर कर भीगना चाहता हूँ आज भी मैं तपती रोड़ पर पिघलते कोलतार में जूता चिपकाना चाहता हूँ उम्र की भी कई तहें होती हैं"

स्कूल के रास्ते में एक छोटी सी गुफ़ा थी
मैंढक के मुहँ सरीखी 
और उस गुफ़ा में हवा हमेशा ठंडी रहती थी

स्कूल आते जाते बच्चे, अक्सर 
उसमें मुँह डाल कर ठंडक सोखा करते थे

जेठ का मौसम तो ठीक था, मगर 
सावन के पेशतर भी ये सिलसिला जारी रहता
और पाले से ज़मी नवंबर की सुबह भी
अक्सर बच्चे उस गुफ़ा में मुहँ पिरोए मिल जाते

इस बार लौटा तो सोच की बुझा जाए
कि उस गुफ़ा में क्या गूढ़ छिपा है 

मेरी उम्र पक चुकी 
कलमें सुफै़द हैं और चेहरे पर झुर्रियाँ 
तो शायद समझ सकूँ कि माज़रा क्या है 

 गुफ़ा में चेहरा डाला तो 
ना जाने, ठंड सीने में क्यूँ लगी 
मिट्टी की मुकद्दस खुशबु 
रूह तक उतरती चली गई 
साँसों में इफरात घुल गई
रगों में सुकून 

जब चेहरे बाहर निकल 
मेरा मज़मून बदल चुका था 

आज भी मैं बरसाती उतर कर भीगना चाहता हूँ
आज भी मैं 
तपती रोड़ पर पिघलते कोलतार में जूता चिपकाना चाहता हूँ 

उम्र की भी कई तहें होती हैं

सुकूँ का शहर
3. मैंढक का मुहँ

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"बड़ी आलिशान कोठी रही होगी की पंथजू रहा करते थे बड़े बड़े दरवाजे, उन से भी बड़ी खिड़कियाँ और झाँपती हुई टीन की असमानी छत किसी ने एक बार कमरे गिनने की कोशिश की थी कहते हैं कि वो "भभरी" गया मोहल्ले के शादी ब्याह में जब कोठी में जनवासा पसर जाता तो कुछ सिंदबादी जवान कमरों की गिनती करने को गोते लगाते और अक्सर फ्रूट क्रीम के भगोने के साथ पाए जाते चाल ढाल जैसी भी रही हो पर कोठी थी तो धर्मात्मा वो बारिश में छतरी बन जाती, तो धूप में छांव और कई बार बर्फानी सर्दियों में वो पव्वे की गर्मी का एहसास देती थी उसके सामने बने "पैरापिट" कभी आरामगाह बन जाते थे तो कभी सब्बल कई बार मैंने वहाँ थकान को केंचुली उतारते देखा था सुना है उस कोठी पर अब कानून का कब्ज़ा है और आम जनता का जाना गैरकानूनी क्या पता मिलॉड भी कभी कमरे गिनते गिनते "भभरी" जाते हों"

बड़ी आलिशान कोठी रही होगी
की पंथजू  रहा करते थे

बड़े बड़े दरवाजे, उन से भी बड़ी खिड़कियाँ
और झाँपती हुई  टीन की असमानी छत
किसी ने एक बार कमरे गिनने की कोशिश की थी
कहते हैं कि वो "भभरी" गया

मोहल्ले के शादी ब्याह में 
जब कोठी में जनवासा पसर जाता 
तो कुछ सिंदबादी जवान 
कमरों की गिनती करने को गोते लगाते 
और अक्सर फ्रूट क्रीम के भगोने के साथ पाए जाते 

चाल ढाल जैसी भी रही हो पर कोठी थी तो धर्मात्मा 
वो बारिश में छतरी बन जाती, तो धूप में छांव 
और कई बार 
बर्फानी सर्दियों में वो पव्वे की गर्मी का एहसास देती थी 

उसके सामने बने "पैरापिट" 
कभी आरामगाह बन जाते थे तो कभी सब्बल 
कई बार मैंने वहाँ थकान को केंचुली उतारते देखा था 

सुना है उस कोठी पर अब कानून का कब्ज़ा है 
और आम जनता का जाना गैरकानूनी 
क्या पता मिलॉड भी कभी 
कमरे गिनते गिनते "भभरी" जाते हों

सुकून का शहर
2. पंत सदन

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"कई बार, उस मोड़ से गुज़रते वक़त, मैं, ठहर जाता हूँ और महसूस करता हूँ सुनहरी धूप में लिपटी हुई, वो वसंत की सुबह जब उसे मैंने पहली बार देखा था नीली सी स्कूल ड्रेस में, रोड के किनारे "पैराफ़िट" पर बैठी उस मासूम सी लड़की को किसी का इंतजार था शायद, वक़त का चीड़ के पत्तों की खुशबु से नहाई उस सुबह का मजमून दुआ था और वो, कुबूल हुई दुआ उसके चेहरे पर सुकून था,आँखों में नूर और होंठो पर फैयाज़ सी मुस्कुराहट हवा उसे छू कर ग़ज़ल होती रही, धूप उसे चूम कर दवा कई बार, उस मोड़ से गुज़रते वक़त, मैं, ठहर जाता हूँ और महसूस करता हूँ सुनहरी धूप में लिपटी हुई, वो वसंत की सुबह जब उसे मैंने पहली बार देखा था"

कई बार, उस मोड़ से गुज़रते वक़त, मैं, ठहर जाता हूँ
और महसूस करता हूँ
सुनहरी धूप में लिपटी हुई, वो वसंत की सुबह 
जब उसे मैंने पहली बार देखा था 

नीली सी स्कूल ड्रेस में, रोड के किनारे
"पैराफ़िट" पर बैठी उस मासूम सी लड़की को किसी का इंतजार था 
शायद, वक़त का 

चीड़ के पत्तों की खुशबु से नहाई उस सुबह का मजमून दुआ था 
और वो, कुबूल हुई दुआ 
उसके चेहरे पर सुकून था,आँखों में नूर और होंठो पर फैयाज़ सी मुस्कुराहट

हवा उसे छू कर ग़ज़ल होती रही, धूप उसे चूम कर दवा 

कई बार, उस मोड़ से गुज़रते वक़त, मैं, ठहर जाता हूँ
और महसूस करता हूँ
सुनहरी धूप में लिपटी हुई, वो वसंत की सुबह 
जब उसे मैंने पहली बार देखा था

सुकूँ का शहर
1. वो लड़की जो दुआ थी
ऊपर की सड़क से live


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