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"ਕਈਆ ਭੋਲੇ ਚੇਹਰਿਆ ਦੇ ਪਿਛੇ ਸ਼ੈਤਾਨੀ ਚੇਹਰੇ ਛਿਪਾਏ ਹੁੰਦੇ ਆ, ਐਵੇ ਕਰਿਆ ਨਾ ਕਰ ਇਤਬਾਰ ਇਹਨਾ ਉੱਤੇ, ਇਹਨਾ ਕਈਆ ਨਾਲ ਧੋਖੇ ਕਮਾਏ ਹੁਦੇ ਆ। ©ਜਜ਼ਬਾਤੀ ਸਿੱਧੂ✍️ "

ਕਈਆ ਭੋਲੇ ਚੇਹਰਿਆ ਦੇ ਪਿਛੇ ਸ਼ੈਤਾਨੀ ਚੇਹਰੇ ਛਿਪਾਏ ਹੁੰਦੇ ਆ, 
         ਐਵੇ ਕਰਿਆ ਨਾ ਕਰ ਇਤਬਾਰ ਇਹਨਾ ਉੱਤੇ,
                         ਇਹਨਾ ਕਈਆ ਨਾਲ ਧੋਖੇ ਕਮਾਏ ਹੁਦੇ ਆ।

©ਜਜ਼ਬਾਤੀ ਸਿੱਧੂ✍️

#truefact ਕਈਆ ਭੋਲੇ ਚੇਹਰਿਆ ਦੇ ਪਿਛੇ ਸ਼ੈਤਾਨੀ ਚੇਹਰੇ ਛਿਪਾਏ ਹੁੰਦੇ ਆ,
ਐਵੇ ਕਰਿਆ ਨਾ ਕਰ ਇਤਬਾਰ ਇਹਨਾ ਉੱਤੇ ਇਹਨਾ ਕਈਆ ਨਾਲ ਧੋਖੇ ਕਮਾਏ ਹੁਦੇ ਆ।

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"ਕਈਆ ਭੋਲੇ ਚੇਹਰਿਆ ਦੇ ਪਿਛੇ ਸ਼ੈਤਾਨੀ ਚੇਹਰੇ ਛਿਪਾਏ ਹੁੰਦੇ ਆ, ਐਵੇ ਕਰਿਆ ਨਾ ਕਰ ਇਤਬਾਰ ਇਹਨਾ ਉੱਤੇ, ਇਹਨਾ ਕਈਆ ਨਾਲ ਧੋਖੇ ਕਮਾਏ ਹੁਦੇ ਆ। ©ਜਜ਼ਬਾਤੀ ਸਿੱਧੂ✍️"

ਕਈਆ ਭੋਲੇ ਚੇਹਰਿਆ ਦੇ ਪਿਛੇ ਸ਼ੈਤਾਨੀ ਚੇਹਰੇ ਛਿਪਾਏ ਹੁੰਦੇ ਆ, 
         ਐਵੇ ਕਰਿਆ ਨਾ ਕਰ ਇਤਬਾਰ ਇਹਨਾ ਉੱਤੇ,
                         ਇਹਨਾ ਕਈਆ ਨਾਲ ਧੋਖੇ ਕਮਾਏ ਹੁਦੇ ਆ।

©ਜਜ਼ਬਾਤੀ ਸਿੱਧੂ✍️

#truefact ਕਈਆ ਭੋਲੇ ਚੇਹਰਿਆ ਦੇ ਪਿਛੇ ਸ਼ੈਤਾਨੀ ਚੇਹਰੇ ਛਿਪਾਏ ਹੁੰਦੇ ਆ,
ਐਵੇ ਕਰਿਆ ਨਾ ਕਰ ਇਤਬਾਰ ਇਹਨਾ ਉੱਤੇ ਇਹਨਾ ਕਈਆ ਨਾਲ ਧੋਖੇ ਕਮਾਏ ਹੁਦੇ ਆ।

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"Press यूँ लिखने-बोलने से क्या कुछ बदलाव आ जायेगा?अगर ऐसा हो सकता तो न जाने कितने जमाने पूर्व ही बदलाव आ गया होता।सभी जानते है समझते हैं सब,कुछ लोगों ने तो व्यक्त भी की हैं सही बाते पर प्रभाव पङा क्या? हमम..तो फिर एक ही बात में बात रखूँगी अपनी,लाॅकडाउन ही हल नहीं है अगर था तो चुनाव लोगों की जिन्दगीयों से महत्वपूर्ण नहीं थे और हमारे यहाँ के ये हालात न होते,पर परेशानी तो यही है न अपने यहाँ की कि जिनकी बात सुनी जा सकती है,वो कुछ बोलते ही नहीं और आम जनता की कोई सुनता नहीं। वैसे आम जनता भी कहाँ समझती है अपने यहाँ की,माफी चाहूँगी बन्धुवरों!पर और देशों में भी नियम-अनुशासन है न और वहाँ के लोग अपने हितों को ध्यान में रख फाॅलो भी करते है न उनको पर अपने यहाँ कोई नियम-कानून बनने से पहले ही उसे तोङकर निपटने के उपाय खोज लेते है।उदाहरण यही ले लीजिए न कि जब बात अपने अधिकारों की हो तो हर कोई अधिकार जमाता है पर अपने कर्तव्य को कितना निभाया उसपर ध्यान कौन लाता हैं? अपने शब्दों के लिए क्षमाप्राथी हूँ,अगर कुछ त्रुटिपूर्ण बात लिखी हो मैंने तो। ©ekta"

Press    यूँ लिखने-बोलने से क्या कुछ बदलाव आ जायेगा?अगर ऐसा हो सकता तो न जाने कितने जमाने पूर्व ही बदलाव आ गया होता।सभी जानते है समझते हैं सब,कुछ लोगों ने तो व्यक्त भी की हैं सही बाते पर प्रभाव पङा क्या?
हमम..तो फिर एक ही बात में बात रखूँगी अपनी,लाॅकडाउन ही हल नहीं है अगर था तो चुनाव लोगों की जिन्दगीयों से महत्वपूर्ण नहीं थे और हमारे यहाँ के ये हालात न होते,पर परेशानी तो यही है न अपने यहाँ की कि जिनकी बात सुनी जा सकती है,वो कुछ बोलते ही नहीं और आम जनता की कोई सुनता नहीं।
वैसे आम जनता भी कहाँ समझती है अपने यहाँ की,माफी चाहूँगी बन्धुवरों!पर और देशों में भी नियम-अनुशासन है न और वहाँ के लोग अपने हितों को ध्यान में रख फाॅलो भी करते है न उनको पर अपने यहाँ कोई नियम-कानून बनने से पहले ही उसे तोङकर निपटने के उपाय खोज लेते है।उदाहरण यही ले लीजिए न कि जब बात अपने अधिकारों की हो तो हर कोई अधिकार जमाता है पर अपने कर्तव्य को कितना निभाया उसपर ध्यान कौन लाता हैं?
अपने शब्दों के लिए क्षमाप्राथी हूँ,अगर कुछ त्रुटिपूर्ण बात लिखी हो मैंने तो।

©ekta

#MediaAndPress
#PressFreedomDay #truefact

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"Aapki tarakki se kabhi gair nahi balki hamesha aapke apne hi jalte hain.🙂 ©Divya Pal "

Aapki tarakki se kabhi gair nahi balki hamesha aapke apne hi jalte hain.🙂

©Divya Pal

Tarakki
#truefact

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"Aapki tarakki se kabhi gair nahi balki hamesha aapke apne hi jalte hain.🙂 ©Divya Pal "

Aapki tarakki se kabhi gair nahi balki hamesha aapke apne hi jalte hain.🙂

©Divya Pal

Tarakki
#truefact

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