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Best लफ्ज Shayari, Status, Quotes, Stories, Poem

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"इश्क़ का अंजाम अगर कोई मेरे बर्बाद होने की वजह पूछे मै तो मेरे अंजामे इश्क़ के सिवा एक लफ्ज ना लिखू। -सोल्जेर औफ़ गड।"

इश्क़ का अंजाम   अगर कोई मेरे बर्बाद होने की वजह पूछे 

मै तो मेरे अंजामे इश्क़ के सिवा 

एक लफ्ज ना लिखू।

-सोल्जेर औफ़ गड।

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"लफ़्ज़ ही होते हैं इंसान का अाइना, शकल का क्या वो तो उम्र और हालात के साथ बदल जाती है ।"

लफ़्ज़ ही होते हैं इंसान का अाइना,      
   शकल का क्या वो तो उम्र और हालात के साथ बदल जाती है ।

#अपरचित#लफ्ज #आईना

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"*पाने से खोने का मज़ा और है* *बंद आँखों में रोने का मज़ा और है .....* *आंसु बने लफ्ज और लफ्ज बने ग़ज़ल* *और उस ग़ज़ल में तेरे होने का मज़ा और है.....* 💖राहुल पाण्डेय 💖"

*पाने से खोने का मज़ा और है*
*बंद आँखों में रोने का मज़ा और है .....*

*आंसु बने लफ्ज और लफ्ज बने ग़ज़ल* 
*और उस ग़ज़ल में  तेरे होने का मज़ा और है.....*
          💖राहुल पाण्डेय 💖

 

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"#OpenPoetry तुम आये ही थे हवा की मानिंद न कोई चेहरा न कोई आवाज बस एक हर्फ लफ्ज बनकर उतरे । रह गये जिजीविषा बनकर दिल के किसी कोने में। कभी खुद से पुछना! क्युं थी हर्फ में इश्क़ की खुशबू जो रुह में उतर गयी । कितने हर्फ लफ्ज बन कोरे पन्नों पर लिपटे हैं। जब जब पढा़ मैने टूटी हैं मर्यादा ! दिल में उठी है दीदार की अभिलाषा ! तुम न सही तस्वीर ही सही लिख दुंगा मैं। अपने प्रेम की परिभाषा।। संजय श्रीवास्तव "

#OpenPoetry तुम आये ही थे 
हवा की मानिंद 
न कोई चेहरा
न कोई आवाज 
बस एक हर्फ 
लफ्ज बनकर उतरे ।
रह गये जिजीविषा बनकर 
दिल के किसी कोने में। 
कभी खुद से पुछना! 
क्युं थी हर्फ में 
इश्क़ की खुशबू जो 
रुह में उतर गयी ।
कितने हर्फ लफ्ज बन
कोरे पन्नों पर लिपटे हैं। 
जब जब पढा़ मैने 
टूटी हैं मर्यादा !
दिल में उठी है 
दीदार की अभिलाषा !
तुम न सही तस्वीर ही सही 
लिख दुंगा मैं। 
अपने प्रेम की परिभाषा।।  
संजय श्रीवास्तव

 

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"#OpenPoetry तुम आये ही थे हवा की मानिंद न कोई चेहरा न कोई आवाज बस एक हर्फ लफ्ज बनकर उतरे । रह गये जिजीविषा बनकर दिल के किसी कोने में। कभी खुद से पुछना! क्युं थी हर्फ में इश्क़ की खुशबू जो रुह में उतर गयी । कितने हर्फ लफ्ज बन कोरे पन्नों पर लिपटे हैं। जब जब पढा़ मैने टूटी हैं मर्यादा ! दिल में उठी है दीदार की अभिलाषा ! तुम न सही तस्वीर ही सही लिख दुंगा मैं। अपने प्रेम की परिभाषा।। संजय श्रीवास्तव"

#OpenPoetry तुम आये ही थे 
हवा की मानिंद 
न कोई चेहरा
न कोई आवाज 
बस एक हर्फ 
लफ्ज बनकर उतरे ।
रह गये जिजीविषा बनकर 
दिल के किसी कोने में। 
कभी खुद से पुछना! 
क्युं थी हर्फ में 
इश्क़ की खुशबू जो 
रुह में उतर गयी ।
कितने हर्फ लफ्ज बन
कोरे पन्नों पर लिपटे हैं। 
जब जब पढा़ मैने 
टूटी हैं मर्यादा !
दिल में उठी है 
दीदार की अभिलाषा !
तुम न सही तस्वीर ही सही 
लिख दुंगा मैं। 
अपने प्रेम की परिभाषा।।  
संजय श्रीवास्तव

 

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