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Best znmd Shayari, Status, Quotes, Stories, Poem

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"खुद से भी किनारा करता हूँ।।। टूटे बिखरे ज़मीर को अपने, अपलक निहारा करता हूँ। अपने भी पीछे छूट गए, खुद से भी किनारा करता हूँ। टूट साख गिरा जमीं पर, हवा न थी, पतझड़ भी नहीं, रौशन भी नहीं, न तेज रहा, खुद को सितारा कहता हूँ। मूक रहा, बधिर रहा, बापू के तीन बन्दर सा भी नहीं, हाथ जुड़े औ पांव बंधे, नत आंखों से इशारा करता हूँ। विवेक रहा संवादहीन, थी कलम रही निर्बल सी पड़ी, धुलसनी किताब पड़ी, खुद को इल्म पिटारा कहता हूँ। पनघट पे बैठ रहा प्यासा, पानी का आना जाना रहा, मनभूमि बंजर थी पड़ी, नदियों को इजारा करता हूँ। गैरों की बातें चुभने लगीं, अपने जला कर चले गए, डूब रहा अब ग्लानि में, तिनके को शिकारा कहता हूँ। ©रजनीश "स्वछंद" #NojotoQuote"

खुद से भी किनारा करता हूँ।।।

टूटे बिखरे ज़मीर को अपने, अपलक निहारा करता हूँ।
अपने भी पीछे छूट गए, खुद से भी किनारा करता हूँ।

टूट साख गिरा जमीं पर, हवा न थी, पतझड़ भी नहीं,
रौशन भी नहीं, न तेज रहा, खुद को सितारा कहता हूँ।

मूक रहा, बधिर रहा, बापू के तीन बन्दर सा भी नहीं,
हाथ जुड़े औ पांव बंधे, नत आंखों से इशारा करता हूँ।

विवेक रहा संवादहीन, थी कलम रही निर्बल सी पड़ी,
धुलसनी किताब पड़ी, खुद को इल्म पिटारा कहता हूँ।

पनघट पे बैठ रहा प्यासा, पानी का आना जाना रहा,
मनभूमि बंजर थी पड़ी, नदियों को इजारा करता हूँ।

गैरों की बातें चुभने लगीं, अपने जला कर चले गए,
डूब रहा अब ग्लानि में, तिनके को शिकारा कहता हूँ।

©रजनीश "स्वछंद" #NojotoQuote

खुद से भी किनारा करता हूँ।।।

टूटे बिखरे ज़मीर को अपने, अपलक निहारा करता हूँ।
अपने भी पीछे छूट गए, खुद से भी किनारा करता हूँ।

टूट साख गिरा जमीं पर, हवा न थी, पतझड़ भी नहीं,
रौशन भी नहीं, न तेज रहा, खुद को सितारा कहता हूँ।

38 Love

"मैं अविरल, मैं स्वच्छंद।। मैं उन्मुक्त, स्वच्छंद, अविरल, भावुक, बन्ध पाऊँ कैसे गागर के पानी मे। मेरा ध्येय अनन्त, मेरी दिशा अनन्त, बह जाऊं जैसे सागर के पानी मे। सूक्ष्म सचेतन ज्वलित दीप लिए कर, तम हरने का अडिग विश्वास लिए, जीवन पथ को पग पग नापा करता हूँ, धमनियों में स्वबल का अट्टहास लिए। पथद्रष्टा नहीं, संगगामी नही, स्वामी स्वयं, हर बाधा अविरल तय कर जाता हूँ। जगबंधु, कण कण निजरूप की छाया में, काम क्रोध गरल भी क्षय कर जाता हूँ। है अविनाशी कोई अम्बर में, तो हो, स्वरचित छंदों से वज्र की संज्ञा पाता हूँ। ना कोई दधीचि, ना कोई अश्वत्थामा, निजकर्मो से भेदित, जग की प्रज्ञा पाता हूँ। हर चौखट मेरा डेरा, हर मन मेरा सराय, कह पाऊँ कैसे एक कहानी में। मेरा ध्येय अनन्त, मेरी दिशा अनन्त, बह जाऊं जैसे सागर के पानी मे। ©रजनीश "स्वछंद" #NojotoQuote"

मैं अविरल, मैं स्वच्छंद।।

मैं उन्मुक्त, स्वच्छंद, अविरल, भावुक,
बन्ध पाऊँ कैसे गागर के पानी मे।
मेरा ध्येय अनन्त, मेरी दिशा अनन्त,
बह जाऊं जैसे सागर के पानी मे।

सूक्ष्म सचेतन ज्वलित दीप लिए कर,
तम हरने का अडिग विश्वास लिए,
जीवन पथ को पग पग नापा करता हूँ,
धमनियों में स्वबल का अट्टहास लिए।

पथद्रष्टा नहीं, संगगामी नही, स्वामी स्वयं,
हर बाधा अविरल तय कर जाता हूँ।
जगबंधु, कण कण निजरूप की छाया में,
काम क्रोध गरल भी क्षय कर जाता हूँ।

है अविनाशी कोई अम्बर में, तो हो,
स्वरचित छंदों से वज्र की संज्ञा पाता हूँ।
ना कोई दधीचि, ना कोई अश्वत्थामा,
निजकर्मो से भेदित, जग की प्रज्ञा पाता हूँ।

हर चौखट मेरा डेरा, हर मन मेरा सराय,
कह पाऊँ कैसे एक कहानी में।
मेरा ध्येय अनन्त, मेरी दिशा अनन्त,
बह जाऊं जैसे सागर के पानी मे।

©रजनीश "स्वछंद" #NojotoQuote

मैं अविरल, मैं स्वच्छंद।।

मैं उन्मुक्त, स्वच्छंद, अविरल, भावुक,
बन्ध पाऊँ कैसे गागर के पानी मे।
मेरा ध्येय अनन्त, मेरी दिशा अनन्त,
बह जाऊं जैसे सागर के पानी मे।

सूक्ष्म सचेतन ज्वलित दीप लिए कर,

24 Love

"मैं तो हूँ व्यापारी।। मैं तो हूँ व्यापारी, बस सामान बेचता हूँ, पैसों के अंधों को देखो ईमान बेचता हूँ। प्रजातन्त्र के मंदिर का मैं एक पुजारी हूँ, अंधे बहरों को आंख और कान बेचता हूँ। सब होंगे खुशहाल, हर घर लक्ष्मी वास, झूठ को भी देखो कैसे सच मान बेचता हूँ। कोई भूख से मरता है, कोई चढ़ता फांसी, इन भूखे नंगों को मुआवजे दान बेचता हूँ। नारीशक्ति का नारा था, देवी तो बना दिया, फिर बीच चौराहे उसका सम्मान बेचता हूँ। कौन युवा है, कौन लड़ेगा, किसको चिंता, नतमस्तक वीरों को तीर कमान बेचता हूँ। निज धर्म निभाता हूँ, तेरा भी हुंकार रहे, शब्दों में संदेश नहीं बस, प्राण बेचता हूँ। ©रजनीश "स्वछंद" #NojotoQuote"

मैं तो हूँ व्यापारी।।

मैं तो हूँ व्यापारी, बस सामान बेचता हूँ,
पैसों के अंधों को देखो ईमान बेचता हूँ।

प्रजातन्त्र के मंदिर का मैं एक पुजारी हूँ,
अंधे बहरों को आंख और कान बेचता हूँ।

सब होंगे खुशहाल, हर घर लक्ष्मी वास,
झूठ को भी देखो कैसे सच मान बेचता हूँ।

कोई भूख से मरता है, कोई चढ़ता फांसी,
इन भूखे नंगों को मुआवजे दान बेचता हूँ।

नारीशक्ति का नारा था, देवी तो बना दिया,
फिर बीच चौराहे उसका सम्मान बेचता हूँ।

कौन युवा है, कौन लड़ेगा, किसको चिंता,
नतमस्तक वीरों को तीर कमान बेचता हूँ।

निज धर्म निभाता हूँ, तेरा भी हुंकार रहे,
शब्दों में संदेश नहीं बस, प्राण बेचता हूँ।

©रजनीश "स्वछंद" #NojotoQuote

मैं तो हूँ व्यापारी।।

मैं तो हूँ व्यापारी, बस सामान बेचता हूँ,
पैसों के अंधों को देखो ईमान बेचता हूँ।

प्रजातन्त्र के मंदिर का मैं एक पुजारी हूँ,
अंधे बहरों को आंख और कान बेचता हूँ।

33 Love

"मैं और मेरा इश्क।। कुछ यूं बहा दरिया-ए-अश्क, बहता ही रह गया। कुछ यूं सहा था दर्द-ए-दिल, सहता ही रह गया।। मायूस खुद से रहे, न थामा हाथ बढ़कर किसी ने, कुछ यूं खला साथ उनका, खलता ही रह गया। तिनका तिनका चुनकर बनाया संवारा था जिसे, कुछ यूं जला वो आशियाँ, जलता ही रह गया।। तू ज़िन्दगी में शामिल, तू जन्नत, तू ही खुदा मेरा, कुछ यूं कहा था दिल मेरा, कहता ही रह गया।। मुंह तो मोड़ा था, साथ छोड़ा था कबका मेरा, कुछ यूं छला था खुद को, छलता ही रह गया।। राह-ए-मुहब्बत है आसां नही, है लंबी ये बड़ी, कुछ यूं चला था इस पर, चलता ही रह गया।। चाह छू लूं आसमां, ज़ेहन से काफ़ूर हो गयी, कुछ यूं ढला शिखर से, ढलता ही रह गया।। एक नई दुनिया, अपनी ज़मीं, आसमां अपना, कुछ यूं सजा था ख्वाब, सजता ही रह गया।। ©रजनीश "स्वछंद" #NojotoQuote"

मैं और मेरा इश्क।।

कुछ यूं बहा दरिया-ए-अश्क, बहता ही रह गया।
कुछ यूं सहा था दर्द-ए-दिल, सहता ही रह गया।।

मायूस खुद से रहे, न थामा हाथ बढ़कर किसी ने,
कुछ यूं खला साथ उनका, खलता ही रह गया।

तिनका तिनका चुनकर बनाया संवारा था जिसे,
कुछ यूं जला वो आशियाँ, जलता ही रह गया।।

तू ज़िन्दगी में शामिल, तू जन्नत, तू ही खुदा मेरा,
कुछ यूं कहा था दिल मेरा, कहता ही रह गया।।

मुंह तो मोड़ा था, साथ छोड़ा था कबका मेरा,
कुछ यूं छला था खुद को, छलता ही रह गया।।

राह-ए-मुहब्बत है आसां नही, है लंबी ये बड़ी,
कुछ यूं चला था इस पर, चलता ही रह गया।।

चाह छू लूं आसमां, ज़ेहन से काफ़ूर हो गयी,
कुछ यूं ढला शिखर से, ढलता ही रह गया।।

एक नई दुनिया, अपनी ज़मीं, आसमां अपना,
कुछ यूं सजा था ख्वाब, सजता ही रह गया।।

©रजनीश "स्वछंद" #NojotoQuote

मैं और मेरा इश्क।।

कुछ यूं बहा दरिया-ए-अश्क, बहता ही रह गया।
कुछ यूं सहा था दर्द-ए-दिल, सहता ही रह गया।।

मायूस खुद से रहे, न थामा हाथ बढ़कर किसी ने,
कुछ यूं खला साथ उनका, खलता ही रह गया।

46 Love

"बस हाथ मलता रह गया। अपने निशां बनाने तो थे, भीड़ के साथ चलता रह गया। बीता पल लौट आया नही, मैं बस हाथ मलता रह गया। सायों के पीछे भागता, हकीकत कहीं था छोड़ आया, अपनी धुन में मस्त, कोई बुज़ुर्ग बात कहता रह गया। खुदा खुद को ही समझे बैठा, खुद से ही अनजान था, दर्द औरों का बाँटा था कब, बस नाथ बनता रह गया। कुछ रौशनी की दरकार थी, घर औरों का जला दिया, ये सुबह आयी ना कभी, बन बस रात छलता रह गया। बिसात ऐसी थी बिछी, अहं का समंदर गहरा बड़ा, जीत की थी लालसा, मगर बस मात बनता रह गया। मज़हबी तलवार ले हाथ, हर जंग में था कूदा पड़ा, अदद इंसां बन पाया नही, बस जात बनता रह गया। ©रजनीश "स्वछंद""

बस हाथ मलता रह गया।

अपने निशां बनाने तो थे, भीड़ के साथ चलता रह गया।
बीता पल लौट आया नही, मैं बस हाथ मलता रह गया।

सायों के पीछे भागता, हकीकत कहीं था छोड़ आया,
अपनी धुन में मस्त, कोई बुज़ुर्ग बात कहता रह गया।

खुदा खुद को ही समझे बैठा, खुद से ही अनजान था,
दर्द औरों का बाँटा था कब, बस नाथ बनता रह गया।

कुछ रौशनी की दरकार थी, घर औरों का जला दिया,
ये सुबह आयी ना कभी, बन बस रात छलता रह गया।

बिसात ऐसी थी बिछी, अहं का समंदर गहरा बड़ा,
जीत की थी लालसा, मगर बस मात बनता रह गया।

मज़हबी तलवार ले हाथ, हर जंग में था कूदा पड़ा,
अदद इंसां बन पाया नही, बस जात बनता रह गया।

©रजनीश "स्वछंद"

बस हाथ मलता रह गया।

अपने निशां बनाने तो थे, भीड़ के साथ चलता रह गया।
बीता पल लौट आया नही, मैं बस हाथ मलता रह गया।

सायों के पीछे भागता, हकीकत कहीं था छोड़ आया,
अपनी धुन में मस्त, कोई बुज़ुर्ग बात कहता रह गया।

43 Love