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Best amandeep Shayari, Status, Quotes, Stories, Poem

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"तुम तुम हो तो मुझे किस बात का ग़म है, ये ग़म भी तेरे प्यार के सामने कम है। तुम बिन मानों मेरी जिंदगी अधूरी है, क्या बिन धुरी ये खगोल पिंड पूरी है।। "

तुम तुम हो तो मुझे किस बात का ग़म है, 
ये ग़म भी तेरे प्यार के सामने कम है। 
तुम  बिन मानों मेरी जिंदगी अधूरी है, 
क्या बिन धुरी ये खगोल पिंड पूरी है।।

#तुम #najoto #satyaprem #amandeep #ArunRena #NojotoVideo

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"सुलगती है आग जलते हैं अंगारे, तुम हो मेरे हम हैं तुम्हारे। _Kund@n"

सुलगती है आग जलते हैं अंगारे,
तुम   हो   मेरे  हम    हैं  तुम्हारे।
_Kund@n

#Kundan'spoetry
#Stories #nojotopower #satyaprem #amandeep #ArunRena #NojotoVideo #nojotost

84 Love

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"#भारत "भारत" है ऐसा भू - भाग जहाँ, सभी धर्म मजहब के लोग रहते हैं। प्यार से इस को माटी को , हम "भारत" माता कहते हैं ।। इसके उत्तर में हिम गिरी हिमालय , जिसे हम भारत का प्रहरी कहते हैं। देख कर इसके विशाल काया को , दुश्मन भी सदेव भयभीत रहते हैं।। जहाँ लोग नदियों की पूजा करते , सूर्य देव को अर्घ्य चढ़ाते हैं । पवित्र गंगा में गोता लगाकर, सुबह शाम हर - हर गंगे गाते हैं ।। बसते हैं रज के कण - कण में , परम्पराओं का परिधान है जहाँ । संस्कृति है इसकी अनमोल धरोहर, पढते हैं संग में गीता और कुरान यहाँ ।। ऋषि - मुनियों की है यह भूमि, महापुरुषों और विद्वानों का वरदान है। संस्कृत के हर श्लोकों में छिपा, आयुर्वेद ,गीता और खगोल विज्ञान है।। एक सौ पेंतीस करोड़ जन यहां एक साथ जन मन गीत को गाते हैं। इसकी सोलह सौ अठारह भाषाएँ फिर भी एक साथ होली ईद मनाते हैं।। हम उत्तर से लेकर दक्षिण तक, इसके पूरब से लेकर पश्चिम तक । केसरिया, श्वेत और हरे रंगों वाली, हम बस एक ही तिरंगा फहराते हैं।। Kundan's poetry"

#भारत 

"भारत" है  ऐसा  भू - भाग  जहाँ, 
सभी धर्म मजहब के लोग रहते हैं। 
प्यार   से   इस   को   माटी   को , 
हम  "भारत"   माता  कहते  हैं ।। 

इसके उत्तर में हिम गिरी हिमालय , 
जिसे हम भारत का प्रहरी कहते हैं। 
देख  कर  इसके  विशाल  काया को , 
दुश्मन  भी  सदेव भयभीत  रहते  हैं।। 

जहाँ लोग  नदियों  की  पूजा करते , 
सूर्य   देव   को   अर्घ्य   चढ़ाते   हैं । 
पवित्र    गंगा   में   गोता   लगाकर, 
सुबह शाम  हर - हर  गंगे  गाते  हैं ।। 

बसते हैं  रज   के   कण  -  कण   में , 
परम्पराओं    का   परिधान   है  जहाँ । 
संस्कृति  है  इसकी  अनमोल  धरोहर, 
पढते हैं संग में गीता और कुरान यहाँ ।। 

ऋषि - मुनियों   की   है   यह   भूमि, 
महापुरुषों और विद्वानों का वरदान है। 
संस्कृत  के   हर   श्लोकों   में    छिपा, 
आयुर्वेद ,गीता  और  खगोल विज्ञान है।।

एक  सौ  पेंतीस  करोड़  जन  यहां 
एक साथ जन मन गीत को गाते हैं। 
इसकी सोलह  सौ  अठारह  भाषाएँ 
फिर भी एक साथ होली ईद मनाते हैं।। 

हम  उत्तर  से  लेकर  दक्षिण  तक, 
इसके पूरब  से  लेकर पश्चिम तक । 
केसरिया, श्वेत और  हरे  रंगों  वाली, 
हम बस एक ही तिरंगा फहराते हैं।। 
Kundan's poetry

#bharat
#satyaprem #amandeep #ArunRena #NojotoVideo #nojotost #shivisharma #najoto #Mittal

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"🇮🇳तिरंगा 🇮🇳 🇮🇳"

🇮🇳तिरंगा 🇮🇳
🇮🇳

#कुन्दन_कुंज
#काव्यकुंज
#independencedays
#amandeep

#FullAazaadi

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"#OpenPoetry पैसा हम कमाते हैं, पर सामान समाज से लाते हैं, अपनी खुद़गर्जी के लिए खाना कचरा में बहाते हैं। रोब  तो  हम  ऐसे  दिखाते  हैं जैसे  दुनियाँ  हमारी जागीर हो, दूसरों से हम कम नहीं के फेर में अपनी औकात भी भूल जाते हैं। जहाँ  चार  पूड़ी  की  जरूरत वहाँ  हम  दस  पूड़ी  मंगाते हैं। ओरों का समझ पत्ते में यूंही छोड़ हम हाथ  धोकर  चले  जाते  हैं।। पैसा हम कमाते हैं, पर सामान समाज से लाते हैं, अपनी खुद़गर्जी के लिए खाना कचरा में बहाते हैं। दोस्तों में अपनी इमेज बने दो के बदले तीन प्लेट मंगाते हैं, आधा अधूरा खाकर हम यूंही छोड़ चले जाते हैं।। जहाँ पानी की नहीं जरूरत वहाँ बोतलों का बोतल बहाते हैं, अपनी नीच सोच के कारण पैसा फेक कर चले जाते हैं।। पैसा हम कमाते हैं, पर सामान समाज से लाते हैं, अपनी खुद़गर्जी के लिए खाना कचरा में बहाते हैं। इसी सोच के कारण आज शहरों का बहुत बुरा हाल है, हर कचरे के डब्बे में परा भोजन  का  भंडार  है ।। गली मोहल्ले चौराहों में फैला बदबू का जाल है, महामारी और हैजा भी हम इंसानों का अहंकार है। पैसा हम कमाते हैं, पर सामान समाज से लाते हैं, अपनी खुद़गर्जी के लिए खाना कचरा में बहाते हैं। किसी देश या राष्ट्र को उन्नत शुध्द भोजन जल व हवा बनाता है, भूखमरी जल व बीमारी जैसे आर्थिक संकट से बचाता है।। यह तभी संभव होगा जब हम अन्न का महत्व समझ जाएंगे , खुद के स्वार्थ से उपर उठ कर, भोजन को बर्बाद होने से बचाएंगे। पैसा हम कमाते हैं, पर सामान समाज से लाते हैं, अपनी खुद़गर्जी के लिए खाना कचरा में बहाते हैं। _Kund@n"

#OpenPoetry   पैसा हम कमाते हैं, पर सामान समाज से लाते हैं,
अपनी खुद़गर्जी के लिए खाना कचरा में बहाते हैं।
रोब  तो  हम  ऐसे  दिखाते  हैं
जैसे  दुनियाँ  हमारी जागीर हो, 
दूसरों से हम कम नहीं के फेर में 
अपनी औकात भी भूल जाते हैं।
जहाँ  चार  पूड़ी  की  जरूरत 
वहाँ  हम  दस  पूड़ी  मंगाते हैं। 
ओरों का समझ पत्ते में यूंही छोड़ 
हम हाथ  धोकर  चले  जाते  हैं।। 
पैसा हम कमाते हैं, पर सामान समाज से लाते हैं,
अपनी खुद़गर्जी के लिए खाना कचरा में बहाते हैं।
दोस्तों में अपनी इमेज बने
दो के बदले तीन प्लेट मंगाते हैं,
आधा अधूरा खाकर हम
यूंही छोड़ चले जाते हैं।।
जहाँ पानी की नहीं जरूरत
वहाँ बोतलों का बोतल बहाते हैं,
अपनी नीच सोच के कारण
पैसा फेक कर चले जाते हैं।।
पैसा हम कमाते हैं, पर सामान समाज से लाते हैं,
अपनी खुद़गर्जी के लिए खाना कचरा में बहाते हैं।
इसी सोच के कारण आज 
शहरों का बहुत बुरा हाल है, 
हर कचरे के डब्बे में परा 
भोजन  का  भंडार  है ।। 
गली मोहल्ले चौराहों में
फैला बदबू का जाल है, 
महामारी और हैजा भी 
हम इंसानों का अहंकार है। 
पैसा हम कमाते हैं, पर सामान समाज से लाते हैं,
अपनी खुद़गर्जी के लिए खाना कचरा में बहाते हैं।
किसी देश या राष्ट्र को उन्नत 
शुध्द भोजन जल व हवा बनाता है, 
भूखमरी जल व बीमारी जैसे 
आर्थिक संकट से बचाता है।। 
यह तभी संभव होगा जब हम 
अन्न का महत्व समझ जाएंगे , 
खुद के स्वार्थ से उपर उठ कर, 
भोजन को बर्बाद होने से बचाएंगे। 
पैसा हम कमाते हैं, पर सामान समाज से लाते हैं,
अपनी खुद़गर्जी के लिए खाना कचरा में बहाते हैं।
_Kund@n

#OpenPoetry
''पैसा हम कमाते हैं, पर सामान समाज से लाते हैं,
अपनी खुद़गर्जी के लिए खाना कचरा में बहाते हैं।''

पैसा हम कमाते हैं, पर सामान समाज से लाते हैं,
अपनी खुद़गर्जी के लिए खाना कचरा में बहाते हैं।
रोब  तो  हम  ऐसे  दिखाते  हैं
जैसे  दुनियाँ  हमारी जागीर हो,

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